शनिवार, 7 मई 2016

                                                      .......1.......

इधर कुछ दिनो से , कई मित्रों के ब्लॉग मे , प्यार को लेकर कई किस्से लिखे जा रहें हैं !प्यार क़ी कथाओं का अंबार लगा है ! प्यार पर एस एम एस हैं, और प्यार क़ी परिभाषा तथा विवेचना पर टिप्पणी क़ी धारा बह रही है !

एसे मे मेरे टटपूंजिया विचार वाले ब्लॉग पर जब कोई टिप्पणी मुझे नही मिली तो दिल ने कहा,-
यार !! तुम भी तो सोचो , क्या तुमने कभी प्यार किया ?या फिर तुम्हे भी कभी प्यार हुआ ?
दिल के उकसाने पर मेने यादों क़ी पिटरी खोली तो एक प्यार का वाक़या , जो आक्सीजन लेने के लिए अंदर छ्टपटा रहा था, उछल कर बाहर आ गया !उसे देखते ही मेने कहा ; हाँ शायद यही है वह जिसकी मेरे को जरुरत है
सन 1974 मे शायद में जवान रहा होऊंगा ! प्यार के लिए जवानी क़ी उतनी ही जरूरत होती है , जितनी क़ी बिजली को बहने के लिए तार क़ी ! बिजली को अगर बहने के लिए तार चाहिए तो जवानी को ठहरने के लिए प्यार चाहिए !
उस वक्त़ , प्यार करने के लिए मुझमे पर्याप्त गुण मौजूद थे , जैसे क़ी में गिटार बजाता था, कविता लिखता था,गीत गाता था, और चश्मा लगाता था !
चश्मा लगाना उस समय का एक उच्चस्तरीय गुण था क्योंकि फ़िल्मो मे हीरोइने या तो चश्मा लगाने वाले अमिताभ , जितेन्द्र, जैसे जीनियस हीरो पर मरती थी या फिर अमोल पालेकर जैसे किसी निरे बुद्धू पर.!
खैर !!..
में जीनियस दिखने क़ी कोशिश करता था, और यह अंदाज़ लगाने क़ी कोशिश करता रहता था कि कितने युवा लड़कियाँ मुझे आँखों क़ी कोर से निहार रही है ! .,उस समय शर्म और प्यार का कॉकटेल चलता था, नीत प्यार नही चलता था
!एक दिन मेरे एक विभागीय मित्र ने मुझे फिल्म दिखाने को कहा ! मेने उसकी बात मान ली ! क्यौकि वह मेरा मित्र ही नही, मेरा गहन प्रशंसक था ! यदि वह कोई लड़की होता तो मे उसके प्यार मे फँस कर उसीसे विवाह कर लेता !
उस छोटे से शहर मे बालकनी से फिल्म देखने वालों कि संख्या बहुत थी !इसलिए हमे बीच क़ी कतार का टिकिट मिला !टिकिट ले कर हम दोनो टाकीज़ मे घुस कर अपनी सीट पर बैठ गए !
थोड़ी देर मे सभी सीटें भर गयी, और स्क्रीन के पिछे लगा स्पीकर हिट गाने बजाने लगा ! आदतन मेने अपने चारों ओर निगाहें घुमाई - कैसे कैसे लोग,और कैसी कैसी युवा लड़कियाँ कहाँ कहाँ बैठी है !
देखा तो मेरे आगे क़ी दो कतार छ्चोड़कर , तीसरी कतार से एक सुंदर आकृति , घूम कर मेरी ओर देख रही थी !मुझे खुद क़ी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई और और तुरंत अपना मुँह वापिस मोड़ ली !
बला का सौंदर्य था !-
गोरा रंग,सुंदर नाकनक्श, बड़े बड़े नेत्र , सुराहीदार गर्दन पर बल खाती लंबी वेणी ,!! में हतप्रभ रह गया !
स्क्रीन पर तो सुंदर हीरोइन दिखने मे अभी देर थी ! लकिन यह हीरोइन तो टाकीज़ मे ही विद्यमान थी !
तभी उस मूर्ति नेफिर पीछे मूड कर देखा !- उसके पतले गुलाबी होंठ प्यार क़ी मुद्रा मे हँसे, और फिर फैल गए , छिपे हुए दाँतों क़ी धवल पंक्ति भी अपनी छटा बिखेर गई !
मुझे देख कर उसने फिर अपनी गर्दन वापिस मोड़ ली !
यह घटना फिर से घटती, इस से पहले ही अंधेरा हो गया और स्क्रीन पर फिल्म डिवीज़न क़ी भेंट चढ़ गई !
मेरा मन अब स्क्रीन पर बिल्कुल नही लग रहा था !मेरा मित्र मुझे फिल्म के सोन्दर्य पक्ष के बारे मे बताने लगा !मसलन- द्रश्य कितना सुंदर है, हीरोइन कितनी भोली है हीरा उसे कैसे चाहता है वग़ैरह..! लकिन मे तो अपनी सीट के आगे क़ी तीसरी कतार मे नज़र गडाने लगा - ! ना जाने कब वह सुराहीदार गर्दन मुड़े और और फिर मुझे देखे !
