गुरुवार, 19 नवंबर 2015

    "   प्रेम  ,,,,,,

    प्रेम   का अर्थ ,,,
  ' मांडू ' ओर '   ताजमहल   ' की     दीवारो  पर  , 
   लिख दिया  ,, इतिहासकारो  ने ,

    प्यार के जानकारो  ने ,
    पढ़ाये , हमें ,
    उच्चतम  शिखर  पर 
    कलश मे  मढे  कुछ नाम ,
   ' लैला -मजनू "  , ' शीरी -फरहाद " ,,,सलीम अनारकली ' 
     वगेरह ,,वगेरह ,,!!

      बचपन से ,
      गणित के पहाड़ो  की तरह , 
      रेट रहे यही नाम , ,
      यादो के बस्ते में ,
      ठुसे रहे यही कागज़ ,   
    ,,, प्यार के मायने ,,
       एक ,,' नर ' एक ,मादा ' ,,!!
       और टपकते रहे ,,,  फटे  बस्तों  से , 
      यहाँ -वहा , सब जगह , 
      पेन्सिल और रबर की तरह ,,!!

       निश्छल चांदनी से , नहाये 
      ब्रक्षो  के झुण्ड , 
       खिलखिलाती नदी , 
       इठलाते समुद्र , 
       गुनगुनाती  धूप   सेकते  , 
        उत्तंग शिखरों से ,,, जब हो गया प्यार मुझे , 
        तो ,,, हंस दी दुनिया ,,
        मेरी नासमझी पर ,,!!

       गणित के समीकरण ने , 
       उकसाया  मुझे , 
       प्यार के कुछ ,,,सवालो को हल करने के लिए , 
       और में ढूंढता रहा ,  कलश के नामो के बीच , 
         कुछ और बात , 

       '   भरत  ' की नंगे पैर ,,' मनुहार ' ,,
         और मूर्छित  लक्ष्मण  की छाती पर ,
         ' राम ' की अनवरत हिचकियाँ ,,,,!
           अत्तेत के धुंए में  विलीन हुए ,,
          ' सुदामा ' के दो मुट्ठी ,,चावल ,, 
           और सत्य के दीवाने , 
           चांडाल ,,' हरिश्चंद्र ' का ' मृत्यु कर ' ,, मांगता ,,
            फैला हाथ ,,!!

          योग था की ' संयोग ' ,,
           प्यार के व्यापारियों ने  भी  , 
           बेचीं    वही  बाते  , 
           बार ,,बार ,,,हर बार ,,

        कि   बन गया  , 


           प्यार   का   ' अमृत  घट  ' ,,
          ' प्रेम रोग ' ,,!!

   ,,,,,,,,,,,,,,,, सभाजीत 

   
 
   
    

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015



                                                   " लाइफ आफ्टर डैथ "



                                  ( मरणोपरांत जीवन )



