बुधवार, 28 अगस्त 2013

 आशाराम   एक कथावाचक हैं , उन्होंने अपना करियर दस साल पहले  इस लाइन में , एक उद्योग के रूप में ढूंढा , और जनता में उपदेशात्मक भाषण दे कर , वे धीरे धीरे प्रसिद्द हो गए !  ' संत ' की पदवी आज कोई भी खुद ले सकता है , क्योंकि यह समाज द्वारा किसी को बांटी नहीं जाती ! किसी की वाणी विद्या से मोहित होकर , उसके कई चाहने वाले , उसके अनुगामी के रूप में , उसे ' महान ' कह सकते हैं , लेकिन जरुरी नहीं की , वह खुद भी महान हो ही !

   धर्म को उद्योग के रूप में , अपने हित में , उपयोग करने वालों की कमी , किसी भी समाज में कम नहीं है ! वस्तुतः , ' धर्म ' नितांत व्यक्तिगत चीज़ है 1, आदर्शों , आध्यात्म , सिद्धांतों , का विवेक पूर्ण परिपालन , व्यक्तिगत रूप से करना  ही धर्म धारण करने की परिभाषा में आता है !  ऐसे में ' धर्म ' को '  शस्त्र   ' के रूप में प्रयोग करने वालों का  या , सत्ता के विस्तार के  लिए उसके नाम पर युद्ध करने वालों का   अनुगमन भी , विवेकपूर्ण कार्य  नहीं  कहा जा सकता !

संस्कार ,  चिंतन , रास्त्रप्रेम  , 

 
 
कृष्ण  के  युग  में भी ,
कंस था , दुशाशन , दुर्योधन ,
 और शकुनि के पांसे  थे ,
 एक साथ ,
जिन्हें पालते  थे ,
 अंधे  ध्रतराष्ट्र    .,!!

 उस  युग में भी ,
 यशोदा थी ,
 राधा थी ,
 देवकी थी ,
  नारी  के हर रूप के
 अविरल प्रेम का  प्रतीक , 
  गूंजता था चहुओर
 गाँव में
 ह्रदय स्पर्शी बांसरी का संगीत  !

   और थे बलराम ,
 , अर्जुन ,
   और युधिस्थर  ,
  संघर्ष के द्योतक ,
 अन्याय विनाशक

आज भी वे सब हैं ,
 उसी रूप में , 
 हर जगह ,

 कृष्ण है ,
हमारे  ह्रदय की   कोठरी  में ,
 बजाते हैं बांसुरी ,देते हैं सन्देश
 की उठो ,  पार्थ ,
यह समय मोह का नहीं ,
 कायरता का भी नहीं ,
 हुंकार का है ,
 गांडीव की टंकार का है ,
 मैं तो हूँ बस तुम्हारा सारथी ,
ओ महारथी ,
समय   तो तुम्हारे बाणों  से ,
 दुष्टों  के संहार का है , !!