और फिर मेरी आरज़ू पूरी हुई ! जैसे ही स्क्रीन पर रोमांटिक गीत शुरू हुआ , फिल्म के हीरो हीरोइन घास पर लोटे, हीरो अपना मुँह हीरोइन के मुँह के पास लेजाकार गाना गाने लगा , तभी वह गर्दन फिर पलटी!
इस बार उन आँखों मे रोमांस का नशा था !मेरी ओर देख कर वह फिर उसी अदा से वापिस पलट गई ! मेरा दिल बल्लिओ उच्छलने लगा
- " हे भगवान !! यह कौन है जो मुझ मे इतनी दिलचस्पी ले रही है ??
इतनी सुंदर कन्या केलिए तो मे सभी गुणों से पूर्ण होने पर भी खुद को उसके योग्य नही समझता था !
फिल्म मे क्या हुआ कैसे हुआ मे कुच्छ नही देख पाया !सिर्फ़ सम्मोहित सा टकटकी लगाए , अंधेरे मे आगे क़ी सीट पर आँखे गड़ाए रहा !
तभी इंटरवल हुआ , और हॉल रोशनी से जगमगा उठा !
लकिन इस बार उस लड़की ने पिछे मुड़कर नही देखा !
मेरे दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे हिलाया और कहा - " चलो सौरभ चाय पिलाओ !"
में अनमने भाव से उठ गया !दरवाजे पर कुच्छ और दोस्त मिले -सभी ने कमेंट किए _ क्या शानदार फिल्म है !! ,तुम्हे कैसी लगी सौरभ ?
मे चुप रहा ! मुझे जो शानदार दिखा था , वह मे भूल नही पा रहा था !
बाहर लाबी मे आकर मेरे मित्र ने पुचछा
-"क्या बात है यार ? खोए खोए से क्यो हो ? क्या सेंटिमेंटल हो गए हो ?"
मेने कहा - " नही यार !!"
-"तो कुच्छ तो है ही ! बतलाओ !!" मेरा दोस्त मेरे पीछे ही पड़ गया !
मेने सोचा - फिल्मों मे हीरो के प्यार का राज़दार उसका दोस्त ही तो होता है ! तो क्यों ना मे अपने इस दोस्त को अपना राज़दार बना लू ?
मेने उसे बताया _ "यार ! टाकीज़ मे मेरे सीट के आगे बैठी एक लड़की मुझे मूड मूड कर बार बार देख रही है ! मेने पहले उसे कभी नही देखा ! वह एसा क्यो कर रही है मे मुझे समझ मे नही आरहा है !"
दोस्त मुस्कराया , फिर बोला - यह प्यार का मामला है - 'भाई ! तुम प्यार को पहचान नही रहे हो ! "
-" लकिन मेने तो उसे पहले कभी देखा ही नही !"-
- तुमने उसे भले ही ना देखा हो ,पर उसने तुम्हे पहले ज़रूर देखा है ! हो सकता है - कभी तुम गिटार बजा रहे होगे और वह श्रोताओं मे बैठी रही हो ! या फिर तुम कविता कर रहे होगे ..तब,..या फिर..""
-" बस बस रहने दो भाई !! चलो जल्दी अंदर चलो मे तुम्हें उसको दिखाता हूँ !"
में उसका हाथ पकड़ कर वापिस हाल मे लपका !
लकिन मेरी किस्मत !!- उसी समय हाल मे फिर अंधेरा हो गया !
अपनी सीट पर जाकर हम लोग बैठ गये ! मेरे दिल मे थोड़ी थोड़ी गुदगुदी होने लगी! मेने तब तक प्यार सिर्फ़ फिल्मों मे ही देखा था !लकिन ना तो प्यार किया था और ना ही मुझे प्यार हुआ था !आस यह घटना तो मुझे प्यार के पोखरे मे डुबोने लगी थी!
यह कैसे मुझे जानती है ..?क्या वाकई मेरे किसी गुण से प्रभावित है ..?क्या वाकई मुझ से प्यार करना चाहती है ..? मे धीरे धीरे डूबने लगा !
तभी मेरे दोस्त ने मेरा हाथ दबाया ! मेने चौंक कर उसे देखा तो उसने अंधेरे मे मुझे इशारा किया - -,
सामने क़ी सीट क़ी गर्दन फिर मूडी हुई थी !लकिन जब तक मे उसे देखता वह फिर सीधी हो गई !
फिल्म का समय जल्दी ही ख़तम हो गया ' दी एंड ' के पहले ही परिवार वाले लोग उठ कर दरवाजे क़ी ओर बढ़ लिए !जल्दी ही दरवाजे पर भीड़ जमा हो गयी !
मे भी धक्का खाते हुए जल्दी बाहर निकलने क़ी कोशिश करने लगा - ताकि बाहर निकल कर उस सुंदर कन्या को पूरी तरह ठीक से देख सकूँ !
लकिन ऐसा नही हुआ !मे पिछे रह गया !