                                                                                            
 'लाइफ आफ्टर डैथ ' --  एक रहष्यमय विषय है । वर्षों से लोगों के लिए एककोतुहल रह़ा है कि , मृत्यु के बाद क्या होता है ? हम कहाँ जाते है , क्या करते है, और क्या मृत्यु के बाद भी कोई 
जीवन है ?
इस विषय पर पश्चिमी समाज में कई तर्क , कथाएँ प्रचिलित है । रहस्यवादीशोधकर्ताओं ने ऐसे कई लोगों के इंटरव्यू लिए - जो कुछ 
 समय के लिए मृतघोषित किये जा चुके थे । करीब करीब सभी तथाकथित मृतकों का अनुभव एकजैसा ही सामने आया -एक लम्बी सुरंग की यात्रा , एक प्रकाश पुंज से साक्षात्कार, और फिर
 लाख टके का एक प्रश्न - " क्या तुमने अपने सभी काम पूर्ण कर लिएहै - क्या तुम संतुष्ट हो ?"
 उत्तर अगर 'हाँ ' में हुआ तो निश्चित मृत्यु और अगर 'ना ' में हुआ तो 
पृथ्वी पर वापसी ॥
      भारत में हिन्दू धर्म में एक पूरा पुराण ही " लाइफ आफ्टर डैथ " के लिए लिख दिया गया है । प्रत्येक घर में - " गरुण " पुराण के रूप में , किसी मृत्यु के वाद इसका वाचन किया जाता है । पंडितों के अनुसार , पुनर्जन्म से बचने के लिए 'मोक्ष ' की कल्पना की गई है -और मोक्ष पाने के लए विधि -विधानों की । किसी मृत्यु के बाद यदि मृतक का कर्म नहीं हुआ , पिंड दान नहीं हुआ , 'प्रयाग' - 'गया' जाकर श्राद्ध नहीं किया गया , ब्राम्हणों को भर पेट भोजन नहीं दिया गया , तो मृतक मृयु क्र पश्चात भी इसी लोक में रहेगा -" भूत योनी " में । मरणोपरांत कोई भी नहीं चाहता की उसके परिजन भूत योनी का जीवन जियें , इसलिए सभी , अपनी हेसियत से बढ़ चढ़ कर इन कर्म कांडों को करते है ।
     आर्य समाज के प्रवर्तक , स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक - " सत्यार्थ प्रकाश " इस विषय पर व्यापक चर्चा की है - जो सनातनी धर्मावलम्बियों को मंजूर नहीं है । मेरी पत्नीk घोर सनातनी है - वह इश्वर के कई स्वरूपों में विश्वास करती है - हर देवालय में माथा टेकती है - वर्ष के प्रत्येक तीज त्यौहार - बिना भूले चूके- कलेंडर देख कर मुहूर्त के अनुसार मनाती है । दिन भर वृत रहकर , शाम को विशेष व्यंजन -" फलाहारी " बना कर खाती है , जिसे खाने में मेरी भी रूचि रहती है । विवाह बेदी पार सात फेरे लेते समय मेने कुछ कसमें खाई थी जिनमें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की एक कसम भी शामिल थी । यह कसम गाहे बगाहे में पूरी करता रहता हूँ - उनके साथ - " कथा कीर्तन , धर्म व्याख्यानों में भाग लेकर ।
      लिहाजा एक धार्मिक व्याख्यान माला में उनके साथ में भी गया । आयोजकों ने विशाल मंडप तैयार किया था । मंच फूलों से सजा था । स्त्री और पुरुष वर्गों के अलग अलग बैठने की व्यवस्था थी - ताकि धर्म के बीच स्त्री पुरुषों के बीच का प्रेम सिर ना उठा ले । मंच पर व्यास गद्दी थी और व्यास गद्दी पर , क्लीन शेव्ड , रेशमी भगवा वस्त्र धारी ,ललाट पर त्रिपुंड लगाए, गले में रुद्राक्ष धारण किये , उँगलियों में कई करामाती पथ्थरों की अंगूठियाँ पहने , गोर वरनी पुरुष विराज मान था । मंच के बाएँ और आर्केस्ट्रा था , जिसमें बांसुरी प्रमुख थी । ' संगीत, प्रकाश , और दवानी का अद्भुत करिश्मा व्याख्यान में घुल मिल गया , जिसे सुन कर सभी रस विभोर हो गए ।
कथा सुन कर जब वापिस घर आया तो मन बोझिल हो उठा । मेने सोचा - मेनेतो कुछ भी नहीं किया है - इह लोक और परलोक 
सुधारने के लिए । मृत्यु के बादचौरासी लाख योनियाँ मुंह बाए मेरा इंतज़ार कर रही है । " कूकर - शूकर ,जलचर- नभचर , कीट- पतंग , सभी तो बनना पडेगा । फिर इन जन्मों के बीचएक टाइम स्लाट और भोगना पडेगा - " भूत - योनी " का । - पीपल पर लटककर , इस बात का इंतज़ार करना होगा की कब मेरे 
पुत्र गया जाकर मुझे मोक्षदिलाएं । मुझे अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं है । वे बहुत ही आलसी और काम टालूप्रवत्ति के है ।
भरी मन से चुपचाप आँखें बंद कर के मैं लेट गया । सोया ही था की अचानक एकबजे मेरी नींद खुल गयी । घबरा कर उठ बैठा तो देखा कि एक व्यक्ति मेरे पलंगके पास , कुर्सी पर बैठा मुझे ताक रहा है । मेरी पूरी तंद्रा भंग हो गयी । उसआदमी को अपने शयन कक्ष में पाकर , मेने डरते हुए पूछा -
" भाई साहब !! आप कौन है और मेरे शयन कक्ष में इतनी रात में कैसे घुस आये? "
जबाब में वह मुस्कराने लगा ।
मेने सोचा - जरुर ही यह चोर है । पूरी गेंग होगी । इसके बाकी साथी मेरे परिवारके अन्य कमरों में माल असबाब कि 
 तलाशी कर रहे होंगे और यह मेरे ऊपरपहरेदारी करने के लिए बैठाया गया होगा । मेने हिम्मत बाँध कर फिर पूछा -
" भैया !! कृपया मेरे सवाल का जबाब दें । आप अन्दर मेरे कमरे में कैसे प्रवेशकिये ?"
वह व्यक्ति गंभीर हो उठा । मुझे ताकने लगा । फिर धीरे से गहन आवाज़ में बोला-
" हम कहीं भी आ-जा सकते है । हमारे ऊपर कोई बंधन नहीं है । "
" भला कैसे ? बिना मेरी परमिशन के आप मेरे निजी शयन कक्ष में कैसे आ करबैठ सकते है यह क़ानून विरुध्ध है । "
उसने फिर मुझे ताका और ठंडी आवाज़ में बोला-
" क्यौकि हम 'हवा ' है । हम 'मरे' हुए व्यक्ति है । "
" मरे हुए ?? - यानी भूत ?? " - में सिहर उठा । तो पुराण सही कहते है । प्रमाणस्वरूप एक भूत मेरे कमरे में उपस्थित था । मेने पूछा-
" भूत ?? तो आप भूत है ? "
जबाब में वह चुपचाप मेरी और एक टक देखता रहा । फिर बोला -
" भूत तो जो व्यतीत हो गया वह 'समय' है , हम भूत नहीं "
"नहीं ? तो फिर क्या है ॥?"
" आत्मा !! सिर्फ आत्मा !! इश्वर का एक अविनाशी अंग !!"
" क्या आपका मोक्ष नहीं हुआ ?"क्या आपके पुत्रों ने आपका तर्पण ,
  मोक्ष नहींकरवाया ? "
इस बार वह थोड़ा मुस्कराया फिर बोला -
" हमें मोक्ष कि आकांक्षा नहीं । "
" मोक्ष की आकाक्षा नहीं - भला क्यों ? "
" क्योंकि हम मरणोपरांत जीवन जीने में विश्वाश करते है , हम 
  मरणोपरांतजीवन जीने वाले लोग है । "
" अजीब बात है !! आप जीवित रहते हुए भोग विलास से तृप्त नहीं हुए , जो मृत्युउपरान्त भी जीवन चाहते है ? "
" भोग-विलास तो शरीर करता है आत्मा नहीं । "
" यदि भोग - विलास नहीं चाहिए तो आप जीवन क्यों चाहते है ? "
" इसलिए की हम जीवित रहेंगे तो समाज भी जीवित रहेगा । "
कैसी अजीब आत्मा है - मेने सोचा । धर्म व्याख्यानों में तो मृतक के नाम परकई कर्म कांडों और अच्छे 
 भोजन की बात कही जाती है । मृतक का दायित्वपरिजनों तक सीमित रहता है । और यह है कि मरने के बाद भी ' समाज ' केलिए बात किये जा रहा है । मेने सोचा- बड़े काम की आत्मा है । क्यों ना इससेमृत्यु उपरान्त जीवन का रहस्य पूछ लू। मेने पूछा -
" महोदय !! क्या मृत्यु उपरान्त भी जीवन होता है ? "
" जरुर !!- हम तो उसे जी ही रहें है "
" " क्या आप स्वेक्षा से उसे जी रहे है ? "
वह थोड़ी देर खामोश रहा । फिर उदास भाव से बोला -
" आप उसे स्वेक्षा या मज़बूरी कुछ भी कह सकते है "
" यदि मज़बूरी हो तो वह क्या हो सकती है ? " - मेने अब उससे चुटकी लेना शुरू कर दिया ।
"मृत्यु के उपरान्त भी हमारे ' नाम ' अभी संसार में जीवित है , लोग हमें याद रखे है । जब तक नाम जीवित है हम मर ही नहीं सकते ।
मृत्यु उपरान्त जीवन के रहस्य की कुछ परतें मेरे समक्ष खुलने लगी । मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी ।
" महोदय !! क्या में आपका वह नाम जान सकता हूँ जिसके कारण आप अभी भी संसार में विद्यमान है ? "
" नाम ?? कुछ भी कह सकते हो हमें । क्योंकि हम नाम से ज्यादा , अपने कामके कारण जीवित है । यह बात और है की यह पार्थिव दुनिया हमें अब सिर्फ नाम से ही जानती है ।" " मान लो की मैं 'शेलेन्द्र ' हूँ ! गीतकार शैलेन्द्र ! मेने कई गीत लिखे , लोग अभी भी गुनगुनाते है । मुझे याद करते है । इसलिए मेरा नाम मर नहीं रहा है । "
यह एक कड़वा सत्य था । शैलेन्द्र के गीत अमर थे । उन्होंने फ़िल्मी गीतों में साहित्यिक उपमाओं का सहज प्रयोग किया था । पहले 
एच , एम् वी, वालों ने अपने व्यवसाय हित में रिकार्ड बना कर , उन्हें बेच कर , गीतकार का नाम जीवित बनाए रखा , अब वे ही गीत यु ट्यूब पर फिर से चहक रहे थे । लोग भी उन गीतों को अभी भी गा रहे थे , भूल ही नहीं पा रहे थे ।
" आप से यह पाप कैसे हो गया महानुभाव ? लोग तो आज कुछ भी उलटा सीधा लिख देते है । धड़ल्ले से बिक जाता है - लोगों को यह याद भी नहीं रहता की गीतकार कौन है उसका नाम क्या है । "
" हम तो आदतन अच्छा लिखते रहे , चाहते तो भी सस्ता नहीं लिख सकते थे । फिर एसा पाप करने वाले तो बहुत लोग है । "
" यानी बहुत सी आत्माएं है जो अभी भी जीवित है ? "
" हाँ !! मिलना चाहोगे और लोगों से ? "
" लेखकों में भी हैं कोई ?"
" सभी वर्गों में है । जो मृत्यु उपरान्त जीवन जी रहे है , लेखकों में बहुत है । किससे बात करना चाहोगे ?- " शरत चन्द्र जी से करोगे ? '
" शरत चन्द्र ?? ' यानि बंगाल के प्रसिध्ध लेखक - । " क्या वे भी मरणोपरांत जीवित होंगे ? "
" क्यों ना होंगे ? उनका भी तो समाज से सरोकार रहा । सभी रचनाएं मर्मस्पर्शी , सभी कथाएं समाज के लिए । "
" एक बात बताएं "- मेने हिचकिचाते हुए पूछा - ' मरणोपरांत आप कहाँ निवास कर रहे है ? क्या पीपल पर - जैसा की पुरानो में कहा गया है ? "
" पीपल पर ??- " वह हंसा - " हम भला वहां क्यों निवास करेंगे ?? हम तोविभिन्न कई जगहों पर 
  बस रहे है ."
" जैसे ?? "
" जैसे में गीतों में , शरत चन्द्र साहित्य में , गांधी भारतीय मानस में , विवेकानंद ज्ञान में , मुकेश गायकों में , राज कपूर अभिनय में ....."
" लम्बी फेहरिस्त है । मेने मन में सोचा । लकिन फिर एक प्रश्न मन में उठा -ये आज मुझसे मिलने मेरे शयन कक्ष में क्यों आये इन्हें मुझसे क्या सरोकार है ? प्रकट में पूछा -
" में बहुत कुछ जान गया हूँ । किन्तु एक बात नहीं समझ पाया । "
" क्या ? "
" यही की आप आज यहाँ मेरे शयन कक्ष में कैसे आये ? "
वे गंभीर हो गए । फिर धीरे से बोले -
" कुछ नहीं सिर्फ तुमसे मुलाक़ात करनी थी । "
" मुलाक़ात !! मुझसे ?? भला क्यों ? "
" क्योंकि देर सबेर तुम भी हमारे साथी बनोगे । हमारे साथ रहोगे । "
" आपके साथ क्यों ? मुझे मोक्ष नहीं मिलेगा क्या ? "
" मोक्ष तो होता ही नहीं । "
" मोक्ष नहीं होता ? पुराण , पंडित , कर्मकांडी कह रहे है की मोक्ष होता है ।"
" वे अपनी क्षुधा से मोक्ष पाने के लिए यह व्यवस्था बनाएं है , वरना मोक्ष तो होता नहीं । "
" तो क्या सभी जीवों को मृत्यु के पश्चात इस योनी , यानि आत्मा योनी में विचरना पड़ता है ? "
" नहीं "
" नहीं ?? " - " तो फिर हम आप ही क्यों विचरेंगे इस योनी में ? '
" क्योंकि हमें समाज की चिंता है ।"
" और जो समाज की चिंता नहीं करते ?'
" उनके लिए " चौरासी लाख योनी " का क्रम है ही । ' कीट-पतंग', शूकर - कूकर, जलचर- नभचर , ...."
में पेशोपेश में पड़ गया । मेने सोचा , इन्ही से पूछ लूँ , की मैं क्या करूँ ।
" मुझे बतलाएं की मैं क्या करूँ ? "
" यदि कीट- पतंग , शूकर कूकर बनना पसंद हो तो वही करो , जैसा दुनिया कहती है - " हल्का- फुल्का , मनोरंजक , विषयों पर विचार विनमय करो , लिखो । चौरासी लाख योनियों की यात्रा करो , भोग करो , जनन करो , बार बार मरो । "
" और यदि कीट पतंग नहीं बनना हो तो ? "
" तो अपना नाम जीवित रखो । मरणोपरांत जब तक तुम्हारा नाम जीवित रहेगा तुम भी रहोगे - हमारी तरह समाज के लिए साहित्य में समाये रहोगे सदा के लिए । "
एक और कुवां था तो दूसरी और खाई । कुँए से तो बाहर निकला जा सकता था , किसी प्यासे के द्वारा लटकाए गए घट को पकड़ कर बाहर आया जा सकता है , लकिन खाई से ? वह तो निगल ही जायेगी । मेने देखा वह व्यक्ति धीरे धीरे धुवां हो रहा था । मेने उससे कहा -
" एक आखरी बात ! मरणोपरांत जीवन का क्या यही अर्थ है । "
" हाँ , बिलकुल यही !! और कुछ भी नहीं । " - उसने ओझल होते हुए कहा ।
में बड बढाने लगा - में ' आत्मा योनी में रह लूंगा किन्तु लिखूंगा तो सिर्फ सामाजिक सरोकार के लिए । में किसी भी हालत में कीट पतंग नहीं बनना चाहूँगा ।"
तभी किसी ने मुझे झाझ्कोरना शुरू किया । उठ कर देखा तो पाया की पत्नी मुझे उठा रही है - 

