मंगलवार, 22 अगस्त 2017

 राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु   लिखी गयी  , स्वीकृति !

   यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

    राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के  शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !

   राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में  उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !

  राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे !  उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !

         यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३७ के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !  !  यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल  एक्ट १९३५  के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए ,  शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी !  भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,!

      अब  यह  देखना  जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?

   वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था  की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन  भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था !   इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य  " गन सेल्यूट " कहलाते थे !

     एक्ट १९३५ में   ,   इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !

     तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,??   इस राज को जानने की जरुरत है !

 खुद  को स्वयंभू  ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , "  मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण  जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए !  महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि  स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !

    जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल  में रहा   बाद में उसकी मृत्यु हो गयी !  ,,,!

    अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे !  तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन ककर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए  और काश्मीर नहीं बना ??राजा हरिसिंह और भारत के गवर्नल जनरल के बीच काश्मीर को लेकर विलय हेतु लिखी गयी , स्वीकृति !
यह स्वीकृति पात्र एक राज्य के प्रभुता संपन्न राजा का भारत में विलय हेतु किया गया अनुबंध है , जिसमें राजा , ने फौरी तौर पर , भारत के गवर्नल जनरल द्वारा , रियासतों को एक अन्य बिल एक्ट १९३५ के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के आधार पर , संचार , रक्षा , और विदेश नीति , के अधिकार खुद अपने पास रखते हुए , शेष अधिकारों के लिए उनकी अपनी रियासतों के लिए खुद अपना संविधान बनाने की छूट दी ! भारत के गवर्नल जनरल ( वाइसराय लार्ड माउंट बेटन ) ने यह शर्त भी राखी की हर रियासत अपनी खुद की संविधान बनाने के लिए एक असेम्ब्ली रियासत में स्थापित करे और शीघ्र संविधान बनाये ! किन्तु कुछ राज्यों को छोड़ कर शेष अन्य रियासत असेम्ब्ली स्थापित करने और संविधान बनाने में असफल रहे , तब १९४९ में भारत का संविधानसभी रियासतों ने स्वीकार कर लिया और वे एक गणराज्य के अंतर्गत , भारत के संविधान को मानने हेतु अपनी स्वीकृति दे दिए ,,! किन्तु काश्मीर ने नहीं दी ,,,क्यों ,,? इसके कारण है नेहरू द्वारा पैदा किये गए काश्मीर के स्वयं भू नेता ,,शेख अब्दुल्ला ! जो शुरू से ही काश्मीर को स्वतन्त्र मुस्लिम राज्य की तरह देख रहे थे ,,और दूसरे उन्हें मौका मिल गया नेहरू की गलती का ,,,जो नेहरू यु एन ओ में जाकर , काश्मीर को अंतर राष्ट्रीय समस्या बना दिए ! बहाना लिया गया गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया के एक्ट १९३५ तथा , राजा की संधि में लिखी शर्तों का !
अब यह देखना जरूरी है की गवर्मेंट आफ इंडिया एक्ट १९३५ क्या है ,,?
वस्तुतः यह एक्ट तब बना था जब भारत , ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः आधीन था !इससे स्वतन्त्र भारत और उसके भविष्य से , देखा जाए तो कोई लेना देना नहीं है ! यह उस समय प्रथम विश्वयुद्ध से उपजी स्थितियों का फल था की अंग्रेजों ने , जो भाग उनके आधीन था , और जिसे वे ब्रिटिश इंडिया कहते थे , उस के लिए चुनी हुई सरकार की पद्धति प्रारम्भ की ! उस समय अंग्रेजों ने भारत को कई तीन राज्य पद्धतियों में विभक्त किया , ,,ब्रिटिश राज्य के आधीन भारत , छोटे छोटे जागीरदारों के राज , और राजाओं द्वारा शाषित राज ,,,जिनमें दक्षिण में , हैदराबाद , मैसूर , और त्रावणकोर , था , उत्तर में काश्मीर , और सिक्कम था , और मध्य में इंदौर था ! इन राजाओं को तोपों की सलामी देने का अधिकार था इसलिए ये राज्य " गन सेल्यूट " कहलाते थे !
एक्ट १९३५ में , इन राज्यों को दिए गए अधिकारों , और सम्प्रभुता का जिक्र है , इसके अलावा कुछ नहीं ! वह भी इस लिए क्यूंकि जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया राज में स्व चयनित राज की परिपाटी का एलान किया तो , ये राज चूँकि ब्रिटिश इंडिया के प्रशाशन क्वे अंतर्गत नहीं थे इस लिए इन्हे अलग रखा गया !
तो आज बार बार , भारत की स्वाधीनता के बाद , भारत के संविधान के बन जाने के बाद भी , काश्मीर को लेकर एक्ट १९३५ और राजा हरी सिंह के संधिपत्र का हवाला दे कर , काश्मीर को अलग प्रांत मानने की वकालत हो रही है ,,?? ऐसा क्यों ,,??
इस राज को भी जानने की जरुरत है !

