शुक्रवार, 14 जून 2013

sangeet par vaartalaap

Sabhajeet Sharma गोस्वामीजी !! आपने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है ! कोई दिन हुआ करते थे जब गाँव में साधारण लोग भी शास्त्रीय संगीत की गहन समझ रखते थे ! उन दिनों उस्तादों की महफ़िलें या तो किसी पर्व पर मंदिरों में , ( विशेषकर सावन के झूलों पर ) में होती थी या किसी रईस की बरात में विशेष गोस्ठियों में ! मुझे याद है , उन दिनों गाँव में सभी वर्गों में ना सिर्फ रागों के जानकार होते थे बल्कि वे खुद भी थोड़ा बहुत गाते भी थे ! अपने इस ६३ वर्षीय जीवन में , मेने संगीत को वर्गों में विभाजित होते देखा ! शास्त्रीय संगीत वस्तुतः सुनने की नहीं बल्कि अनुभव करने , उसमें आत्मसात होकर , जीने की चीज़ है ! इक ताल की विलंबित लय पर , जब ख्याल गायक , स्वरों का विस्तार करता है , तो वह हर बार एक नवीन सृजन ही होता है , कोई अनुकृति नहीं होती ! इन स्वरों को , जिनमे बोल कोई अहमियत नहीं रखते , कान सुनाते हैं और उसे सीधे ह्रदय पटल पर अंकित करते जाते हैं , जहाँ बाकि संसार से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता ! मेरे दादाजी ध्रुवपद के गहन जानकार थे और मृदंग के कई आदिमात्राओं ( १३.१५.१७.२१ मात्रा . आदि ) के ताल पर बंदिशें जानते थे ! वे उस समय ' लाइ लप्पा ' जैसे फ़िल्मी गीत सुनकर व्यंग से कहते थे ' यह कोई संगीत है ? जो सिर्फ तीन मिनट में ही पूर्ण हो जाता है ? " !
चार्ली चेप्लन ने मशीनी युग की जो हास्य फिल्म बनायीं थी वह आज हमपर पूरी तरह लागु है ! हमें हर जगह फास्ट फ़ूड और केप्सूल चाहिए ! ' फ़िल्मी संगीत ' में २० वीं सदी तक फिर भी कर्णप्रिय धुनें सुनने को मिलती रही , लेकिन अब अभाव है ! आज जो थोडा बहुत लगाव संगीत से लोगों का बचा है उनका कारण पुराणी धुनों का मधुर संगीत ही है ! बाकी सच कहें तो आज आस्कर विजेता ऐ आर रहमान की कितनी धुनें लोग दोबारा गुनगुनाते हैं ? शास्त्रीय संगीत से टूटकर जो रस पुरानी धुनों में बचा रह गया था वो अब समाप्ति की और है ! आगे संगीत का मतलब बचेगा ' नृत्य के लिए " -- 'लहरा ' ...!
 
 
Virendra Goswami Sabhajeet Sharma ji, क्या कहूँ,क्या लिखूं ? आपकी इन पंक्तियों ने तो मुझे स्तब्ध कर दिया. हाँ. यही शाश्वत सत्य है कि '' जब ख्याल गायक , स्वरों का विस्तार करता है , तो वह हर बार एक नवीन सृजन ही होता है , कोई अनुकृति नहीं होती." जी हाँ, प्रत्येक दफ़ा नवसृजन, नवकृति. श्रोताओं की सामूहिक उपस्थिति में ऐसा किसी अन्य विधा में नहीं देखा गया. ये संगीत ही है जो समस्त अन्य विधाओं, कलाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर साधक के साथ-साथ श्रोताओं को भी उस सर्वोच्च से एकाकार कराता है. इससे श्रेष्ठ मनोचिकित्सा अन्य कोई नहीं. सारे दुर्भाव, सारी मलीनतायें इसमें बह जाती हैं, जो शेष रहता है वो है निर्मल मन. व्यक्तिगत रूप से मैं आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूँ पर चूँकि युग बदला है, समय बदला है और हमारी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं, हर क्षण एक भागम-भाग है, यहाँ निश्चिन्त होकर सुकून से किसी अन्य विधा को समय दिया जाना संभव नहीं दिख रहा है ( यद्दपि ये स्थिति सुखद नहीं है ) इसीलिए मैंने अपनी पोस्ट में फिल्म संगीत के शास्त्रीय पक्ष को श्रवण स्तर पर उभारने का प्रयत्न किया है. तीन-साढ़े तीन मिनिट की अवधि की लघु परफोर्मेंस से परिचित होकर, किसी भी भांति यदि शास्त्रीय पक्ष की और नवीन श्रोताओं का रुझान हो सके तो अंतत: इससे शास्त्रीय संगीत का ही भला होगा. और हाँ, आपकी संगीत समझ और क्रियेशन से, मैं समय-समय पर आपकी पोस्ट्स से परिचित हुआ हूँ और आपकी योग्यता और सलाहियत का बहुत बड़ा प्रशंसक भी हूँ.
 
