मंगलवार, 12 नवंबर 2013

  " सनातन ",,,,!!

     ' तिमिर '  ,' अग्नि '  , ' शून्य ' ने ,
      मिलकर रचा ' ब्रम्हांड ' ,,!
      अपरिमित ,,
       सीमा रहित ,,,!!

      ' ज्ञात जितने ,
         उतने ही ' अज्ञात ' ,
          सूक्षतम बन ,
          वृहततम , में व्याप्त ,
           त्रिलोकी वे  ,
             देव त्रय ,,,!!

          ' संकुचित   स्वयं ,
             स्वयं ही ' विस्तार ' ,
             एक दूजे के वे पूरक ,
              आपसी  " आधार " ,,
                स्वयं पालक ,
                  स्व  ' विनाशक ' ,,!!

             ' विलय हैं , जिसमे सभी
,               ऊर्जा के रूप ,
                विरलता धारण किये ,
                 जहाँ ' तत्व ' सारे  ' घनीभूत ' ,
                   वह तिमिर  ,,,
                     वही  ' हर ' ,,,!!
             
                    सदा चेतन  ,
                     सृष्टि   केतन ,,
                      ' पितृ ' भाषित ,
                       स्व प्रकाशित ,
                       ' ब्रम्ह ' अग्नि ,
                         स्वयं भू ,
                          स्वयं जीवन ,
                           स्वयं जीव ,,,!
                     
                          श्याम वर्णी ,
                         गहन धारक ,
                         संवहन , गतिचक्र साधक ,
                            शून्य में
                     

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

sss

संस्कृति के क्षय पर , दूसरों को दोष देने से पूर्व  , पहले हमें खुद अपने अतीत , और धार्मिक परम्पराओं के निरंतर बदलते स्वरूप विचार करना होगा !
    मुझे याद है , मेरे गावं   , ' नोगाव ' में , पहले  कहीं भी ' दुर्गा ' मूर्ति ' नहीं बैठती थी !  गाँव में एक मंदिर था , जहाँ नो दिनों तक , स्त्रियाँ , सुबह उठाकर , पानी चढाने जाती थी ! किन्तु श्रद्धा और भक्तिभाव में कोई कमी नहीं थी ! ' कैसे की दर्शन पाऊं ऱी  माई तोरी  संकरी किवड़िया   '  के  बोल  सामूहिक   स्वरों में , महिलाओं के  कंठ से   गूंजते थे , जिसका अर्थ  था की----" हे माँ  , मैं आपके दर्शन किस तरह प्राप्त करूँ ? क्यूंकि तेरे मंदिर का द्वार बहुर ' संकरा ' है ! "  tab
  गाँव में एक भव्य आयोजन - 'रामलीला ' का होता था  , जो इन नो दिनों तक चलती , और बाद में दशहरा पर , रावन दहन के बाद , लोग घर घर जा कर गले  मिलते ! इस दिन कई वर्षों की दुश्मनी भी लोग आपस में मिल कर ख़तम कर लेते थे !
     ' रामलीला ' के लिए अलग एक हाल बना था , मंच पर सेट थे , और पुरे गाँव के लोग , अपने अपने घर से आसन लेकर , ज़मीं पर जाकर अपना अड्डा पहले ही से जमा लेते थे , लीला रात एक या

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

gahre pani paith

" गहरे पानी पैठ ........." !!

मानव जीवन में ' मित्र' शब्द का अद्भुत अस्तित्व है ॥

अन्ग्रेजी में जहाँ इस सम्बन्ध को एक शब्द - " फ्रेंड " के नाम से सीमित दायरे में बाँध दिया गया है , वहीं हिंदी में इस को कई नामों --' मित्र ', 'सुह्रद', 'सखा' से परिभाषित किया गया है । मित्रता वह अनुभूति है जिसे लिंग , स्थान , जाति, के बन्धनों में नहीं बांधा जा सकता । हिंदी में जहाँ पुरुष मित्र को ' सखा' के रूप में संबोधित किया गया है वहीँ ' स्त्री ' मित्र को ' सखी ' के रूप में । वृन्दावन की कई स्त्रियाँ , कृष्ण की सखी थी - और कृष्ण ने मित्र भाव से इनके साथ जीवन जिया ।

मित्र भाव - " सम- भाव " है । इसमें ना तो कोई बड़ा होता है , ना कोई छोटा । इसमें उम्र भी कोई अस्तित्व नहीं रखती । ' सम-भाव ' सामान अनुभूतियों , सामान विचारों , और सामान पसंद से उपजता है । यह निष्कपट , निष्कलंक होता है । बाल्य काल के मित्र इसी सम- भाव के साथ आगे बढ़ते है । कृष्ण की सखियाँ , कृष्ण को बिना देखे नहीं रह पाती थी - वे उनके साथ शरारतों में सम-भाव से सम्मलित होती थी । अपने - अपने दांव को निष्कपट भाव से खेलने वाले ये मित्र अनोखे थे - जो चोर- सिपाही का खेल क्रमशः खेलते रहते थे ।