खुद को स्वयंभू ' शेरे कश्मीर " कहने वाले ,,शेख अब्दुला ,,,ने राजा हरिसिंह के शाशन के विरुद्ध बगावत की ! जब देश में लोग अंग्रेजों की हुकूमत के विरुद्ध बगावत और विरोध कर रहे थे तो अब्दुला ने उसी तर्ज़ पर , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से शिक्षा लेने के बाद , " मुस्लिम कांफ्रेंस " नाम की पार्टी बनायी ! जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आनी के बाद , यह ' नॅशनल कांफ्रेंस " नामक पार्टी में तब्दील हो गयी ! शेख अब्दुला के पूर्वज पहले हिन्दू थे , किन्तु उनके पिता ने मुस्लिम धर्म अपना लिया तो शेख अब्दुला जन्मे ! राजा हरी सिंह ने शेख अब्दुल्ला को बगावत करने के कारण जेल में डाल दिया ! प्रारम्भ में , नेशनल कांफ्रेंस में सभी जातियों के लोग सम्मलित हुए , किन्तु बाद में वह मुस्लिम धर्म नेताओं के सम्मलित होने पर मात्र मुस्लिम नेताओं की पार्टी बन कर रह गयी ! शेख अब्दुला को जेल में डालने का विरोध हुआ , और तब गांधी जी की अपील पर विरोध प्रदर्शन जब बंद हुए तो शेख अब्दुला जनता के चाहते नेता बन कर उभर गए ! महाराजा हरिसिंह के द्वारा जब काश्मीर का विलय भारत में कर दिया गया तो उन्ही के कहँवे पर उन्हें काश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया ,,,क्यूंकि स्वीकृति पत्र में , राजा हरिसिंह ने काश्मीर की सम्प्रभुता को अलग रखने की संधि की थी !
जल्दी ही शेख अब्दुला का मुस्लिम चेहरा उजागर हो गया , जब उसने , " स्वतन्त्र काश्मीर " का नारा दिया और उसके पक्ष में भाषण दिए ! तब नेहरू को ही उसे हटा कर जेल में डालना पड़ा और वह ग्यारह साल जेल में रहा बाद में उसकी मृत्यु हो गयी ! ,,,!
अब सवाल है की क्या जूनागढ़ , और हैदराबाद की समस्या काम जटिल थी जो उस समय खुद को पाकिस्तान में विलय करने की बात कर रहे थे ! तब सरदार पटेल ने एक ही झटके में उन्हें ठंडा कर दिया और वे भारत के अंग बन कर भारत का संविधान मान लिए ! काश्मीर भी राजा शाषित राज्य था , उसके द्वारा भी विलय संधि हुई , सभी विलय संधियों में एक्ट १९३५ का प्रावधान था , ब्रिटिश इंडिया में ये राज भी स्वतन्त्र थे ,,तब वे कैसे भारत के अंग बन गए और काश्मीर नहीं बना ??
सच तो यह है की काश्मीर के प्रति शुरू से लापरवाही बरती गयी ,,,! पहले तो जब कबायलियों ने आक्रमण किया तो उन्हें पुरे काश्मीर से हटाने की जगह सिर्फ थोड़े से हिस्से से हटा कर युद्ध रोक दिया गया ,,,और इस प्रकरण को नेहरू बे वजह यु एन ओ ले जा कर विवाद का विषय बना दिए ! बाद में शेख अब्दुला को काश्मीर की गद्दी सौंप दी , जो बाद में जल्दी ही प्रकट हो गयी की वह एक स्वतन्त्र काश्मीर मुस्लिम राज चाहता है ! उसे हटा कर जेल में डाला ,,,तो घिसे पिटे एक्ट १९३७ और संधि शर्तों में उलझ कर नए एक्ट ३५ै ऐ तथा ३७० बना लिए ! ये एक्ट भी संसद में पारित नहीं हुए , और सिर्फ राष्ट्रपति से आदेश बनवा कर काश्मीर में लागू करवा दिए !
दूसरी और देखिये , क्या पी ओ के वाले काश्मीर के हिस्से पर पाकिस्तान ने ऐसे ही एक्ट बना कर लागू किये ,,?? क्या उस हिस्से के सम्प्रभुता , राजा हरिसिंह के राज के आधीन नहीं थी ? क्या उस पर ब्रिटिश काल का एक्ट १९३५ लागू नहीं होता है ,,? तब पाकिस्तान ने वहां कौन सी शराफत दिखाई , जो हम दिखाने में लगे रहे ! ,??
अब वक्त आया है जब इन ऐक्ट के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय से एक्ट हटवाने का जो संसद पारित हैं ही नहीं तो हमारे वाम पंथी प्रबुद्ध लोग हमें सीखा रहे हैं की इतिहास क्या है !
लेकिन याद रहे वक्त करवट बदलता है ,,,, जिन काश्मीरी ब्राम्हणो को यह सीख दी जा रही है की आप वहां रह कर लड़े क्यों नहीं , उनकी और से जबाब है की जब बल का ही प्रयोग करना है तो क्यों ना हम पुरे काश्मीर को वापिस लेने के लिए करेंगे ,,और जो एक्ट लगाए वो हम अपने ही न्यायालय से रद्द करवाएंगे !
राजा हरिसिंह ने अपने ही स्वीकृति पात्र में यह स्वीकार किया की भारत सरकार द्वारा यदि कोई अन्य नियम , काश्मीर के शाशन के लिए बनाये जाते हैं तो उनके क्रियान्वय हेतु , यदि हमारी आपसी स्वीकृति होती है , तो वे नियम शाशन हेतु प्रतिबद्ध रहेंगे !
राजा ने कहा की भारत सरकार अनिवार्यतः काश्मीर की जमीन का आधिपत्य करने के लिए स्वयं अधिकारी नहीं रहेगी , किन्तु यदि उसे आवश्यक होगा तो वह जमीन में उन्हें भू भाग की राशि के भुगतान पर देने के लिए अनुबंधित हूँ !
राजा ने यह भी लिखित रूप से कहा , की वह भविष्य में भारत के लिए रचे गए किसी भी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं रहेंगे ! उन्होंने यह भी कहा की उनको एक शाशक के रूप में मिलने वाली सभी सुविधाएं भी भारत सरकार जारी रखेगी !
यह स्वीकृति पात्र , भारत सरकार एक्ट १९३5 के परिप्रेक्ष्य में , रियासतों को दिए गए प्रावधानों के अंतर्गत स्वीकार माना जावे !



