शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

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संस्कृति के क्षय पर , दूसरों को दोष देने से पूर्व  , पहले हमें खुद अपने अतीत , और धार्मिक परम्पराओं के निरंतर बदलते स्वरूप विचार करना होगा !
    मुझे याद है , मेरे गावं   , ' नोगाव ' में , पहले  कहीं भी ' दुर्गा ' मूर्ति ' नहीं बैठती थी !  गाँव में एक मंदिर था , जहाँ नो दिनों तक , स्त्रियाँ , सुबह उठाकर , पानी चढाने जाती थी ! किन्तु श्रद्धा और भक्तिभाव में कोई कमी नहीं थी ! ' कैसे की दर्शन पाऊं ऱी  माई तोरी  संकरी किवड़िया   '  के  बोल  सामूहिक   स्वरों में , महिलाओं के  कंठ से   गूंजते थे , जिसका अर्थ  था की----" हे माँ  , मैं आपके दर्शन किस तरह प्राप्त करूँ ? क्यूंकि तेरे मंदिर का द्वार बहुर ' संकरा ' है ! "  tab
  गाँव में एक भव्य आयोजन - 'रामलीला ' का होता था  , जो इन नो दिनों तक चलती , और बाद में दशहरा पर , रावन दहन के बाद , लोग घर घर जा कर गले  मिलते ! इस दिन कई वर्षों की दुश्मनी भी लोग आपस में मिल कर ख़तम कर लेते थे !
     ' रामलीला ' के लिए अलग एक हाल बना था , मंच पर सेट थे , और पुरे गाँव के लोग , अपने अपने घर से आसन लेकर , ज़मीं पर जाकर अपना अड्डा पहले ही से जमा लेते थे , लीला रात एक या