मित्र भाव में 'ज्ञान ' की कोई भूमिका नहीं । ज्ञान मनुष्य के चारों ओरकई तर्क ,, कई दायरे खडा कर देता है , जो मित्र भाव में सर्वथा वर्जित है । " राम कथा " में " राम " सदेव ग्यानी के स्वरूप में ही हमारे सम्मुख आते है .इसी कारण उनके मित्रों की सूची शून्य है । " राम - सुग्रीव " अथवा " विभीषण - राम " मित्रता , उद्येश्यों की प्राप्ति के लिए की गई राजनेतिक संधि है , अतः मित्रता के दायरे में नहीं आती । यह विडम्बना ही है की राम के जीवन में मित्रता का नितांत अभाव है , जबकि कृष्ण का युवा काल " मित्र -रस " से रसा - पगा है । यही कृष्ण जब ग्यानी हो जाते है तो मित्रों को खो देते है । कृष्ण - अर्जुन का सम्बन्ध भी मित्रता के दायरे में नहीं आता , क्योंकि वहा " सम- भाव " नहीं है । ग्यानी कृष्ण जब अपनी बाल्य काल की सखियों को "अनासक्ति " का पाठ पढ़ाने की चेष्टा , अपने दूत " उद्धव " के जरिये करते है , तो उद्धव - " सम भाव ' के शब्द बाणों से आहत होकर , ज्ञान की अपनी क्षत - विक्षित पोथी को लेकर कृष्ण के पास वापिस लोट आते है ।

मनुष्य के अन्य सम्बन्ध सीमित है , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असीमित है । पिता का सम्बन्ध ' एक ' है , माँ का -एक , पत्नी का - एक , भाई बहिनों के - तीन चार , किन्तु मित्रता के सम्बन्ध असंख्य हो सकते है । यहीं आकर मित्र शब्द -" सखा" शब्द से भिन्न हो जाता है । सखा - " अस्तित्व " है और मित्र - " अनुभूति " । 'अस्तित्व' हमारे जीवन का 'सहभागी' होता है , जबकि 'अनुभूति ' विचारों से 'सहभागिता' करती है । सखा या सखी के सामने हम ह्रदय के पट पूरी तरह ख़ोल देते है , वह हमारी संवेदनाओं की सहभागिता करता है , निष्कपट , निष्कलंक भाव से , ओर हम अपना बोझ उतार कर उसे दे देते हीवह ब्प्झ जो हम अंतस में ढो रहे होते हैं , उसे मात्र सखा ही ग्रहण कर सकता है , मित्र दिलासा दे सकता है , उपाय बता सकता है, सहानुभूति प्रकट कर सकता है , हमें बोझ रहित नहीं कर सकता ।

पश्चिम से आई सभ्यता ओर तकनीक ने , मित्रता के दायरों को विशाल समुद्र में बदल दिया है । आधुनिक युग में मित्रता के लिए हमारे सामने भीड़ खड़ी है । हम जिसे चाहे , उसे मित्र के रूप में चुन सकते है । मित्रता के इस मंच को उत्पन्न करने वाली कई साइट्स आपस में व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता में संघर्ष रत है ओर लोगों को कई विकल्प देती है ओर - लोग अपनी अपेक्षाओं ओर सुविधाओं के हिसाब से इनका उपयोग करते है ।

युवा वर्ग में मित्रता का मानदंड - ' फेस ' है । वे चेट्स करना चाहते है । मनोरंजन मित्रता का उद्येश्य है । ओर अपने अकाउंट में अधिकतम संख्या में " हिट्स " जोड़ना चाहते है । इस व्यापारिक जगत में , विचारों के लिए उनके पास समय नहीं है । जबकि " वयस्क " " व्यक्ति , वहां वहां से तलाशकर जुगाड़े गए संदेशों से खुद को व्यक्त करना चाहते है । वे चाहते है की लोग उनको चिन्हित करें , वे  लोकप्रिय  हों । वे अपनी भावनाओं को फ़िल्मी गीतों के माध्यम से भी स्फुटित करते है ओर अपना सहभागी तलाशते है । आधुनिक काल खंड से प्रायः कट गया उम्र दराज़ व्यक्ति , विचारों को व्यक्त करने से डरता है , क्योकि वे विचार आधुनिक समाज को स्वीकार्य नहीं । ऐसे लोगों की संख्या इन मंचों पर लगभग नगण्य ही रहती है ।