     राजा हरिसिंह के शाशन काल में ही नेहरू ने ,,मुस्लिम लीडर और तत्कालीन अलगाव वादी , नेता ,

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

 सं १९७० में जब मैंने , एक इंजीनियर के बतौर , म:प्र: विद्युत् मंडल में ज्वाइन किया तो मुझे ट्रेनिंग देने वाले मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने हँसते हुए मुझे उनकी कुर्सी के पीछे लिखे वाक्य को पढ़ने के लिए कहा ,,जहाँ लिखा था--" सप्लाई इज   सुप्रीम " !,,,,मेरे पढ़ लेने के बाद उन्होंने कहा,, इसका अर्थ समझते हो ?  ,,,जिस विभाग  की जिस  शाखा  में तुम कार्य करने जा रहे हो  वह उपभोक्ताओं को विद्युत्  वितरित की शाखा है ,,जिसका काम है विद्युत् का रखरखाव और विद्युत् का संचालन   --" संचालन _ संधारण " ,,,,,यानी अंगरेजी में " आपरेशन एन्ड मेंटेनेंस " !  और ध्येय वाक्य है " अनवरत विद्युत् प्रदाय ही  प्रथम  ध्येय  " !

    इन दो वाक्यों का अर्थ बाद में मैंने बखूबी समझा !ये विद्युत् वितरण व्यवस्था के मूल मन्त्र थे ,,! संधारण यानी मेंटेनेंस  यद्यपि बाद में लिखा गया था किन्तु वास्तव में वह सर्व प्रथम था ! जो अधोसंरचना या  व्यवस्था है , उसका मेंटेनेंस सबसे पहले जरूरी था , ताकि वह चरमराए नहीं , और किसी आसन्न संकट का कारण ना बने ,!  और यदि वह किसी दैवीय प्रकोप से छिन्न भिन्न भी हो तो , त्वरित आपरेशन , यानी अविलम्ब , संचालन कर कम से कम अवधि में उसे दुरुस्त कर , हालातों पर काबू पाना !  इन सब का ही निचोड़ था ,,, " सप्लाई  इज    सुप्रीम " याने सभी कर्तव्य ,,,मात्र अनवरत विद्युत् प्रदाय करने के लिए है  क्यूंकि वह जीवन का महत्वपूर्ण अंग है !