  " क्या बडबडा रहे हो ? उठो दिन निकल आया है - आज आवला नवमी है पंडित जी ने बत्ताया है की आज के दिन मुहूर्त पर पूजा करने पर सीधे मोक्ष मिलता है , मुझे मंदिर जाना है , चलो कार ड्राइव करो ।"
__________ सभाजीत शर्मा ' सौरभ'

रविवार, 28 जून 2015

                                              "     सीता  बनवास "   

      







                       राम कथा में दो बनवास की घटनाएँ  उद्धृत  की गई  हैं !  एक बनवास त्रिया हठ पर, पिता के वचन पालन करने हेतु , स्वयं स्वीकार  किया गया  बनवास है ,  जो  राम को बुलाकर  उन्हें  पूरी स्थिति समझा कर दिया गया- तथा दूसरा बनवास एक पति द्वारा अपनी पत्नी सीता को दिया गया  बनवास है  जिसमेँ उसे बुला कर उसे स्थिति समझाने की कोई आवश्यकता नहीँ समझी गई  !  एक बनवास  , एक स्त्री द्वारा ,  एक पुरुष को , अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु दिया गया ,,,,,जबकि दूसरा बनवास एक पुरुष द्वारा  एक  स्त्री को , स्वयं को लोकोपवाद से बचने हेतु  दिया गया   !  एक बनवास मेँ पत्नी अपने पति का साथ देने हेतु  उन दुरूह स्थानो  पर  जाने के लिए स्वयँ को समर्पित कर देती है जहाँ  पग पग  पर उसे खतरा  है -- दूसरे बनवास में पति के साथ की बात तो दूर ,  पत्नी के जाते समय पति  उससे मिलना भी नहीं चाहता  ,  उससे मुह छिपाता है !  एक बनवास मेँ राज्य की पूरी जनता विचलित हो जाती   दूसरे  बनवास में किसी का  मुह  नहीँ  खुलता !      एक बनवास खुले आम है , दूसरा चोरी- छिपे !   यह  कैसी विडंबना है   ?,,,  क्या  दूसरा बनवास,  बनवास नहीँ बल्कि किसी राजा द्वारा रचित  राज्य  निष्कासन का किसी को दिया गया  दंड  है अथवा किसी पति द्वारा  ,  पत्नी का त्याग है   ? ,,,, या फिर राजा के निष्कलंक स्वरुप को अक्षुण रखने हेतु की गई कोई कार्यवाही  है ,,?  सीता वनवास का प्रसंग इन प्रश्नो के उत्तर आज  भी ढूंढ  रहा है !