स्त्रियाँ इन नायाब मंचो की शोभा होती है । दाम्पत्य जीवन की कठिन नाव पार सवार स्त्रियाँ , मित्रता की नाव पर भी एक पैर रखना चाहती है, किन्तु इसके लिए वे डरी सहमी भी रहती है । मित्रता का मुखौटा लगा कर , अपरिपक्व , असामाजिक तत्व उनसे अप्रसांगिक बातें करने का प्रयत्न करते है । इस लिए अधिकाँश स्त्रियाँ - " नो चैट " की तख्ती के साथ - अपने ज़ोन पर ताला लगा कर रावण से ठगे जाने की सभी संभावनाएं ख़त्म कर देती है । ये स्त्रियाँ विचारों की दुनिया में सहभागिता चाहती है , अपने विचार व्यक्त करना चाहती है , किन्तु इसके लिए जो मित्र उन्हें चाहिए , उन्हें इन मंचों पर ढूंढना उनके लिए कठिन होता है । अधिकतर पुरुष , मित्रता की आड़ में स्वच्छंद स्त्री मित्र की तलाश करता है , जबकि यथार्थ में कोई भी स्त्री कभी स्वच्छंद होती ही नहीं । वस्तुतः जो भी स्त्री- पुरुष स्वच्छंदता की परिभाषा में आते है , उनके लिए मित्रता कोई मायने नहीं रखती , क्योंकि वे मित्रता को एक खेल के रूप में ही लेते है ।
मित्रता के इस विशाल सागर में , आज मित्रता मछलियों की तरह तैर रही है । किन्तु सागर का पानी 'खारा' है - उसमें मिठास नहीं है । और इसीलिए मित्रता की उस स्वाभाविक मिठास की प्यास हमें तब भी बनी ही रहती है । " नो स्ट्रेंजर " के नारे के पीछे , हम अपरिचित नहीं रहते , किन्तु पूर्णतः परिचित भी नहीं होते । वस्तुतः संमाज से बड़ा कोई मंच , सखा या मित्रता के लिए हो ही नहीं सकता । अपने घर के दरवाज़े बंद करके हम पडोसी से बात चीत करने से भी कतराते है , किन्तु आकाशीय मार्ग पर चर्चा करके एक " कल्पनीय " समाज की सरंचना कर रहे होते है , जहां - " मुख- चित्रों " के पीछे छिपे , किसी अपने जैसे व्यक्ति की हमें तलाश होती है । यह एक मृग मारीचिका है जो मानसिक सूख तक सीमित रहती है ।
हमें अपने संसार को रचने की स्वतन्त्रता है सुख़ की अनुभूति हमारी अपनी है , वह जहां मिले उसे पाना हमारा अधिकार है । अपने विचारों पर टिपण्णी या तालियाँ पाकर हमें सूख या संतोष मिल सकता है , किन्तु मित्रता का - " सम भाव " नहीं । वह फिर भी हम से बहुत दूर रहता है । जैसा की मेने कहा - " सम-भाव " " अस्तित्व " है , " अनुभूति नहीं , इसलिए मंचीय मित्रता के साथ साथ , हमें अपने घरों के दरवाज़े खोल कर , पड़ोस में भी एक मित्र ढूंढना होगा । यह मित्र एक अस्तित्व होगा । यह मित्र आपसे मज़ाक कर सकता है , आपकी संवेदनाओं में शरीक हो सकता है , अन्याय के विरुध्ध कंधे से कंधा मिला सकता है और वैचारिक सहभागिता भी कर सकता है ।
अपने पड़ोस में ऐसे मित्र को ढूँढना एक कठिन बात है । क्योंकि मित्रता में " ज्ञान " वर्जित है और अस्तित्व पूर्ण मित्रता में 'ज्ञान' आड़े आता है । ज्ञान हमारे बीर्च " स्टेटस " की दीवार खड़ी करता है , और हम में अपने अस्तित्व का अहम् पैदा करता है .और इसी कारण मित्रता नहीं मिलती । कृष्ण यदि खुद को " इश्वर " स्वरुप में गोपियों के समक्ष प्रस्तुत करते तो वे उनके सखा नहीं बन सकते थे ।
कबीर ने कहा -
" जिन खोजा तिन पाइयां , गहरे पानी पैठ ॥,
हों बौरा डूबन दारा , रहा किनारे बैठ ।।"
मित्रता का मोती पाना है तो गहराई में उतरना ही होगा । किनारे बैठे व्यक्ति को , लहरों की सतह पर उतराते हुए मोती नहीं मिल सकते । 'दिया' अपने नीचे अन्धेरा रख कर दूर तक कालिमा से युध्ध करता है किन्तु उसे 'सूर्य ' नहीं कहा जा सकता । सूर्य की किसी भी दिशा में चारों और सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश ही है । मित्रता सूर्य की तरह है - जिसे अपने चारों और प्रकाशित होना ही चाहिए ।
------सौरभ
   ( सभाजीत शर्मा )