- मित्र का हाथ पकड़ कर मे जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरने को हुआ तो देखा क़ी वह कन्या पूरी सीढ़िया उतर कर मुझ से काफ़ी आगे निकल गई है !
मे भीड़ मे जगह बना कर तेज़ी से नीचे उतरा ! लकिन तब तक वह कन्या बाहर लान मे पहुँच गई - और एक लेंब्रेटा स्कूटर पर उचक कर बैठ गई !
मुझे कुच्छ दिखा नही तो मेने उस लेंब्रेटा का नंबर नोट कर लिया !
वह नंबर प्लेट यद्यपि बरसात मे पानी खाकर ढूढ़ली हो गई थी , फिर भी मेने उसका नंबर हथेली पर लिख लिया
- एल ओ वी 22 16... !
अब मुझे उस कन्या के बारे मे एक सूत्र मिल गया था !लॅंब्रेटा का नंबर..!
तभी मेरा दोस्त आ गया ! बोला
- " क्या हुआ यार !! तुमने उसे देखा..?
-" नही यार !! नही देख पाया ! लकिन वह लंबी , छहःरहे बदन क़ी सुंदर लड़की है !! बाकी उसकी अदाएं तो देख ही चुका हूँ !"
दोस्त फिर मुस्कराया , बोला- "मेने काफ़ी कुच्छ देख लिया है ! - यार! वह मेरी भाभी बनने लायक है !"

" भाभी ??" -मे चौंका !

- " हाँ भाभी !! यानी तुम्हारी पत्नी !- अब दोस्त भी शरारत से मुस्कराने लगा !

मेरी बची खुची बुद्धि भी ख़तम हो गई !!मेने कहा -
" लकिन मे तो उसे जनता ही नही "
दोस्त बोला -" अब हम उसे जान लेंगे ! लेंब्रेटा का नंबर है हमारे पास !"
मेने गिरते पड़ते अपनी मोटर साइकिल क़ी ओर कदम बढ़ाए !! दोस्त को घर छ्चोड़ कर मे अपने घर पहुँचा !
देर रात तक पहले तो नींद नही आई,
और जब आई तो स्वप्न मे मुझे कई लेंब्रेटा दिखे !
                                        
                                       .......2..........
दूसरे दिन मेरे प्यारे दोस्त क़ी मेहरबानी से , यह खबर बिजली क़ी तरह मेरे दोस्तों के बीच फैल गई !