                      राजा राम के दरबार की कल्पना जब की जाती है  तो  राज सिंहासन पर  , राम   ,  अपनी पत्नी के साथ  बिराजे दिखाते हैं   यानी राम-राज्य सीता के बिना अपूर्ण है ! राम के व्यक्तित्व को पूर्णता देने वाली   यह वही  सीता है ,  जिनका वियोग राम के लिए   असह्य  था   !  यह  वही सीता है ,  जिनकी  की खोज में राम ने आकाश पाताल एक कर दिया था और यह   वही सीता है , जिनके लिए राम ने महाबली रावण से दुर्दांत युद्ध करके ,   उसे समूल नष्ट किया था ,  और सीता को वापिस  लाकर  सिंहासन पर ,  अपने बाम अंग बैठाया  था ! ,,,,,, जिस रावण के साथ राम ने हजारोँ वानरोँ की सहायता से   ,  विभीषण की गुप्त सूचनाओं के सहयोग से   ,  लक्ष्मण के अद्मय साहस और वीर हनुमान की समर्पित सेवा के सहयोग  से युद्ध करके विजय पाई   राम की उसी  अर्धांग्नी सीता ने उसी रावण से प्रतिदिन अपनी तेजोमय वाणी   ,   सतीत्व की  की  ढाल ,    अदम्य साहस ,   निर्भयता  के  कवच को बांधकर एक माह तक अकेले  युद्ध किया  और प्रतिदिन  उसे हराया  !  ,,,,,,  सत्य तो ये है अपने   बध  से पूर्व ही   ,  सीता  का सामना प्रतिदिन करके   रावण  पहले ही मर चुका था  ! ना तो उसमे  आत्म बल बचा था और   ना ही  नीति बल    जिससे  वह राम के  समक्ष  थोड़ा भी  टिक  सकता   !

                      लंका विजय के बाद   लोकोपवाद  के भय से राम अपनी पत्नी सीता को सहज ही तुरंत स्वीकार नहीँ करते !   वे  जनमानस की उन कमजोरियोँ को जानते थे जो किसी पर भी   , कभी भी  ,  कोई उंगली उठाने से नहीँ  हिचकती   है  !  इसलिए  वे ,  सीता को अग्नि परीक्षा देने के लिए कहते हैँ   ! अग्नि परीक्षा इस बात के लिए की जाती है सीता यह सिद्ध  करें की   पर-पुरुष   की नगरी में   , अपने हरण के बाद भी  ,  एक पतिव्रता नारी रुप मेँ रही   ,,,,,  और  उन्हें किसी ने स्पर्श नहीं किया !  अग्नि परीक्षा में  स्वयं  अग्नि ने उपस्थित होकर राम से कहा   की सीता  स्वयं  अग्नि है और अग्नि  सदा ही  दोषमुक्त ही रहती है  !!  ,,, उसे कुदृष्टि से स्पर्श करने वाला    स्वयं ही  जल जाता है और इस प्रकार सीता   पूर्णतः   दोष रहित हे  !

                  एक स्त्री के लिए इतनी परीक्षा काफी  है  जिसमेँ   स्वयं देव ही आकर  यह सिद्ध  करदें की स्त्री  निर्दोष हे,,,!    और इसलिए राम  उन्हें  पुनः स्वीकार करते है !,,,वे उन्हें अर्द्धांगनी  की प्रतिष्ठा  देकर , सम्पूर्णता के साथ ,  राज्य सिंघासन पर प्रतिष्ठित करते हैँ,,,!

                 लेकिन वही राम , कैसी विडम्बना  है की ,  फिर लोकोपवाद से बचने के लिए ,  अपनी ' सती ' पत्नी को , बनवास दे देते हैं , वह भी उस अवस्था में जब की वह ' गर्भवती ' है !   जिस राम-राज्य में , सिंहासन पर एक   स्त्री ' पत्नी ' के रूप में , पुरुष के बराबर से बैठने की अधिकारिणी बनती है , उसी राम-राज्य में , वही स्त्री , बिना अपराध सिद्ध हुए , बिना सफाई का अवसर प्राप्त हुए ,  बनवास की अधिकारणी बन जाती है !  तब यह प्रश्न उठता है की " राम-राज्य ' की  आदर्श   अवधारणा  में ' स्त्री ' की क्या स्थिति है ,,,??

                 रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास इस प्रश्न और प्रसंग पर चतुराई से कन्नी काट लेते हैँ   !   वे राम राज्य में प्रजा और नर नारी को पूर्ण पाते हे  !  उनकी निगाहोँ मेँ राजाराम   के  राज्य मेँ स्त्री पुरुष भी ,  उन्ही  मूल्योँ से सुसज्जित हे  ,  जिस से   की स्वयं  राम हे,,,!  सभी जन  ,  राग   द्वेष , काम , क्रोध ,  लोभ , मोह , कपट , छल ,  जेसे सभी दुर्गुणोँ   से  दूर हे ,,,!  ,,,, स्त्रियाँ पति अनुरागी है और पति एक पत्नी व्रत ,,,!   सभी  जनता  ,  रघुनाथ और जानकी को आदर सहित   पूजती  है,,,!

         " सासुन्ह  सादर जानकी , मज्जन  तुरंत कराई ,,,!
             दिव्य बसन  अरु भूषणः , अंग अंग सजे बनाई ,,,!!
               राम -वाम दिस शोभती , रमा रूप गुन खानि ,
                 देख मातु सब हरसहि , जन्म सुफल निज जानि ,,,!!

     प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा , तुरतहि दिव्य सिंहासन माँगा ,,!!
       रवि सम तेज सो बरनि ना जाइ ,  बैठे राम द्विजन सर नाइ ,,,!!
         ' जनक-सुता ' समेत रघुराई ,,पेखि प्रहरसे  मुनि समुदाई ,,!!
            राम राज बैठे त्रैलोका ,  हर्षित भये , गए सब सोका ,,,!!

           बयरु ना कर काहू सं कोई , राम प्रताप विषमता खोई ,,!!
             दैहिक , दैविक , भौतिक तापा , राम राज काहू नहीं व्यापा ,,!!
               सब नर करहि परस्पर प्रीती , चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति ,,!!
           
             एक नारि व्रत रत सब झारी ,  ते मन वचन क्रम पति हितकारी ,,,!!


                               दूसरी और , सीता के बारे में गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं --

            ' पति अनुकूल सदा रह सीता , सोभा खानि शुशील विनीता ,,!!
                 जानती कृपा-सिंधु प्रभुताई ,  सेवति चरण कमल मन लाइ ,,!!
                  दुइ सूत सुन्दर सीता जाये ,   लव-   कुश  वेद पुरानन्ह गाये ,,!!
                    दोउ विजई , बिनई  गन मंदिर , हरि प्रतिबिम्ब  मानहु अति सुन्दर ,,,!!

                    लेकिन संस्कृत रामायण के रचियता महर्षि बाल्मीक सीता बनवास के प्रसंग को विस्तार से उल्लेखित करते हैँ   !  श्रीमद वाल्मीकीय  रामायण  के ४२  वे सर्ग  से लेकर  ९२   सर्ग  तक जानकी बनवास की मार्मिक कथा हे    !  ४४ वे सर्ग में  भद्र ने राम को बताया -  की  पुरवासियों  के मन में सीता के चरित्र को लेकर शंकाएँ उठ रही है    !  वे कहते हैँ रावण पहले बलपूर्वक सीता को  उठा कर ले गया उनका अपहरण किया फिर लंका में अपने  अन्तःपुर के क्रीड़ावन ,  अशोक वाटिका में अनेक दिन रखा    वे  बहुत दिनोँ राक्षसो के  वष में होकर  रही   ,  तब भी श्री राम उनसे  घृणा  क्यूँ नहीँ करते   ? ,,,  अब हम लोगोँ को भी स्त्रियोँ की ऐसी बातेँ सहन करनी पड़ेगी ,,,,क्यूंकि राजा जो करता है   पृजा उसी का अनुसरण करती है,,!