मंगलवार, 10 सितंबर 2013

 पंडित राम  चरण दास  महंत , ने भगवान् ' जगन्नाथ ' की मूर्ति के आगे पर्दा खींचा , और उन्हें ' सोया ' हुआ  मान कर , आरती में आये पैसे गिने ! कुल अदद बीस रुपये ही चढ़ाए थे भक्तों ने , प्रसाद में भी इलायची दाने  थे  , लड्डू , या बर्फी चढाने वाला कोई नहीं आया था !
    रामचरण दास  ने , लोहे के कपाट बंद किये , उसमें गोदरेज का भारी ताला  डाला  , इतनी कम चढ़ोतरी  पर  एक उन्सास भरी ,  ,  और रोज की तरह आश्वस्त हो गए  की  अब भगवान् पूरी तरह सो गए होंगे  , बाहर आने का तो प्रश्न ही नहीं !
   मंदिर के बाहर आँगन था , उसमें एक बल्ब जलता रहता था ! आँगन से लगी राम चरण दास की कोठारी थी , जहाँ वे अपने बालक के साथ रहते थे ! रामचरण दस , नदी किनारे एक गाँव के रहने वाले थे १ बचपन से ही उन्हें मेहनत  से लागाव नहीं था , उनके दादाजी ने उन्हें सिखाया था की सब भगवान् देता है , ! एक कहावत उनके दादाजी कहा करते थे - ' जब दांत ना थे तब ' दूध ' दियो , अब दांत हुए तो क्या खाय को ना देगा वो .?? "   रामचरण इसी मन्त्र को पढ़ते हुए , यहाँ शहर के बाहरी भाग में आ गए थे , जहाँ एक सेठ ने अपनी पत्नी के वियोग में इस मंदिर का निर्माण करवाया था ! वो सेठ यह मंदिर इन्हें सोंप कर  ' पत्नी ' के पास ' गोलोक ' सिधार गया था !
        रामचरण ने अपना झोला चेक किया ,  शंख , झालर , जगन्नाथजी की छोटी मूर्ति , झोले में अपनी जगह थी !   ' कल  गणेश चतुर्थी है - कई जगह मूर्तियाँ बैठाई गयी हैं , जहाँ उन्हें ' प्राण - प्रतिस्था ' करवाने जाना होगा ! कमाई  का दिन है , जल्दी उठना  होगा १  वे आगे बढ़ कर आँगन में आगये १ बल्ब बुझाना जरुरी था ! बिजली वाले अनाप- शनाप बिल दे जाते हैं , यदि ना बुझाया तो खर्चा बढ़ जाएगा !
   उन्होंने आँगन का बल्ब बंद किया और मुड़  कर अपनी कोठारी को जाने को हुए तो देखा , आँगन के कोने में एक भेंसे पर सवार '    काला , मोटा सा आदमी , अपनी    लाल लाल ' आँखों सेउन्हें घूर  रहा था !
   रामचरण की आँखें फटी की फटी रह गयीं ! फंसे हुए गले से किसी तरह ताकत बटोर कर वे बोले -- ' कौन है। .?? कौन है वहां ,,???
      तब तक    उन्होंने आँगन का बल्ब बंद किया और मुड़  कर अपनी कोठारी को जाने को हुए तो देखा , आँगन के कोने में एक भेंसे पर सवार '    काला , मोटा सा आदमी , अपनी    लाल लाल ' आँखों सेउन्हें घूर  रहा था !
   रामचरण की आँखें फटी की फटी रह गयीं ! फंसे हुए गले से किसी तरह ताकत बटोर कर वे बोले -- ' कौन है। .?? कौन है वहां ,,???
      तब तक वह आदमी अँधेरे से निकल  कर   रामचरण  के सामने आकर खड़ा हो गया !  रामचरण को उसने पूछा-
      ' कैसे हो रामचरण ',,,?
        ठीक हूँ महराज। ."किसी तरह  थूक निगलते हुए रामचरण के मुंह से आवाज़ निकली ,,, ,,
      -- लेकिन आप कौन हैं ,,,?? "
        वह हंसा --- मुझे नहीं पहचाना रामचरण ,,,/ कैसे पुजारी हो तुम ,,? ,,, मैं ' यम ' हूँ ,,,,यमराज ' ,,,! "
       रामचरण की आंखजों के सामने अन्धेरा छा गया ! वह भरभरा कर गिरने को हुआ की उस व्यक्ति फिर कहा ----  " घबराओ नहीं ,,,! मैं तुम्हारे लिए नहीं भगवान जगन्नाथ के लिए आया था ,,, यहां से निकल रहा था तो सोचा उनसे मिल लूँ ,, ,,,पर देख रहा हूँ की तुम उन्हें ताले में बंद कर दिए हो ,,,"
        हाँ प्रभु ,,, वे सो चुके थे ,,, इसलिए  द्वार का ताला लगा दिया ,,, कहिये तो खोल दूँ ,,,! '
       - ' अरे नहीं ,,  मुझे अंदर जाना होगा तो मैं बंद दरवाजे के अंदर वैसे ही घुस जाऊंगा ,,, ,   अब यहाँ ठहर ही गया हूँ तो चलो तुमसे ही बात करलूं --- धर्म के लिए क्या कर रहे हो आजकल ,,??
     '  प्रभु आजकल धर्म रह ही कहाँ गया ,,?? ,,, लोग ' पिज्जा ' ' बर्गर ' -'' में सैकड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं लेकिन  ,,, मंदिर में एक रुपये से ऊपर नहीं चढ़ाते ,,,!   अब सिर्फ त्योहारों की प्रतीक्षा करता रहता हूँ  की कब आएं -- मूर्तियां स्थापित हों ,,,और   मेरी पूछ बढे ,,, ! "
          हूँ ,,' यमराज  ने हुंकारा भरा- !-   तो  '  अब मूर्तियां -स्थापित करना ' धर्म ' हो गया है ,,,??
            हाँ महराज --'  रामचरण थोड़ा उत्साहित होकर बोला -  '  अभी  गणेश  उत्सव है '  है ,,,  आगे दुर्गा उत्सव आएगा ,,,इसी बीच पितरों के श्राद्ध के दिन भी आएंगे ,,  इसमें कुछ कमाई हो जायेगी ,,, इस साल मूर्तियां पिछले साल से ज्यादा बन रही हैं ,,,  ' प्राण प्रतिष्ठा ' से भी काफी कुछ मिल जाएगा ,,,!!     '  प्रभु आजकल धर्म रह ही कहाँ गया ,,?? ,,, लोग ' पिज्जा ' ' बर्गर ' -'' में सैकड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं लेकिन  ,,, मंदिर में एक रुपये से ऊपर नहीं चढ़ाते ,,,!   अब सिर्फ त्योहारों की प्रतीक्षा करता रहता हूँ  की कब आएं -- मूर्तियां स्थापित हों ,,,और   मेरी पूछ बढे ,,, ! "
          हूँ ,,' यमराज  ने हुंकारा भरा- !-   तो  '  अब मूर्तियां -स्थापित करना ' धर्म ' हो गया है ,,,??
            हाँ महराज --'  रामचरण थोड़ा उत्साहित होकर बोला -  '  अभी  गणेश  उत्सव है '  है ,,,  आगे दुर्गा उत्सव आएगा ,,,इसी बीच पितरों के श्राद्ध के दिन भी आएंगे ,,  इसमें कुछ कमाई हो जायेगी ,,, इस साल मूर्तियां पिछले साल से ज्यादा बन रही हैं ,,,  ' प्राण प्रतिष्ठा ' से भी काफी कुछ मिल जाएगा ,,,!!

