शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

 सं १९७० में जब मैंने , एक इंजीनियर के बतौर , म:प्र: विद्युत् मंडल में ज्वाइन किया तो मुझे ट्रेनिंग देने वाले मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने हँसते हुए मुझे उनकी कुर्सी के पीछे लिखे वाक्य को पढ़ने के लिए कहा ,,जहाँ लिखा था--" सप्लाई इज   सुप्रीम " !,,,,मेरे पढ़ लेने के बाद उन्होंने कहा,, इसका अर्थ समझते हो ?  ,,,जिस विभाग  की जिस  शाखा  में तुम कार्य करने जा रहे हो  वह उपभोक्ताओं को विद्युत्  वितरित की शाखा है ,,जिसका काम है विद्युत् का रखरखाव और विद्युत् का संचालन   --" संचालन _ संधारण " ,,,,,यानी अंगरेजी में " आपरेशन एन्ड मेंटेनेंस " !  और ध्येय वाक्य है " अनवरत विद्युत् प्रदाय ही  प्रथम  ध्येय  " !

    इन दो वाक्यों का अर्थ बाद में मैंने बखूबी समझा !ये विद्युत् वितरण व्यवस्था के मूल मन्त्र थे ,,! संधारण यानी मेंटेनेंस  यद्यपि बाद में लिखा गया था किन्तु वास्तव में वह सर्व प्रथम था ! जो अधोसंरचना या  व्यवस्था है , उसका मेंटेनेंस सबसे पहले जरूरी था , ताकि वह चरमराए नहीं , और किसी आसन्न संकट का कारण ना बने ,!  और यदि वह किसी दैवीय प्रकोप से छिन्न भिन्न भी हो तो , त्वरित आपरेशन , यानी अविलम्ब , संचालन कर कम से कम अवधि में उसे दुरुस्त कर , हालातों पर काबू पाना !  इन सब का ही निचोड़ था ,,, " सप्लाई  इज    सुप्रीम " याने सभी कर्तव्य ,,,मात्र अनवरत विद्युत् प्रदाय करने के लिए है  क्यूंकि वह जीवन का महत्वपूर्ण अंग है !

     जैसे जैसे समय बदलता गया ,,,हम मूल ध्येय से हटते गए ,,! ४० वर्ष की नौकरी करने के बाद जब रिटायर हुआ तो ध्येय वाक्य बदल चुका था ,,,वह था " अधिकतम -राजस्व " ,,! येन केन प्रकारेण ,,, विद्युत् बेच कर विभाग को अधिकतम राजस्व जुटाओ ! यह बदलाव हमारे बदलते चरित्र के कारण हुआ , या देश की आवश्यकताओं के कारण , यह शोध का विषय है ,,!  किन्तु एक बात जरूर लगी की हम ब्रिटिश राज के उस पुराने माहौल में लौट गए हैं जहाँ जनता का अर्थ सिर्फ बाज़ार है जहाँ बिना किसी संवेदना के मात्र व्यवसाय करना और धन उगाना ही उद्देश्य है !

    पिछले ७० सालों में कई सरकारें बनी , ,,,कई अलग अलग उद्देश्यों और सिद्धांतो के साथ ,,, !वोट बैंकों के पूंजी के साथ कई नेता अवतरित हुए , और सरकारों में , अपने वोटबल के आधार पर ' मंत्री ' पदों पर आसीन हुए ,,! उन्हें बहुत बड़े बड़े विभाग सौंपे गए ,,,उनके संचालन संधारण के लिए ,,,किन्तु वे उन विभागों की मूल आत्मा से बिलकुल अनिभिज्ञ थे ! ना तो वे यह समझ पाए की ये विभाग " मानव -सेवा " की किस उद्देश्य से बंधे हैं और ना यह जान पाए की की उनका महत्त्व क्या है ! अपनी काम जानकारी को  ना बढ़ाते हुए , उन्होंने अपने अधीनस्थ आई  ऐ इस सचिव को मित्र बना लिया और उन्हें ही उसकी बागडोर संचालन के लिए सौंप दी ! नतीज़ा यह हुआ ,,की प्रशाशन के लिए प्रशिक्षित किये गए सचिव ,   अपने पुराने ढर्रे पर प्रशाशन को ज्यादा महत्त्व देते हुए विभाग चलाते रहे ,,,और " मेंटेनेंस " का कार्य लालफीताशाही वाले बाबुओं , और विभागाध्यक्ष पर छोड़ दिया !

        यह भी सच है की भारत में जो भी नियम बने हैं ,,,उन्हें काम ना करने के लिए एक बैरियर की तरह ज्यादा उपयोग किया जाता है ! नियम इसलिए नहीं है की काम किस तरह हो सकता है ,,,बल्कि नियम इस लिए हैं की काम   किस तरह  नहीं हो सकता है ! इसलिए  जब बैरियर बने , तो भ्रस्टाचार ने सर उठाया ,,,यहाँ तक की बिना काम हुए कार्यों के बिल तो नियम अनुसार भुगतान हो गए , किन्तु किये हुए वैध कार्यों के भुगतान भी नियम के नाग पाश में बंध के मूर्छित हो गए !

     उत्तरप्रदेश के अस्पताल में , तीस लोगों की मृत्यु  कैसे हुई यह ' लीपा पोती ' की जांच वाली कार्यवाही हो सकती है ,,,लेकिन वस्तु  स्थिति यह है ,,की अस्पताल जैसे  जीवनदायी  संस्थान में प्राथमिक चीज़ , " आक्सीजन " और " दवाएं " ,,,,,"  संधारण "  की  सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत जीवित क्यों नहीं रह पायी ,,??  क्या स्टॉक मेन्टेन्स करना ' सर्वोच्च  ध्येय " नहीं हो सकता था ,,,जिसे हर कीमत पर पहले अनवरत बनाये रखा जाता  ??  क्या कोई मंत्री इस बात की जबाबदारी लेगा की यह उसका ध्येय वाक्य नहीं था ,,,जिससे इतनी मासूम जाने चली गयीं ,,! क्या  विभाग के बाउ और विभागाध्यक्ष बता पाएंगे की किन नियमों के चलते वे लंबित बिल पेमेंट नहीं हो पाए ,,,जिनकी व्यावसायिक परिणीति ,,लोगों की मरतीत्य के रूप में बदल  गयी। .?