                       राम सूचना से अत्यंत विचलित हो गए   !   उन्होंने  मित्रोँ से सलाह ली  !  मित्रोँ ने कहा-    यह दूत  सही कहता हे !
               तब राम ने अपने भाइयो को बुला कर कहा ---  ' नर श्रेष्ठ बंधुओं   !!   मैँ लोक निंदा के भय से अपने प्राणोँ और तुम सब को भी त्याग सकता हूँ ,,,, फिर सीता को त्यागना कौन सी बडी बात है    !,,,  समस्त  श्रेष्ठ  महात्माओं का सारा शुभ आयोजन,,, उत्तम कीर्ति की स्थापना के लिए ही होता है,! ,, जिसकी अपकीर्ति लोक में चर्चा का विषय बन जाए,,  वह  नरक मेँ गिर जाता है   !  अतः  हे लक्ष्मण    !!  ,,,, तुम मेरी आज्ञा मानकर  ,  कल  प्रातः  ही रथ पर आरुढ़ होकर  ,  सीता को उस पर ले जाकर  ,  राज्य की सीमा के बाहर छोड दो   ! ,,  मेरे निर्णय के विरुद्ध कुछ मत कहो,,,!  यदि तुम लोग मेरा सम्मान करते हो   तो  सीता को यहाँ से वन में ले जाओ    !
                  46 वे सर्ग में  ,  लक्ष्मण राम की आज्ञा अनुसार सीता को इस भ्रम मेँ रखकर  ,  रथ पर आसीन  करवाते हैं  कि  उन्होंने  जो एक दिन पूर्व  ऋषियों  के आश्रम देखने की  इच्छा  राम से ब्यक्ति की थी  ,  राम उसकी पूर्ति करना चाहते है   !  सीता इसके लिए खुशी खुशी तैयार हो गई और रथ पर चलकर वन को चले दी   !   45 वेँ  सर्ग  में  नाव  से  गंगा  के  उस  पार   उतरने  के बाद   ,  लक्ष्मण दुखी मन से सीता को राम का निर्णय सुनाते हे और रोककर अपनी मनोदशा व्यक्त करते हैँ   !  राम द्वारा अपने त्यागे जाने का निर्णय सुनकर सीता बहुत दुखी होती है  ,,,  वे कहती है  -  ,, ',  लक्ष्मण   !! '  ,,,,   निश्चय ही विधाता ने मेरे शरीर को केवल दुख भोगने के लिए ही रचा है   ,,,   मेने  पूर्व  जन्म में  क्या पाप किए   ,,,  अथवा किसका स्त्री से विछोह करवाया  की शुद्ध आचरण  होने पर भी , महराज ने मुझे त्याग दिया   ??   ,,,हे सौम्य ,,!! ,, पहले मेने बनवास के दुखों में पड़ कर भी , उसे सह कर , राम के चरणो का अनुसरण करते हुए  , आश्रम में रहना पसंद किया था ,,,किन्तु अब में  अकेली  , प्रियजनों से रहित होकर , किस प्रकार  आश्रम में निवास करूंगी ,,?? ,,,,किससे  अपना दुःख कहूँगी ,,??   यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे   की महात्मा  राम ने  किस अपराध पर तुम्हे त्याग दिया है   तो मैं उन्हें  अपना कौन सा अपराध   बताउंगी  ,,?? ,,,मैं चाहू तो अभी  गंगा में डूब कर स्वयं को समाप्त कर  दू किन्तु  ऐसा अभी नहीं कर सकती   क्योँकि ऐसा करने पर मेरे पति का ' राजवंश '  नष्ट हो जाएगा !  (  सीता  उस समय गर्भवती थी )  ,,,किन्तु हे लक्षमण ,,!,,,, तुम तो वैसा ही करो , जैसा महराज ने आज्ञा दी है ,,,!!  "

                    लक्ष्मण से सीता का यह कथन आज भी उन प्रश्नोँ को लेकर प्रासंगिक है जिसमेँ स्त्री का प्रथम  मूल्य पुरुष के जीवन में   भोग्या  के रुप मेँ  हे   ! ,,,  क्या  सतीत्व  का   अर्थ  ,  स्त्री के मात्र शरीर से संबंधित है और क्या स्त्री को एक धन के रुप में धारण करने वाला पुरुष  ,    उसके ऊपर पर-पुरुष  की छाया के विचार से ही आक्रांत हो उठता है  ? ,,,  भारत में राम राज्य से पूर्व किसी भी कथा में  लोकोपवाद से बचने के लिए  स्त्री  के  त्याग का कोई विवरण नहीँ मिलता है किंतु सीता के त्याग के बाद जैसे समाज में स्त्री त्याग  ,  एक परिपाटी बन  गया   !!  शरत चंद्र के कथा साहित्य में आजादी के पूर्व की सामाजिक  स्थितियाँ में  ,  स्त्री त्याग की घटनाएँ प्रचुरता में वर्णित है  !  सतीत्व की परीक्षा पर ,  कसौटी पर स्त्रियाँ बार बार कसी जाती रही और   उन्हें समाज में स्वयम को पति भक्त सिद्ध करना जरुरी रहा  !
                 दूसरा प्रश्न उस  न्याय  को लेकर भी है जिसमेँ दंड देने के पूर्व पूर्व अपराधी को अपनी सफ़ाई  देने  अधिकार हे  !   सीता को बनवास देते समय राम ने उनसे  एक बार भी यह चर्चा करना उचित नहीं समझी  की इन परिस्थितियों में वे क्या करें ,,?   क्या अपनी सहधर्मणी  पर लगने वाले मिथ्या  दोष पर  , अकुला कर  वे स्वयं एक बार राजपाट त्यागने की पेशकश नहीं कर सकते थे ,,?

                    एक अन्य  रामायण के रचनाकार --' राधेश्याम ' ने  अपनी रचना में  इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार किया ---
        ",,,लक्षमण बोले - व्यर्थ है - यह सब राय- उपाय ,,
              जांच ' आंच ' से हो चुकी , फिर भी त्यागी जाय ,,?? "
   
            हे नाथ दया करिये - छाती छलनी हो जाती है ,
              शब्दों की लड़ी नहीं है ये - शूलों की लड़ी कहती है ,,
                निर्दोषनि नारी दंड पाये , क्या यह ' अधर्म ' का काम नहीं ,,?
                 ऐसे कामो को करके , क्या रघुकुल होगा बदनाम नहीं ,,??
                   अबला अर्धांगनी , महासती , निर्दोष निकाली जाती हैं ,,
                     पृथ्वी आकाश देखते हैं , ' कौशलपुर ' कितना ' घाती ' है ,,!!
                       ' धिक्कार ' उस प्रजा पालने पर , जो यु सर चढ़ जाए प्रजा ,,
                     संतोष पूर्ण शासन पर भी   , पूरा संतोष ना पाये प्रजा ,,,!!  "

               इसी अवसर पर भरत कहते हैं ---
 
                    ' तरह तरह की साक्ष्यों से  , सबको संतोषित कर देंगे ,,
                        ' माता ' में कोई दोष नहीं , यह बात प्रमाणित कर देंगे ,,!
                 दब जाना ऐसे अवसर पर , अपनी भीरुता बताता है ,
                ' सच्चा ' चुप रहे  ' समय ' पर तो ,   झूठा ' सच्चा हो जाता है ,,!
                 फिर हाथ नहीं आएगा वह ,, जो हाथों से खो जाएगा ,
                ' गृहलक्ष्मी ' को गर त्यागोगे , तो गृह उजाड़ हो जाएगा ! "


           पवनसुत हनुमान भी  चुप नहीं रहते ,,,वे बोलते हैं ---

                    जिन आँखों ने सतवंती की , ' आभा ' देखी है लंका में ,
                    जिन कानो ने  , क्षत्राणी की , गर्जना सुनी है लंका में ,,
                   जो ' अग्नि परिक्षा ' की घटना  , अवलोक चुके हैं - आँखों से ,
                    वे ही निर्णय कर सकते हैं माता का चरित प्रमाणों से ,,!
                     इस पतिव्रत का उदाहरण , है कही नहीं त्रय लोको में ,
                   महलो में रहने वाली ने , रखा पति धर्म '  अशोकों ' में ,,!!"
   