      ' प्राण प्रतिष्ठा ",,,,???,,,, यमराज की भृकुटि तन गयी ,,,,! ,,
       ,' अरे  मूढ़ रामचरण ,,,   तुम किससे क्या बात कर रहे हो मालुम है ,,??    ,,,, ' मैं ' यमराज ' ,,, प्राणो को हरने वाला ,,,,और तुम   क्या भगवान हो --- ' प्राणो को प्रतिष्ठित ' करने वाले ,,,??,,,  अपनी औकात मालुम है तुम्हें ,,,??

      रामचरण की सिट्टी पिट्टी गम हो गयी  ,,, घबरा कर बोला --- ' प्रभु  में तो मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठित करने की बात कर रहा था >>>! '
        अब याम लगभग आपे से बाहर हो गए ,,,!  बोले --
        मूर्र्तियों में ,,?? किसकी मूर्तियों में ,,?? ,,, भगवान की मूर्तियों में।   vighn       vinaashak     ganesh     ganesh       मूर्र्तियों में ,,?? किसकी मूर्तियों में ,,?? ,,, भगवान की मूर्तियों में   ??   विघ्न विनाशक और  माँ चंडी की मूर्तियों में ' प्राण '',,??    कहाँ  स्थापित है यह मूर्ति   किस मंदिर में ,,,? क्या वहां उनकी मूर्ति  के ऊपर ' गुम्बद ' बनाया तुम्हंे ,,, क्या उस स्थान को वास्तु से मुक्त किया तुमने ,,क्या उस स्थान की ' दिशा ' देखी तुमने ,,,??   क्या तुम नहीं जानते की इन आदि शक्तियों से खिलवाड़ नहीं किया जाता ,,,बहुत सोच समझ कर स्थापित की जाती हैं वो मूर्तियां ,,,?? ,,

     रामचरण को तो काटो तो खून नहीं ,,,,!  गिड़गिड़ाकर बोला --

 ' प्रभु ये मूर्तियां अस्थाई होती हैं ,,,, मिटटी की बनी ,,,  इसमें दुर्गा के साथ साथ ' महिषासुर ' भी  स्थापित होता है ,,,!!   नो दिन बाद इन्हे नदी में विसर्जित कर दिया जाता है ,,! "

      ' ओह  तो यह भी शुरू कर दिया तुमने ,,, पृकृति में व्याप्त इन ईश्वर की शक्ति - मूर्तियों को   ' अस्थाई ' रूप से भी स्थापित करने लगे ,,,?

                                

बुधवार, 28 अगस्त 2013

 आशाराम   एक कथावाचक हैं , उन्होंने अपना करियर दस साल पहले  इस लाइन में , एक उद्योग के रूप में ढूंढा , और जनता में उपदेशात्मक भाषण दे कर , वे धीरे धीरे प्रसिद्द हो गए !  ' संत ' की पदवी आज कोई भी खुद ले सकता है , क्योंकि यह समाज द्वारा किसी को बांटी नहीं जाती ! किसी की वाणी विद्या से मोहित होकर , उसके कई चाहने वाले , उसके अनुगामी के रूप में , उसे ' महान ' कह सकते हैं , लेकिन जरुरी नहीं की , वह खुद भी महान हो ही !

   धर्म को उद्योग के रूप में , अपने हित में , उपयोग करने वालों की कमी , किसी भी समाज में कम नहीं है ! वस्तुतः , ' धर्म ' नितांत व्यक्तिगत चीज़ है 1, आदर्शों , आध्यात्म , सिद्धांतों , का विवेक पूर्ण परिपालन , व्यक्तिगत रूप से करना  ही धर्म धारण करने की परिभाषा में आता है !  ऐसे में ' धर्म ' को '  शस्त्र   ' के रूप में प्रयोग करने वालों का  या , सत्ता के विस्तार के  लिए उसके नाम पर युद्ध करने वालों का   अनुगमन भी , विवेकपूर्ण कार्य  नहीं  कहा जा सकता !