किसी को विश्वाश ही नही हुआ , कि में प्यार कर सकता हूँ - या मुझे प्यार हुआ है ! क्योंकि प्यार के प्रयोगात्मक कार्य मेने कभी नही किए थे !

मेरे मित्रों मे सभी लोग थे !

सिविल कांट्रेक्टर, लेखक, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, गीतकार , संगीतकार वग़ैरह वग़ैरह..,!

मुझ से मिलने पर वे पूछ ने लगे -

" मिला लेंब्रेटा का पता ..?"
अब में क्या जबाब देता ..?

मेरे एक मित्र जो इरिगेशन विभाग मे इंजीनियर थे , प्यार मे बहुत एक्सपर्ट थे ! उन्होने कई बार प्यार किया था !और प्यार के सभी लटकों झटकों से परिचित थे!
एक और मित्र जो साउथ इंडियन थे , उन्होने प्यार करके एक बंगाली लड़की को अपनी पत्नी बनाया था , मुझे बहुत चाहते थे !
तीसरे मित्र प्रोफ़ेसर थे !उन्होने एक डिप्टी कलेक्टर की बेटी के प्यार मे डूबकर , घर से भागकर आर्य समाज मंदिर मे विवाह किया था !
ये सब मुझे प्यार से ग्रसित मानकर , मेरी मुफ़्त सेवा के लिए तत्पर हो गए !

सब लोग एक साथ मेरे घर आ धमके !
बोले -

" हम आज ही से शुरू करेंगे अभियान..!"

"कैसा अभियान ? "- मेन्ने सकपका कर पूछा !

मेरे अभिन्न मित्र ने , जो टाकीज़ मे मेरे साथ था , मुस्क्राकर कहा -
" देवी सीता को ढूँडने का अभियान "

सभी लोग एक बार ज़ोर से हँसे !फिर मेरी ओर शरारत भरी निगाह उठा कर बोले-
" अपनी भाभी को तलाशने का अभियान !"

में न हंस सका , न गंभीर हो सका!
दिल था की मान ही नही रहा था कि वह लड़की मुझे नही चाहती होगी,

उसका टाकीज़ मे मुड़कर देखना और मुसकराना मुझे बार बार याद आ जाता था !
फिर भी अपने मन को दबाकर मे मौन रहा !-
' भाभी 'शब्द मेरे दिल मे गुदगुदी करने लगा था !

मेने कहा-

" लकिन कैसे ? में तो उसे जानता ही नही, कभी भी पहले उसे नही देखा ! सिर्फ़ एक स्कूटर का नंबर भर है मेरे पास !"

वे बोले -
" वही तो है जादुई चाबी !, अब देखो हम क्या करते है!"

मेरे इंजीनियर मित्र अपने साथ एक परिचित मेकेनेक को लाए थे !

उन्होने उसे नंबर देते हुए कहा-

" शहर कि हर मेकेनेक कि दुकान को छान लो !यह स्कूटर कहाँ सुधरता है , शाम तक पता लगा कर बताओ !"
मेकेनेक ने नंबर को कई बार देखा- पढ़ा, शारलक होम्स कि तरह उसकी चतुर आँखे फैली और सिकुड़ी, लकिन उन मे चमक नही आई !

सब लोग समझ गए , वह इस नंबर के बारे में ज़्यादा कुछ नही जानता !

वह बोला -

"में राजदूत मोटर साइकिल बनाता हूँ ! लेंब्रेटा स्कूटर आजकल बहुत कम रह गए हैं - फिर भी में दो घंटे मे आकर आपको बताता हूँ !"

जब वह मुड़कर वापिस चला गया तो दोस्तो क़ी चौकड़ी फिर सक्रिय हुई !