     जैसे जैसे समय बदलता गया ,,,हम मूल ध्येय से हटते गए ,,! ४० वर्ष की नौकरी करने के बाद जब रिटायर हुआ तो ध्येय वाक्य बदल चुका था ,,,वह था " अधिकतम -राजस्व " ,,! येन केन प्रकारेण ,,, विद्युत् बेच कर विभाग को अधिकतम राजस्व जुटाओ ! यह बदलाव हमारे बदलते चरित्र के कारण हुआ , या देश की आवश्यकताओं के कारण , यह शोध का विषय है ,,!  किन्तु एक बात जरूर लगी की हम ब्रिटिश राज के उस पुराने माहौल में लौट गए हैं जहाँ जनता का अर्थ सिर्फ बाज़ार है जहाँ बिना किसी संवेदना के मात्र व्यवसाय करना और धन उगाना ही उद्देश्य है !

    पिछले ७० सालों में कई सरकारें बनी , ,,,कई अलग अलग उद्देश्यों और सिद्धांतो के साथ ,,, !वोट बैंकों के पूंजी के साथ कई नेता अवतरित हुए , और सरकारों में , अपने वोटबल के आधार पर ' मंत्री ' पदों पर आसीन हुए ,,! उन्हें बहुत बड़े बड़े विभाग सौंपे गए ,,,उनके संचालन संधारण के लिए ,,,किन्तु वे उन विभागों की मूल आत्मा से बिलकुल अनिभिज्ञ थे ! ना तो वे यह समझ पाए की ये विभाग " मानव -सेवा " की किस उद्देश्य से बंधे हैं और ना यह जान पाए की की उनका महत्त्व क्या है ! अपनी काम जानकारी को  ना बढ़ाते हुए , उन्होंने अपने अधीनस्थ आई  ऐ इस सचिव को मित्र बना लिया और उन्हें ही उसकी बागडोर संचालन के लिए सौंप दी ! नतीज़ा यह हुआ ,,की प्रशाशन के लिए प्रशिक्षित किये गए सचिव ,   अपने पुराने ढर्रे पर प्रशाशन को ज्यादा महत्त्व देते हुए विभाग चलाते रहे ,,,और " मेंटेनेंस " का कार्य लालफीताशाही वाले बाबुओं , और विभागाध्यक्ष पर छोड़ दिया !

        यह भी सच है की भारत में जो भी नियम बने हैं ,,,उन्हें काम ना करने के लिए एक बैरियर की तरह ज्यादा उपयोग किया जाता है ! नियम इसलिए नहीं है की काम किस तरह हो सकता है ,,,बल्कि नियम इस लिए हैं की काम   किस तरह  नहीं हो सकता है ! इसलिए  जब बैरियर बने , तो भ्रस्टाचार ने सर उठाया ,,,यहाँ तक की बिना काम हुए कार्यों के बिल तो नियम अनुसार भुगतान हो गए , किन्तु किये हुए वैध कार्यों के भुगतान भी नियम के नाग पाश में बंध के मूर्छित हो गए !

     उत्तरप्रदेश के अस्पताल में , तीस लोगों की मृत्यु  कैसे हुई यह ' लीपा पोती ' की जांच वाली कार्यवाही हो सकती है ,,,लेकिन वस्तु  स्थिति यह है ,,की अस्पताल जैसे  जीवनदायी  संस्थान में प्राथमिक चीज़ , " आक्सीजन " और " दवाएं " ,,,,,"  संधारण "  की  सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत जीवित क्यों नहीं रह पायी ,,??  क्या स्टॉक मेन्टेन्स करना ' सर्वोच्च  ध्येय " नहीं हो सकता था ,,,जिसे हर कीमत पर पहले अनवरत बनाये रखा जाता  ??  क्या कोई मंत्री इस बात की जबाबदारी लेगा की यह उसका ध्येय वाक्य नहीं था ,,,जिससे इतनी मासूम जाने चली गयीं ,,! क्या  विभाग के बाउ और विभागाध्यक्ष बता पाएंगे की किन नियमों के चलते वे लंबित बिल पेमेंट नहीं हो पाए ,,,जिनकी व्यावसायिक परिणीति ,,लोगों की मरतीत्य के रूप में बदल  गयी। .?