संस्कार ,  चिंतन , रास्त्रप्रेम  , 

 
 
कृष्ण  के  युग  में भी ,
कंस था , दुशाशन , दुर्योधन ,
 और शकुनि के पांसे  थे ,
 एक साथ ,
जिन्हें पालते  थे ,
 अंधे  ध्रतराष्ट्र    .,!!

 उस  युग में भी ,
 यशोदा थी ,
 राधा थी ,
 देवकी थी ,
  नारी  के हर रूप के
 अविरल प्रेम का  प्रतीक , 
  गूंजता था चहुओर
 गाँव में
 ह्रदय स्पर्शी बांसरी का संगीत  !

   और थे बलराम ,
 , अर्जुन ,
   और युधिस्थर  ,
  संघर्ष के द्योतक ,
 अन्याय विनाशक

आज भी वे सब हैं ,
 उसी रूप में , 
 हर जगह ,

 कृष्ण है ,
हमारे  ह्रदय की   कोठरी  में ,
 बजाते हैं बांसुरी ,देते हैं सन्देश
 की उठो ,  पार्थ ,
यह समय मोह का नहीं ,
 कायरता का भी नहीं ,
 हुंकार का है ,
 गांडीव की टंकार का है ,
 मैं तो हूँ बस तुम्हारा सारथी ,
ओ महारथी ,
समय   तो तुम्हारे बाणों  से ,
 दुष्टों  के संहार का है , !!


शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

patni

' छद्म पुराण '   में वर्णित एक महा कथा ..,

ब्रम्हा जी ने पहले ' पुरुष '  ( नर ) बनाया ...,उसे असीम बल  सोंप दिया , शीघ्र ही ब्रम्हाजी को अपनी भूल का अहसास हुआ की इस असीम बलशाली के निरंकुश होने पर  इसका विनाश कैसे होगा ?  तब उन्होंने उससे भी ज्यादा बलशाली अस्त्र बनाया ---" ब्रम्हास्त्र " .., जिससे बचना किसी के बस में नहीं था !!
लेकिन जब ब्रम्हास्त्र से सारी  प्रकृति और जीव जंतु भी भस्म होने लगे तो उन्हें फिर अपनी भूल का अहसास हुआ ...की वस्तुतः यह अस्त्र तो " नर" - संहार के  प्रयोजन भर के लिए ही  बनाया था..इससे तो पूरी श्रष्टि के ही विनाश का डर पैदा हो गया  है !

तब उन्होंने ' नर ' पर अंकुश रखने और उसका संहार करने , उसी ब्रम्हाश्त्र का दूसरा  वर्ज़न बनाया जिसे आज हम  ' स्त्री ' के नाम से जानते हैं ! ...,
 
इस ' ब्रम्हास्त्र का कोई जबाब नहीं .., इसकी पूजा करके , इसे ' नमन ' करके ही  इससे बचा जा सकता है "

शुक्रवार, 14 जून 2013

sangeet par vaartalaap

Sabhajeet Sharma गोस्वामीजी !! आपने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है ! कोई दिन हुआ करते थे जब गाँव में साधारण लोग भी शास्त्रीय संगीत की गहन समझ रखते थे ! उन दिनों उस्तादों की महफ़िलें या तो किसी पर्व पर मंदिरों में , ( विशेषकर सावन के झूलों पर ) में होती थी या किसी रईस की बरात में विशेष गोस्ठियों में ! मुझे याद है , उन दिनों गाँव में सभी वर्गों में ना सिर्फ रागों के जानकार होते थे बल्कि वे खुद भी थोड़ा बहुत गाते भी थे ! अपने इस ६३ वर्षीय जीवन में , मेने संगीत को वर्गों में विभाजित होते देखा ! शास्त्रीय संगीत वस्तुतः सुनने की नहीं बल्कि अनुभव करने , उसमें आत्मसात होकर , जीने की चीज़ है ! इक ताल की विलंबित लय पर , जब ख्याल गायक , स्वरों का विस्तार करता है , तो वह हर बार एक नवीन सृजन ही होता है , कोई अनुकृति नहीं होती ! इन स्वरों को , जिनमे बोल कोई अहमियत नहीं रखते , कान सुनाते हैं और उसे सीधे ह्रदय पटल पर अंकित करते जाते हैं , जहाँ बाकि संसार से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता ! मेरे दादाजी ध्रुवपद के गहन जानकार थे और मृदंग के कई आदिमात्राओं ( १३.१५.१७.२१ मात्रा . आदि ) के ताल पर बंदिशें जानते थे ! वे उस समय ' लाइ लप्पा ' जैसे फ़िल्मी गीत सुनकर व्यंग से कहते थे ' यह कोई संगीत है ? जो सिर्फ तीन मिनट में ही पूर्ण हो जाता है ? " !
चार्ली चेप्लन ने मशीनी युग की जो हास्य फिल्म बनायीं थी वह आज हमपर पूरी तरह लागु है ! हमें हर जगह फास्ट फ़ूड और केप्सूल चाहिए ! ' फ़िल्मी संगीत ' में २० वीं सदी तक फिर भी कर्णप्रिय धुनें सुनने को मिलती रही , लेकिन अब अभाव है ! आज जो थोडा बहुत लगाव संगीत से लोगों का बचा है उनका कारण पुराणी धुनों का मधुर संगीत ही है ! बाकी सच कहें तो आज आस्कर विजेता ऐ आर रहमान की कितनी धुनें लोग दोबारा गुनगुनाते हैं ? शास्त्रीय संगीत से टूटकर जो रस पुरानी धुनों में बचा रह गया था वो अब समाप्ति की और है ! आगे संगीत का मतलब बचेगा ' नृत्य के लिए " -- 'लहरा ' ...!
 