प्रोफ़ेसर मित्र , जो इंग्लिश लिट्रेचर के प्रोफ़ेसर थे, ने पूछा -
कुछ अंदाज़ करो , वह कन्या तुम्हारे किस गुण से प्रभावित हुई होगी ?- जैसे कविता से, या गायन से या...,या तुम्हारे इस जीनियस रूप से ?..

मुझे अपने अपने ढेर सारे गुणों से चिढ़ होने लगी ! पता नही उसे क्या अच्च्छा लगा होगा ?
मुझ से तो अच्छे मेरे ये मित्र गण थे जिनके पास सिर्फ़ एक ही गुण था - ' लड़की को मोहित करने का गुण !'

मोहित करने के लिए प्रोफ़ेसर मित्र ने रोमांटिक नॉविलों का सहारा लिया था !
सौथ इंडियन मित्र नायर ने जोक्स का !
इंजीनियर मित्र ने सुहाने गीतों के केसेट देकर लड़की का दिल जीता था !

सभी एक ही गुण के धनी थे !

में ने कहा- " में क्या जानू वह मेरे किस गुण को चाहती है ?"

नायर कि बंगाली पत्नी भी साथ आई थी !वह बोली -
-"बाबा ! क्या तुम रोमांटिक कविता लिखते हो ?"

मेने कहा- " नही"

तो फिर रोमांटिक गाने ज़ोर ज़ोर से गाते हो ?

मेने कहा -
" नही भाभी ! मुझे जो अच्छा लगता है , उसे ही मैं गाता बजाता ,- लिखता पढ़ता हूँ ! में उसी से रोमांस करता हूँ !"

-"लड़की को लड़के कि कौन सी चीज़ अच्छी लग जाए ,ये तुम लोग नही जान सकते ! नायर ने तो मुझे एक बार अपने हाथों से खाना बना कर खिलाया , में इन पर मर मिटी ! क्या शानदार मच्हली बनाता है नायर !"
सब हंस पड़े !

मे घबराने लगा !
अब ना जाने किस बात पर रींझ कर वह कन्या मुझसे प्यार कर रही है !- यह बहुत ही भयानक बात थी !
तभी वह मेकेनेक विजेता कि तरह लौट कर वापिस आया! आते ही बोला -

-"भाई जी ! वह स्कूटर" डी एफ ओ द्विवेदी 'का है ! बहुत बिगड़ता है, बार बार राजू मेकेनेक के गेरेज़ मे जाता है !"

" हो य " -- सभी ने ज़ोर से एक हुंकार भरी !

" द्विवेदी डी.एफ.ओ. को में जानता हूँ !"- इंजीनियर मित्र ने कहा- " वो सिविल लाइन मे मेरे क्वाटर के आगे तीसरी लाइन मे रहते है!"

तीसरी लाइन ?? मेने सोचा - यह तीसरी लाइन टाकीज़ मे भी थी और अब फिर आ रही है ! अजीब संयोग है !

- " तो फिर पहला प्रयोग !!', आज मेरे घर मे संगीत सभा होगी, जिसमे द्विवेदी को सपरिवार बुलाया जाएगा ! गिटार बजेगा!

'और अगर द्विवेदी नही आए , या वह कन्या को साथ नही लाए तो ?'

प्रोफ़ेसर दोस्त ने आशंका ब्यक्त की !

-"तो फिर हम अपने क्वाटर के उपर लौडस्पीकर लगाएँगे ! उसका मुँह भाभी के घर कि तरफ करेंगे , ताकि प्यार कि धुनें सुन कर वह बाहर आए !"

" होय " - सभी ने समवेत स्वर मे फिर जोरदार हुंकार भरी1

में सोचने लगा - ये लोग क्या कर रहे है - !
तभी नायर बोला -

-"अगले दिन अगला प्रयोग होगा !में कन्या के घर के ठीक सामने इस आशिक को अपने स्कूटर से हल्की टक्कर मारूँगा !ये गिर कर बेहोश होने की एक्टिंग करे - हम इसे उठाकर लड़की के घर मे ले जाएँगे - फ़र्स्ट मेडिकल हेल्प के लिए !" वहाँ दोनो एक दूसरे को जी भर कर देख लेंगे !"