 
Sabhajeet Sharma गोस्वामी जी प्रश्न गूढ़ है .. किन्तु अनुत्तरित नहीं ! 'कला' मनुष्य ह्रदय के भावों की अभिव्यक्ति का साधन है ! इसके कई स्वरुप हो सकते है , जो व्यक्ति जैसे भी अपनी अभिव्यक्ति करने में सक्षम हो , वैसे इन कलाओं का प्रयोग करे ! अभिव्यक्ति व्यक्तिगत होती है , और उसे व्यक्त करने का माध्यम भी व्यक्तिगत ! संगीत , साहित्य , चित्रकला , जीवन शेली की कला , के बीज प्रायः हर मनुष्य के जेहन में समाये रहते हैं , और वह इनका अपने हिसाब से प्रयोग करता है !
किन्तु आपका प्रश्न , संगीत और साहित्य के पारस्परिक साथ और उसके संयुक्त प्रभाव को लेकर है ! साहित्य की उत्पात्ति का श्रोत्र ' विचार ' है जबकि संगीत की उत्पत्ति का श्रोत्र- ' ह्रदय -भाव " !वस्तुतः दोनों ही मस्तिस्क की ही क्रिया हैं , लेकिन संगीत में ' वातावरण ' का सर्जन होता है , जिसके लिए ' शब्दों ' की बहुत जरुरत नहीं पड़ती ! एकांत में बहते हुए 'झरने ' के स्वर , उसकी लय आपको स्पष्टतः अनुभव हो जायेगी , किसी शब्द की जरुरत नहीं , कोयल की कूक , रेल के इंजन की सीटी , ट्रेन के पहियों से निकलती लय , आपकी यात्रा को आल्हादित करती है ! कान से सुनी गयी ध्वनियों को मन सीधे आत्मसात करता है , जबकि ' आँखों ' के माध्यम से पढ़ा गया शब्द , पहले मस्तिक पटल पर जाता है ,विष्लेतितहोता है , फिर हमारी संवेदनाओं को जगाता हुआ मन तक जाता है ! साहित्य के लिए , लेखन कला , और पठन कला , का ज्ञान होना जरुरी है , जबकि संगीत के लिए ये दोनों ज्ञान जरुरी नहीं ! इसी सहजता के कारण सामान्य जन साहित्य से दूर होते गए और संगीत को सहजता से ग्राह्य करते गए ! लेकिन साहित्य इससे पिछड़ गया हो ऐसा नहीं है ! सरल भाषा में , सामान्य जन के लिए रचा गया साहित्य सदा लोगों के दिल में घर करता रहा , इसीलिए , सूर , कबीर , और तुलसीदास , अमर हो गए !
आप के प्रश्न पर यह बात बिलकुल सटीक है की संगीतमय साहित्य , व्यक्ति की भावनाओं को झिझोड़ सकता है , जबकि अलग अलग वे ऐसा करने में समर्थ नहीं ! इसीलिए सूर , कबीर , और तुलसीदास ने जो साहित्य रचनाएँ की वे गेय बनी ! संगीत में 'लय ' और ताल ' उसे मात्राओं के बंधन में बाँध कर रखते हैं , तो यही बात ग़ज़ल , पदों , और काव्य में है , जिसमें लय , और छंद बध्यता , मात्राओं के अनुशाशन को स्वीकार करके चलती हैं ! यही अनुशाशन , दोनों विधाओं को जोड़ने का 'पुल ' भी है !
फिल्म संगीत को निश्चय ही यह श्रेय जाता है की उसने इन दोनों विधाओं को जोड़कर एक अलग संसार की रचना की जो 'सामान्य ' जन को सहज स्वीकार हो गयी ! ! इसी श्रखला में हम ' जगजीत सिंह ' के योगदान को नहीं भूल सकते , जिन्होंने ग़ज़ल की दुनिया के वातावरण को संगीत के स्वरों के माध्यम से सामान्य जगत तक पहुँचाया !
लेकिन आज जो हो रहा है , वो न संगीत है न साहित्य ...! विदेशी सभ्यता में समाज में उत्पन्न हुई कुंठा के गीतों को , 'पोप ' विधा में चींख कर गाने के चलन को हमारा युवा वर्ग संगीत के रूप में स्वीकार कर रहा है ..., और कहना गलत न होगा की यह काम भी - वही फिल्म जगत के माध्यम से हो रहा है , जिसकी प्रशंशा हम मधुर संगीत के लिए करते हैं ! ऐसे में हमें जरुरत है एक और जगजीत की , जो भारतीय संगीत और काव्य को माध्यम बनाकर , संगीत की बुझती लों को फिर जगाये !

रविवार, 9 जून 2013

bhatkaan


















जीवन की संकरी गलियों में ,
 भटक ना जाऊं  कहीं अकेला .., !!

प्यार माँगना चाहा  जिससे ,
उसने सदा मुझे ठुकराया ..,
जिसने मुझसे प्यार किया कुछ ..,
उससे मैं खुद हो कतराया ..!

पता  नहीं पतझर कब आया ..,
 जहाँ कभी बसंत था खेला  ..!!

सारे  दिन अनुभव करता था ..,
 मेरे भी पीछे कोई है ..,
मेरी तरह किसी नादा की ..,
 मनचाही मंजिल खोई है .., !

'पग- ध्वनि ' खुद की ही पायी ..,
 जब  मुड  देखा संध्या की बेला ..!!

किससे क्या कुछ कहूँ अजब जब ,
 दुनिया का ही द्रष्टिकोण है ..,
 जो वाचाल उसे सब सुनलें ..,
 कौन सुने उसकी जो मौन है ..,

भाषाओं के ग्रंथों खरीदे ..,
भावों पर खर्चा ना धेला .., !!

--सभाजीत