 
Virendra Goswami Sabhajeet Sharma ji, क्या कहूँ,क्या लिखूं ? आपकी इन पंक्तियों ने तो मुझे स्तब्ध कर दिया. हाँ. यही शाश्वत सत्य है कि '' जब ख्याल गायक , स्वरों का विस्तार करता है , तो वह हर बार एक नवीन सृजन ही होता है , कोई अनुकृति नहीं होती." जी हाँ, प्रत्येक दफ़ा नवसृजन, नवकृति. श्रोताओं की सामूहिक उपस्थिति में ऐसा किसी अन्य विधा में नहीं देखा गया. ये संगीत ही है जो समस्त अन्य विधाओं, कलाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर साधक के साथ-साथ श्रोताओं को भी उस सर्वोच्च से एकाकार कराता है. इससे श्रेष्ठ मनोचिकित्सा अन्य कोई नहीं. सारे दुर्भाव, सारी मलीनतायें इसमें बह जाती हैं, जो शेष रहता है वो है निर्मल मन. व्यक्तिगत रूप से मैं आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूँ पर चूँकि युग बदला है, समय बदला है और हमारी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं, हर क्षण एक भागम-भाग है, यहाँ निश्चिन्त होकर सुकून से किसी अन्य विधा को समय दिया जाना संभव नहीं दिख रहा है ( यद्दपि ये स्थिति सुखद नहीं है ) इसीलिए मैंने अपनी पोस्ट में फिल्म संगीत के शास्त्रीय पक्ष को श्रवण स्तर पर उभारने का प्रयत्न किया है. तीन-साढ़े तीन मिनिट की अवधि की लघु परफोर्मेंस से परिचित होकर, किसी भी भांति यदि शास्त्रीय पक्ष की और नवीन श्रोताओं का रुझान हो सके तो अंतत: इससे शास्त्रीय संगीत का ही भला होगा. और हाँ, आपकी संगीत समझ और क्रियेशन से, मैं समय-समय पर आपकी पोस्ट्स से परिचित हुआ हूँ और आपकी योग्यता और सलाहियत का बहुत बड़ा प्रशंसक भी हूँ.
 