          हनुमान त्रिजटा  को भी साक्षी बता कर आगे कहते हैं ---
                             
             उनसे पूछो - माता क्या है ,,जो साथ रही है माता के ,
            जिनने अपनी आँखों देखे वे दिवस अशोक वाटिका के
        यदि नहीं एक दिन  वह  होती ,  तो चिता वहां पर जल जाती ,
         यह राज-सभा जो लगी आज ,  होकर सुनसान बदल जाती ,!!
           माता ने रखा पतिव्रत है , अपनी हड्डिया सुखाकर  है ,
          छूना क्या ,,देखा ना कभी ,  निश्चर को दृष्टि  उठा कर है ,,!
          कब मिटता है ' सत ' का प्रकाश ,  ' शंका की ' रज ' छा ' जाने पर ,,
          होता है ' चन्द्र ' नहीं मैला , बादल के आगे आ जाने पर ,,!
           दुर्दैव , अवध के खेतों में , ' अपयश ' के बीज बो गया है ,
           अंधे समाज को जाने क्या यह आज अचानक हो गया है ,,!!
              यदि बदला इसका लेने को , ' जगजननी ' शीश उठाएगी ,
               ' सूरज ' काला पड  जाएगा , पृथ्वी चौपट  हो जाएगी ,,,!!

                 राधेश्याम रामायण के रचियता कवि ,  सीता के त्यागे जाने के बाद , प्रजा में और समाज में हुए बदलाव पर  टिप्पणी करते हुए ,, खुद भी कहते हैं ----

             जो अंग वेद पाठी था , वह बकवादी होता जाता है ,
               जो वर्ण देश का ' रक्षक ' था  वह व्यसनी होता जाता है ,,!
               जो ज्योति दिव्य व्यवसायी थी , वह व्यभिचारों में धाई है ,
               जो जाति  सभी की सेवक थी ,, वो सबके सर चढ़ आई है ,,!
                जो ब्रम्हचर्य व्रतधारी थे ,  लौकिक सुख उनका ' कर्म ' हुआ ,
                 पत्नीव्रत रखने के बदले , पत्नी त्यागन ही धर्म हुआ ,,!!

           एक अन्य चित्रण में , बाद में सीता सुत लवकुश प्रजा को ललकारते हुए बोलते हैं --

                जो जनता जनप्रिय राजा से , रानी का त्याग कराती है ,
                 सतवंती के पावन सत पर , मिथ्या संदेह उठाती है ,
                जिनके विचार भ्रम  भूल भरे , त्यागन की हद तक जाते हैं ,
                 उस जनता को गुरुकुल ही से , हमदोनो शीश नवाते हैं ,,!!

                        श्रीमद् बाल्मीकि रामायण में लव कुश राम दरबार में जाकर रामकथा  गा कर  सुनाते  है जो बाल्मीक  द्वारा रचित थी ! उसी समय राम को ज्ञान होता है की लव कुश उनके पुत्र  हैं !  वे अपने दूतो  को  आश्रम भेजकर बाल्मीकि को यह सूचना  भिजवाते  है   की यदि  सीता दरबार मेँ आकर,  समस्त प्रजा के समक्ष , अपने शुद्धता का परिचय दें  तो वे  पुनः उन्हें  स्वीकार  कर लेंगे !
         सीता बाल्मीक के साथ आती हे और सभी उपस्थित प्रजा के सामने कहती है   की  अगर उन का सतीत्व सही है   और  यदि  वे  मन वचन और कर्म से  मात्र राम अनुगामिनी है   और  किसी के प्रति भी अनुरागी नहीँ है तो प्रथ्वी  उन्हें  सम्मान सहित अपनी गोद मेँ स्थान दे  !

                यही होता है  पृथ्वी  फटती है और सीता उस में समा जाती है  ! 

                       राम का सीता को त्यागना   उन्हें ,,  निरपराध बनवास भेजना निश्चय ही रामराज्य की एक  कलंकनीय  घटना हे ! विवश नारी का पराधीन रहना और  स्वेच्छा  से पर पुरुष पर आसक्त होने में बहुत अंतर है   !  सीता ने  तो रावण के अशोक  वन  मेँ रहते हुए  सदेव अपने पति  का ही  ध्यान किया ,,,,वे सदेव राम- अनुरागी रही ,,,,यह जानते हुए भी राम ने उन्हें त्यागा ---यह न्याय विरुद्ध था !

                राजा को लोक अपवाद से बचना चाहिए यह सत्य है  ! आरोपोँ से  घिरे  राजा को कोई नेतिक अधिकार ,  राज करने का शेष  नहीँ होता यह भी सत्य है !  किंतु ऐसी स्थिति मेँ  राजा को  स्वयं  राज त्याग  कर देना चाहिए जब उसके किसी प्रियजन पर ही प्रजा उंगली उठाये ! ,,,,  समय सबसे बलवान चीज हे,,,,  यदि वह मिथ्या आरोप  मढ़वाता  है तो वह  सत्यता का भासं भी शीघ्र ही करवाता है  !  राजा के लिए चाहे समुदाय हो  अथवा  एक व्यक्ति दोनों ही  न्याय  पाने के लिए सामान रूप से हकदार  होते  हे और समुदाय के आगे एक निर्दोष को दंड देकर अपना कर्तव्य  पूर्ण  मान  लेना एक भयंकर भूल ही मानी जाएगी  !  समुदाय को प्रसन्न करने के लिए किसी एक निर्दोष की  बलि  लेना एक बड़ा पाप हे   !,
                ,,,, सीता हर काल में पैदा होती हे    !! ,,,,  पति- पत्नी का रिश्ता  एक बहुत पवित्र रिश्ता हे    इसमे परस्पर  विश्वास ही  रिश्ते  के  आधार स्तंभ हैँ  !  यदि यह आधार स्तंभ रेत की दीवार  जैसे होंगे  और पति अपनी पत्नी पर अकारण ही  संदेह  करेगा  तो  सीता बनवास होते रहेंगे  और  अंत मेँ सीता के लोप हो जाने पर राम सिर्फ  विलाप  ही करते रह जायेंगे तथा उनकी कीर्ति भी उस चंद्र के समान रह जाएगी  जिसमेँ एक दाग  सदेव  के लिए सबको  दीखता  रहेगा !  

   - सभाजीत '  सौरभ  '
       


शुक्रवार, 19 जून 2015

           भो  ब्राम्हण ,,,,!!