यह पूरी तरह फिल्मी सीक़वेंस थी ! मुझ मे अन्य गुण तो थे - लकिन मेने कभी एक्टिंग नही की थी !जो कुच्छ था ओरिजनल ही था !

मेने कहा - " यह मे नही कर पाउन्गा!"

प्रोफ़ेसर ने कहा - " यह बिजली का इंजीनियर है !मीटर चेक करने के लिए वहाँ जाए !वह लड़की इसे बिटहाल कर चाय पिलाएगी और ढेर सारी मीठी मीठी बाते करेगी !" "होय "- यह सबसे उँच्ची हुंकार उठी !

मेकेनेक बोला - " भाई जी ! आप अपना संदेश मुझे टेप करके देदे मे उसे दे आउग! !"

यह रिस्क थी ! टेप अगर ग़लत हाथो मे पड़ गया तो फ़ज़ीहत है !

मेने कहा - " पहला प्रयोग ठीक है ! में आज इंजीनियर मित्र के घर मे गिटार बजाउँगा !"
--'होय " - सबने फिर हर्ष मिश्रित हुंकार भरी !

डी एफ ओ ने सभा मे आने से इनकार कर दिया !!

उस रात को एक लौडस्पीकर लाया गया !, उसका मुँह कन्या के घर की तरफ किया गया ! एमपलिफायर का फूल वोल्यूम खोला गया !

मेने गीत शुरू किए ! मेरा प्रिय गीत था - ' चंदा मामा दूर के '
दोस्तों ने कहा यह ठीक नही !

मेने दूसरे पुराने गीत बजाने शुरू किए - 'ये जिंदगी उसी की है ' , 'आजारे अब मेरा दिल पुकारा ', 'जाग दर्द इश्क जाग ,'

लकिन मेरे दोस्त झल्ला उठे !- " ये क्या मर्सिया गा रहे है आप !!"
कोई लेटेस्ट रोमांटिक गीत बजाईए !"

नये गीतों की मेरी प्रेक्टिस नही थी , मरी पसंद के गीत तो पुराने मेलोडियस गीत ही थे !फिर भी दोस्तों के कहने पर नए गीत बजाने की कोशिश करने लगा !

गीतों की प्रेक्टिस न होने के कारण गिटार बेसुरा बजने लगा !

थोड़ी देर मे , बगल मे रहने वाले , घर द्वार वाले बंगाली मोश्य आ गए !
बोले - " अब बंद कीजिए यह संगीत ! 'रात '' खराब' हो रही है ! सोने दीजिए हमें !"

मेरे मित्र उनसे उलझने लगे !
' हमारा घर है '-हमारा मन है ', हम जो चाहें सो करें ', वगेरह !

तभी मुहल्ले के बहुत से और सभ्य ब्यक्ति आ गए !
युद्ध का वातावरण बनते देख मेने गिटार बंद कर दिया !
प्रयोग की वह रात निराशा भरी रही ! 
उसके बाद दो तीन दिन तक सभी मित्र अपने अपने कामों में उलझे रहे , अतः कोई किसी से नही मिला !

हाँ , में ज़रूर उस डी एफ ओ के क्वार्टर के सामने से कई बार गुज़रा लकिन मुझे वह चेहरा नही दिखा !

मुझे उस क्वार्टर के माली ने घूमते देख कर टोका -

" राह भटक गये हो क्या साहब ?"
मेने शरमा कर कहा - " कुछ ऐसा ही है !"

चौथे दिन हम सब दोस्त फिर इंजीनियर मित्र के घर एकत्रित हुए !
सभी लोग मुझे कन्या से मिलवाने के उपायों पर चर्चा करने लगे !

तभी पड़ोसी बंगाली महोदय तूफान की तरह ड्राइंग रूम मे घुसे !घुसते ही बोले -

- " क्यों सहा ! कुछ सुना तुमने ?"

