शनिवार, 13 दिसंबर 2014


 !!  " भूतलीला " ,,,!!

    ( मंच पहले सूना रहता है !  फिर एक व्यक्ति का प्रवेश )

    व्यक्ति :- ( स्वतः ) ,,, ' हमेशा भाग्य ,, भाग्य ,,!! कितना भी काम करो ,, सफलता नहीं मिलाती ! और कुछ हैं की बिना कुछ किये ही चढ़ गए सफलता के सिंहासन पर ,,,!   न जाने क्या सोच कर मेरे पिता ने मेरा नाम रखा था - " गौरव सिंह " ,,! ,,,किस बात का गौरव ,,??  किस काम का गौरव ,,,?? ,, अब तो खुद पर ही तरस आने लगा है --- जाने कब होगा  ,,  कैसे होगा ,  मेरा उद्धार ,,,!!

     ( मंच पर रंगीन प्रकाश का आवागमन )

      ( तभी एक दूसरा व्यक्ति  विचित्र वेशभूषा में मंच पर आता है !  यह व्यक्ति अधेड़ है ,, तथा ' तांत्रिकों ' की तरह पोशाक धारण किये है ! हाथ में एक ' गठरी ' है ,,, और तरह तरह के सामान , ,, मालाएं ,, आदि कंधे पर लादे हैं ,,! )

  तांत्रिक :- ' कहो गौरव सिंह  ,,!! ,, क्योँ  बड़बड़ा रहे हो ,,?? "

  गौरव सिंह :-         ' ( चौंक कर उसे घूरते हुए ) ,,, तुम ,,?? कौन हो तुम ,,??  और तुम्हे कैसे मालूम की मेरा नाम गौरव सिंह है ,,? "

 तांत्रिक:- ( हँसते हुए ) ,, ' त्रिलोकीनाथ ' से क्या छिप  सका     है  गौरव  सिंह ,,? ,,, त्रिलोकी नाथ          
                                क्या   नहीं  जानता ,       ,??

  गौरव सिंह :-       ( संदेह से  तांत्रिक  को घूरते हुए ) ।'
   ,,  "                , त्रिलोकीनाथ  ,,??,,, क्या मतलब ,,,??  "

   त्रिलोकीनाथ  :- " त्रिलोकीनाथ का मतलब नहीं जानते ,
                        ' गौरव सिंह ' ,,??   कैसे मूर्ख बुद्धिजीवी हो,,
                         तुम ,,??

   गौरव सिंह ;-  " त्रिलोकीनाथ ' का मतलब में खूब जानता हूँ ,
                      तीनो लोकों का स्वामी ' ,, लेकिन तुम  वह
                     त्रिलोकीनाथ  तो हो नहीं ,,!! "
   त्रिलोकीनाथ ;- ' मेने कब कहा की में वह त्रिलोकीनाथ  हूँ ,,!
                        जैसे तुम गौरव सिंह होकर भी वह गौरव सिंह
                      नहीं ,,, उसी प्रकार  में त्रिलोकीनाथ होकर भी
                      वह त्रिलोकीनाथ नहीं हूँ ,,! "  
  गौरव सिंह ;- " ( उपेक्षा से  कंधे उचकाते हुए  ) ,,, होगा ,,!!
                     ,,,इससे मुझे क्या ,,?? ,,, (रूककर घूरते हुए )
                     … क्यों मेरे पीछे पड़े हो ,,??   कोई और
                      शिकार ढूंढो ,,!!
  त्रिलोकीनाथ ;- ( किंचित क्रोध में ) ,, मैं कोई शिकारी नहीं
                     मूर्ख ,,!!  मैं त्रिलोकी नाथ हूँ ,,!! '
  गौरव सिंह ;- ' तो बने रहो ,,त्रिलोकीनाथ ,,!  लेकिन मेरा
                      पिंड छोडो ,,!  मैं इस समय बहुत डिस्टर्ब  हूँ '
  त्रिलोकीनाथ ;- ( मुस्कराते हुए ) ,, मुझे डिस्टर्ब लोग बहुत
                     अच्छे लगते हैं ,, ! मैं डिसटर्ब लोगों के ही काम
                     आता हूँ ,,!
  गौरव सिंह ;- ( सर हिलाते हुए ) ,,  अच्छा ,,?? ,, तो बताओ
                     क्या कर सकते हो तुम मेरे लिए ,,??
   त्रिलोकीनाथ  ;-  ( गठरी नीचे रखते हुए ),, पहले तुम अपनी
                          जेब में बची वह आखरी सिगरेट  मुझे
                        पिलाओ   ,, जो तुमने  अपने दोस्त के  '
                       पैकेट ' से चुराई है ,,!!
  गौरव सिंह :- ' ( चौंक कर ) ,,' सिगरेट ,,?? ,,( स्वतः  )
                    ,,,इसे कैसे मालूमम की मेरी जेब में  एक '
                      सिगरेट ' है ,,??   ( प्रकट में ) ,,
                     ' सिगरेट  मैं तुम्हें दे दूंगा ,तो फिर मैं क्या
                     ,पियूँगा ,,??  मेरे  पास बस एक यही सिगरेट
                      बची है ,,! "
त्रिलोकीनाथ ;- " बच्चा ,,! " ,, त्रिलोकीनाथ  की  कृपा  होगी
                     तो  सिगरेट कंपनी का ' मालिक ' बन जाएगा
                     ,,, तूँ,,  समझा ,,??
 गौरव सिंह ;- ( घूरते हुए ) ,,, बहुत खूब ,,!!,,, अब तुम से ' तूँ '
                   पर उतर  आये,,,त्रिलोकीनाथ ,,? ,, ( रुक कर ),,
                   मुझे  बेवकूफ बनाने की कोशिश मत  करो ,,,
                   " और चलते बनो यहां से ,,, समझे ,,? '