        ब्राम्हण  का अभ्युदय  वैदिक काल से हुआ  जब मनुष्य का एक मात्र लक्ष्य ' ब्रम्ह ' की खोज  और अपने चारों और व्याप्त   प्रकृति  के रहस्यों  को जानना  था ! इस कार्य के लिए मनुष्यो ने एकांत की शरण ली , और अंतर्मुखी हो कर  ' ईश्वर ' को जानने का प्रयास शुरू किया , और बहिर्मुखी हो कर प्रकृति का ! उसने जहाँ निरंतर जाग कर सूर्य चन्द्र , तारागणों की स्थितियों का उनके चाल का अध्यन किया , वहीं ऊर्जा के रूप में उपलब्ध  अग्नि , वायु , जल , इन्द्रियों , का भी अध्यन किया !  उसने प्रकृति के  ऋतू चक्र को जाना ,  वनस्पति  के प्रयोग किये , वनचरो ,  जलचरों ,  और नभचरों की प्रकृति को समझा , और उन्हें मनुष्य के हित में हिंसक और पालतू वर्ग में विभाजित किया ! ये मनुष्य  जीवन को बौद्धिक कार्य के लिए समर्पित  किये , और उन्होंने सम्पूर्ण धरती को ' वसुधैव कुटुम्बकम '  कह कर  ' सर्वे भवन्तु सुखनः ' के सन्देश के साथ  एकसार किया !  वस्तुतः , ब्रम्ह की खोज में लगे , निरंतर प्रकृति पर शोध करने वाले यही मानव ' ब्राम्हण ' कहलाये !
         इस तरह आज का ब्राम्हण गर्व से यह कह सकता है की , उसके आदि पुरुष सभ्यता के जनक आदि  ब्राम्हण थे !  पूर्व में प्रायः सभी ब्राम्हण , अपने जीवन यापन  के लिए  सभी काम खुद करते थे !  कालान्तर में जब  कुछ शरीर से बलिष्ठ लोगों को  मात्र हिंसक वनप्राणियो से बचाव के लिए  आश्रम की रक्षा का दायित्व  सौंपा  गया  तो वे अपना पूरा ध्यान युद्ध कौशल  में , लड़ने में , और खुद के शरीर को बलवान बनाने में  लगाने लगे ! इस तरह  एक विशिष्ट वेग ने क्षत्री नामाकरण के साथ जन्म लिया और वह  शस्त्रों  के निर्माण में लग  गया ! किन्तु जल्दी ही  इस  वर्ग  ने बाहुबल की महत्ता को जान लिया  और वह आश्रम छोड़कर  भूमि को अपने कब्जे में करके ' कबीलों '  की तरह रहने लगा !  आखेट में शिकार को लेकर इनमे प्रायः झड़प होने लगी , और यह झड़प जल्दी ही  दुसरो की जमीन लूट कर , उमकी  सम्पदा  ,(  जिनमे स्त्रियां और  पालतू  जानवर  प्रमुख थे ), को    लूट कर अपने कब्जे को करने की आदतों में पर्णित हो गयी !  दूसरों के कबीलों को लूट कर बंदी बनाये गए लोग ' सेवक ' और गुलाम ' के रूप में  विभिन्न सेवा कार्यो में जब लगाए गए तो ' शूद्र ' वर्ण की उत्पत्ति हुई !
     सभ्यता ने जब विकास किया  तो यही कबीले शशक्त  होते  गए , उन्होंने बचाव के लिए ' गढ़ ' बनाना  सीखा ' और अपनी भूमि की सीमाओं को बढ़ाने में लग गए ! इसके लिए निरंतर युद्ध लड़े जाने लगे , और रक्तपात  बढ़ गया !  जिसके पास अधिक बल , अधिक भूमि हो वह राजा कहलाने लगा !

      इस विकास क्रम में भी , बौद्धिक समपदा पर आश्रित ' ब्राम्हण '  आश्रमों में निरंतर शोध में लगा रहा ! कितना भी महाबली राजा क्यों ना हो , वह आश्रम में रहने वाले इन शोधकर्ताओं को पूर्ण आदर देता था !  वह इन्हे ' पशुधन ' भी देता था , और सेवा कार्य के लिए ' सेवक ' भी !  किन्तु ब्राम्हण फिर भी , प्रलोभनों से  परे  , संचित किये हुए ज्ञान को - ' गुरु शिष्य ' परम्परा में आगे बहाता रहा !  राजा  क्यूंकि  पहले  ' आश्रमों ' से ही बाहर निकला था , इसलिए उसमें ज्ञान की पिपासा बनी रही !  इसलिए उसने अपने पुत्रो को भी ज्ञान अर्जित करने इन्ही आश्रमों में भेजा ! यहां आकर राज- पुत्रों को भी अपने काम खुद करने पड़ते थे , और जीवन के संघर्षों से रूबरू होना पड़ता था ! बाद में कुछ  ब्राम्हणो ने , परिस्थितिवश , या वैभव से प्रभावित होकर राजाओ के यहाँ गुरु बनाना  स्वीकार कर लिया ,,,इसमें शस्त्र विद्या के धनी ' द्रोणाचार्य '  का प्रसंग उल्लेखनीय  है !  बाद में यह परम्परा में ही आगया और ब्राम्हण  राज- आश्रित हो कर , क्षत्रियो को नीति और ज्ञान देने लगा !

 आश्रमों   में  शोध करता  ब्राम्हण , सदेव भोजन की व्यवस्था करने में असमर्थ रहता था ! इसलिए वह कभी कभी ' निराहार ' भी  रह लेता था ! यही स्थिति युद्ध क्षेत्र में लगे '  क्षत्री  ' की भी थी ! किन्तु उसने अपने कुनबे और सैनकों की भोजन व्यवस्था के लिए अपने राज में रहने वाले अन्य लोगों पर ' कर ' लगा कर पूरी की !  चमकीली धातु , ' सोना ' , चांदी ,  ताम्बे , के शोध के बाद , लोगो ने इन  धातुओं  के बदले खाद्यान जोड़ने का कार्य किया ! यहां से ' वणिक ' वर्ग यानी '  वैश्य  ' अस्तित्व में आया ! विशेष क्षेत्र की विशेष  चीजों को बेच कर , चमकीली धातु एकत्रित करने का कार्य तेजी से होने लगा , और वणिक दूर दूर तक जा कर व्यापार में लग गए !
         कुछ ग्यानी लोग , जो  रसायन के कुछ प्रयोगों को जान गए थे , उन्होंने ' चमत्कार ' के नाम पर  लोगों को प्रभावित करना शुरू किया ! उन्होंने इन रासायनिक नुस्खों को ' मन्त्र ' का नाम दिया और बुदबुदा कर मन्त्र पढ़ते हुए लोगों को भ्रमित करने में लग गए !  इसमे प्रारम्भ में ' ओझा ' थे और बाद में इन ढोंगियों की कई शाखाएं स्थापित हो गयी !  मृत्युऔर ' अनिष्ट ' से डरने वाले लोग इनके चंगुल में जल्दी आने लगे , और यह धन ले कर उनकी बाधा दूर करने का कुशल नाट्य अभिनय करने लगे !

        पौराणिक युग में आते ही , वैदिक युग का शोध कार्य बंद हो गया ! लोगो  ने ' निराकार  ' ब्रम्ह की उपासना छोड़ कर , ,,ईश्वर को साकार रूप में पूजना शुरू कर दिया   आदि   देव ,,' ब्रम्हा - विष्णु , महेश , के साकार रूप की कल्पना कर ली गयी और उनके जीवन आधारित कई पुराणो की रचना कर दी गयी !  इस साकार रूपों को ' माथो ' और मंदिरो ' में स्थापित किया गया और इनकी ' पूजा ' के लिए ' ब्राम्हणो '  को  ढूंढा गया !