मेरे मित्र ने पूछा -
" क्या हुआ ? "

बंगाली महाशय - बोले

-" वो डिप्टी कलेक्टर का बाइस साल का जवान लड़का , फाँसी लगा कर मर गया !"

" डिप्टी कलेक्टेर नारंग का लड़का ?? 'नीरज ' ?" वह दुबला सा काला क़ाला लड़का नीरज ?"

"हाँ ! वही ! पुलिस आई है ! जानते हो तलाशी लेने मे क्या मिला ??"

-"क्या मिला ?"

- "ढेर सारे प्रेम पत्र ! " - बंगाली महाशय थोड़े ब्यांगात्मक लहजे मे बोले !

-"प्रेम पत्र ?? - किसके प्रेम पत्र ?"

-" और किसके प्रेम पत्र ! ! - उसके क्वार्टेर के सामने रहने वाले डी.एफ.ओ. की लड़की के हाथ के लिखे प्रेम पत्र !"

हम सब अवाक रह गये !

मुझे तो जैसे साँप ही सूंघ गया !

हमारे चेहरे पढ़ते हुए बंगाली महाशय बोले -

"- वो लोग प्यार करता था छुप छुप कर ! उधर चार दिन पहले , फिल्म देखने भी गया था दोनों !
लड़की अपने पिता के साथ गई थी , नीरज अकेला गया था !- उस दिन मे भी गया था फिल्म देखने ! मेने उन दोनो को प्यार भरे इशारे करते भी देखा था !- लड़की का पिता भी वो इशारे भाँप गया था ! "
हम सब बंगाली महोदय का मुँह तकने लगे !

बंगाली मोशाय - मेरी ओर मूड कर बोले -
"अरे सोरभ !" तुम भी तो था उस दिन टाकीज़ मे यार ! नीरज ठीक तुम्हारे पीछे वाली सीट पर ही तो बैठा था !-बिल्कुल तुम्हारे पीछे !- वही नीरज आज मर गया !"

मेरे कान सनसनाने ! मुझे कुछ भी सुनाई देना जैसे बंद हो गया !
बंगाली मोशाय शायद आगे कह रहे थे -

" ' सिलि लोग !' ज़रा सी बात पर आज कल ये लड़के जान दे देते है !उसकी चिट्ठी शायद डी एफ ओ ने पकड़ ली थी ! दूसरे दिन ही लड़की को ननिहाल भेज दिया , और लड़के के बाप से लड़के की शिकायत कर डी ! साला लड़का इतनी सी बात पर फाँसी लगा लिया !"

इतना कह कर बंगाली मोशाय आँधी की तरह वहाँ से बाहर निकल गए !
दूसरे घरों मे यही खबर देने !

उसके जाने के बाद में सकपकाया हुआ थोड़ी देर बैठा रह गया !

में समझ गया - ' उस दिन वह कन्या लगातार मुड मुड कर मेरे पीछे बैठे नीरज को देख रही थी !दोनो के बीच नज़रों के तीर , ठीक मेरे सिर के उपर हो कर चल रहे थे !'

में तो बीच मे 'नेट 'की तरह था !
जिसे छू कर नज़रो की शटल , इस कोर्ट से उस कोर्ट मे जा रही थी !

'नेट' बीच मे बेवज़ह ही झूल गया !

बाहर कोई रेडियो बजाने लगा !
गीत था - ' मारे गए गुलफाम अजी हाँ मारे गए ....,!"

गुलफाम कौन था ..?

'में या नीरज या कोई और ?',

में यह जानने की बेकार कोशिश करने लगा !


मुझे उस समय क्या हुआ था ?

' मेने प्यार किया था या मुझे प्यार हुआ था ?'.-
यह गुत्थी में आज तक नही सुलझा सका !

इसलिए मेने प्यार के उस वाकये को फिर से कबाड़ की तरह पिटारे मे ठूंस दिया !
शायद प्यार के जानकार, प्यार के विशेश्ग्य मुझे कुछ बता सकें ! 
( यह एक कहानी है , इसे आत्म कथा समझने की भूल ना करें !)

_

--सभाजीत'सौरभ'