     वैदिक काल के ' आश्रम ' अब तक प्रायः नष्ट हो चुके थे , और निराश्रित ब्राम्हण , नए ठिकानों की खोज में नगरो में  आ गए  ! उसने इन ' कर्म- कांडो ' को अपना लिया ! पूजा - पाठ  के साथ मंदिरों में धन भी चढ़ने लगा ! ईश्वर की कई कथाओ का वाचन होने लगा  और लोग श्रोता के रूप में इकट्ठे होने लगे ! लोग ' तर्क ' को ज्ञान मान कर ' शास्तार्थ ' पर उत्तर आये ! ब्राम्हणो ने  खुद को ' श्रेष्ठ ' सिद्ध करने के लिए ' छुआ-छूत ' को साधन बनाया !

 धीरे धीरे ' ब्राम्हण ' कर्मवाद से नीचे  उत्तर कर  क्षेेत्रीय वाद में आगया ! वह भौगोलिक आधार पर  कई वर्गों , जैसे ,,' सर्यूपारी , कान्यकुब्ज , मैथिल , कोंकणस्थ , में बाँट गया ! इनमे खुद को ' बड़ा ' ब्राम्हण सिद्ध करने  की होड़ मच गयी ! कुछ ने आदि ऋषियों में भी सर्व श्रेष्ठ वर्ग बना लिए ! जैसे ' गर्ग ' गौतम , और शांडिल्य '  गोत्र के ब्राम्हण स्वयं भू महान बन गए !  ब्राम्हण के लिए , नशा , और  मांस भक्षण निषेध था , लेकिन  ब्राम्हण छुप छुप कर सब खाने लगे ! परम्पराओं में विचित्र  बातें घर कर गयी ! 'पुत्र स्वरूप ' दामाद के पैर  उनके पिता की उम्र के  ' ससुर '  ,  छूने को बाध्य हो गए ! धन से सदा उपेक्षा का भाव रखने वाले ' ब्राम्हण ' विवाह में पुत्र की कीमत माँगने लगे !

          जल्दी ही इस दुराभिमान की कीमत ' ब्राम्हण ' को चुकानी पडी !  निचले वर्ग के लोगों को ' वोट ' की लालच में , सरकारों द्वारा ' आरक्षण ' दिया गया ! जिस ' ब्राम्हण ' ने वैदिक युग में समाज को शोध और ज्ञान दिया , वह हाशिये पर धकेल दिया गया ! उसकी ' सामाजिक प्रतिष्ठा '  को घुन लग गया ! कई वर्गों में , क्षेत्रो में , और उंच-नीच ' के बंधनो में बंधा  ' ब्राम्हण '  उपेक्षित और असहाय हो गया !

       आज ' ब्राम्हण ' वर्ग फिर से एक होकर अपनी खोयी हुई  जमीन को खोजने का प्रयास कर रहा है    लेकिन वह लाख चाहने पर भी खुद को ' परशुराम ' सिद्ध नहीं कर सकता क्यूंकि उसमें ' परशुराम ' के  मूल  आधार ज्ञान , और चरित्र का अभाव है !  यदि  ' ब्राम्हण ' को फिर अस्तित्व में आना है तो सबसे पहले उसको अपने ही में व्याप्त ' अंतर ' को समाप्त करना होगा ! उसे अपने ही समाज में व्याप्त कुरीतियों को पहचान कर , दूर करना होगा ! और यही ' सर्व- ब्राम्हण ' समाज की प्राथमिकता होना चाहिए !

         अभी बहुत काम आगे करना शेष है , और बहुत राह चलना शेष है  इसलिए ' किसी अहंकारी की तरह ,,,' गर्व से कहो हम ' ब्राम्हण ' है --- कहना पूर्ण अनुचित होगा !!   शायद इससे पहले  नष्ट होते हिन्दू धर्म को  बचाना शायद आज प्रत्येक ' ब्राम्हण ' का पहला दायित्व है !

         ----  सभाजीत 
    
      

   

शुक्रवार, 5 जून 2015


                              ' पर्यावरण '

                                                 
                        ,यह धरती एक ' आग ' थी , सूरज  का एक भाग थी ,
                    जलन और संताप थी , लावे के संग राख थी ,,,!!
                       

                       धीरे धीरे ठण्ड बढ़ी , विधि के हाथो गयी गढ़ी ,
                        पानी और पहाड़ बने , पेड़ उगे  वन बने घने ,,!!
                              

                     तरह तरह के जन्मे जीव , पूरी दुनिया हुई सजीव ,
                   'इंसानो ' का जन्म हुआ ,  मिली सभी से उसे  ' दुआ ' ।!!
                              

              सबका ' रक्षक ' हो इंसान ,  धरती का वह हो ' भगवान ' ,,
                बने सभी का पालनहार ,  ,उस पर हो जीवो का भार ,,,!!

                  वह सबका सम्मान करे ,  धरतीपुत्र  का  रूप धरे ,
                  पूर्ण पृकृति  से प्यार करे ,  सभी जीव के कष्ट  हरे ,,!!
                             

           लेकिन यह क्या ,,? बदला दृश्य ,  ' देव ' से राक्षस  बना ' मनुष्य ' ,
              ' पर्वत ' टूटे ,, ' बृक्ष  ' कटे ' ,,पृथ्वी से कई जीव   मिटे ,,!!
                           

             आसमान में भरा ' धुंआ ' , सुखी झीलें ' और ' कुवां ' ,,
        नदियां  पानी के बिन सब सून,   ' दूध ' के बदले बह गया ' खून ',,,!! ,
                                 

               भूला परमपिता का जस , , बढ़ती गई बस एक ' हवस' ,,
                कैसे सब पर ' राज ' करूँ ,? ,,, खुद ताकत पर ' नाज़ ' करूँ ,,,!!
                          

               लूटूं कुदरत की सब देन , और सभी का छीनू  चैन ,
                 में सबका उपयोग  करूँ , सभी श्रिष्टि का भोग करूँ ,,,!!
                            



                 इससे बदला पृकृति का ' रूप ' , बढ़ा ' कोहरा - खो गई ' धूप ' ,,
                   टूटी पानी की रस-धार ' ,  ' रेतीले ' हो गए ' पठार ' ,,!!
                                



                 करवट लेकर धारा हिली ,  भूकम्प की ' सौगात ' मिली ,
                   पल , में  मरे हज़ारों लोग ,  लगे सेकड़ो नए नए ' रोग ' ,,!!
                             
                                   


                     फिर  भी चेता ना इंसान ,  खुद को समझा खूब ' महान ' ,
               ' अंतरिक्ष  से नाता जोड़ ,  खुद की धरती रहा झिंझोड़,,,!!
                                 

                      उठो सभी नौनिहाल उठो , ऐ धरती के ' लाल ' उठो ,
                        लेकर हाथ मशाल ' उठो ,  करके उन्नत ' भाल ' उठो ,,,!!
                                   

                          फिर से पेड़ उगाओ खूब , इस धरती का बदलो रूप ,
               ' पर्यावरण ' का ' मन्त्र ' पढ़ो ,  धरती पर फिर ' स्वर्ग ' गढ़ो ,,,,!!

                               -------- सभाजीत