 
Sabhajeet Sharma गोस्वामी जी प्रश्न गूढ़ है .. किन्तु अनुत्तरित नहीं ! 'कला' मनुष्य ह्रदय के भावों की अभिव्यक्ति का साधन है ! इसके कई स्वरुप हो सकते है , जो व्यक्ति जैसे भी अपनी अभिव्यक्ति करने में सक्षम हो , वैसे इन कलाओं का प्रयोग करे ! अभिव्यक्ति व्यक्तिगत होती है , और उसे व्यक्त करने का माध्यम भी व्यक्तिगत ! संगीत , साहित्य , चित्रकला , जीवन शेली की कला , के बीज प्रायः हर मनुष्य के जेहन में समाये रहते हैं , और वह इनका अपने हिसाब से प्रयोग करता है !
किन्तु आपका प्रश्न , संगीत और साहित्य के पारस्परिक साथ और उसके संयुक्त प्रभाव को लेकर है ! साहित्य की उत्पात्ति का श्रोत्र ' विचार ' है जबकि संगीत की उत्पत्ति का श्रोत्र- ' ह्रदय -भाव " !वस्तुतः दोनों ही मस्तिस्क की ही क्रिया हैं , लेकिन संगीत में ' वातावरण ' का सर्जन होता है , जिसके लिए ' शब्दों ' की बहुत जरुरत नहीं पड़ती ! एकांत में बहते हुए 'झरने ' के स्वर , उसकी लय आपको स्पष्टतः अनुभव हो जायेगी , किसी शब्द की जरुरत नहीं , कोयल की कूक , रेल के इंजन की सीटी , ट्रेन के पहियों से निकलती लय , आपकी यात्रा को आल्हादित करती है ! कान से सुनी गयी ध्वनियों को मन सीधे आत्मसात करता है , जबकि ' आँखों ' के माध्यम से पढ़ा गया शब्द , पहले मस्तिक पटल पर जाता है ,विष्लेतितहोता है , फिर हमारी संवेदनाओं को जगाता हुआ मन तक जाता है ! साहित्य के लिए , लेखन कला , और पठन कला , का ज्ञान होना जरुरी है , जबकि संगीत के लिए ये दोनों ज्ञान जरुरी नहीं ! इसी सहजता के कारण सामान्य जन साहित्य से दूर होते गए और संगीत को सहजता से ग्राह्य करते गए ! लेकिन साहित्य इससे पिछड़ गया हो ऐसा नहीं है ! सरल भाषा में , सामान्य जन के लिए रचा गया साहित्य सदा लोगों के दिल में घर करता रहा , इसीलिए , सूर , कबीर , और तुलसीदास , अमर हो गए !
आप के प्रश्न पर यह बात बिलकुल सटीक है की संगीतमय साहित्य , व्यक्ति की भावनाओं को झिझोड़ सकता है , जबकि अलग अलग वे ऐसा करने में समर्थ नहीं ! इसीलिए सूर , कबीर , और तुलसीदास ने जो साहित्य रचनाएँ की वे गेय बनी ! संगीत में 'लय ' और ताल ' उसे मात्राओं के बंधन में बाँध कर रखते हैं , तो यही बात ग़ज़ल , पदों , और काव्य में है , जिसमें लय , और छंद बध्यता , मात्राओं के अनुशाशन को स्वीकार करके चलती हैं ! यही अनुशाशन , दोनों विधाओं को जोड़ने का 'पुल ' भी है !
फिल्म संगीत को निश्चय ही यह श्रेय जाता है की उसने इन दोनों विधाओं को जोड़कर एक अलग संसार की रचना की जो 'सामान्य ' जन को सहज स्वीकार हो गयी ! ! इसी श्रखला में हम ' जगजीत सिंह ' के योगदान को नहीं भूल सकते , जिन्होंने ग़ज़ल की दुनिया के वातावरण को संगीत के स्वरों के माध्यम से सामान्य जगत तक पहुँचाया !
लेकिन आज जो हो रहा है , वो न संगीत है न साहित्य ...! विदेशी सभ्यता में समाज में उत्पन्न हुई कुंठा के गीतों को , 'पोप ' विधा में चींख कर गाने के चलन को हमारा युवा वर्ग संगीत के रूप में स्वीकार कर रहा है ..., और कहना गलत न होगा की यह काम भी - वही फिल्म जगत के माध्यम से हो रहा है , जिसकी प्रशंशा हम मधुर संगीत के लिए करते हैं ! ऐसे में हमें जरुरत है एक और जगजीत की , जो भारतीय संगीत और काव्य को माध्यम बनाकर , संगीत की बुझती लों को फिर जगाये !

रविवार, 9 जून 2013

bhatkaan


















जीवन की संकरी गलियों में ,
 भटक ना जाऊं  कहीं अकेला .., !!

प्यार माँगना चाहा  जिससे ,
उसने सदा मुझे ठुकराया ..,
जिसने मुझसे प्यार किया कुछ ..,
उससे मैं खुद हो कतराया ..!

पता  नहीं पतझर कब आया ..,
 जहाँ कभी बसंत था खेला  ..!!

सारे  दिन अनुभव करता था ..,
 मेरे भी पीछे कोई है ..,
मेरी तरह किसी नादा की ..,
 मनचाही मंजिल खोई है .., !

'पग- ध्वनि ' खुद की ही पायी ..,
 जब  मुड  देखा संध्या की बेला ..!!

किससे क्या कुछ कहूँ अजब जब ,
 दुनिया का ही द्रष्टिकोण है ..,
 जो वाचाल उसे सब सुनलें ..,
 कौन सुने उसकी जो मौन है ..,

भाषाओं के ग्रंथों खरीदे ..,
भावों पर खर्चा ना धेला .., !!

--सभाजीत

सोमवार, 27 मई 2013

धर्म  कारोबार  है ...,
 व्यापार के लिए ,
धर्म  हथियार है ..,
'नर संहार ' के लिए ..,
धर्म पर्दा है ..,
व्यभिचार के लिए ,
धर्म जंगल  है   ,
लूटमार के लिए ..,
धर्म के कई रूप , कई रंग ..,
बहरूपिये संसार के लिए .., ,
 आओ धर धारण करें ..,
इंसानियत  के  बंटाधार के लिए ...!!
 ..,

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

लघुकथा

::: उपदेश :::

 कृष्ण ने अर्जुन को अपने केबिन में बुलाया ! श्री कृष्ण तिवारी अफसर थे जबकि अर्जुन दवे उसका मातहमत  ! अर्जुन के अन्दर घुसते ही कृष्ण ने ' सखा भाव '  से कहा -
- " बैठो  अर्जुन "
अर्जुन बैठ गया तो कृष्ण  ने पूछा  - 
- " कैसी तबियत है अब तुम्हारी वाइफ़ की ..?? "
- " ठीक है सर !! ... नरम गरम तो चलती ही रहती है ..! " 
- " भाई तुम भी अजीब आदमी हो ...! , घर की , बाल बच्चों की और कोई ध्यान नहीं देते ..!! "
- " क्या करूँ सर ..!! डिपार्ट मेंटल   वर्क से ही फुर्सत नहीं मिल पाती ..,!"
 कृष्ण मुस्कराए ..!!  फिर ' दार्शनिक भाव ' में  अर्जुन  पर नज़रें गडा दी ! -
- " घर में किसी को कुछ हो गया  तो क्या दे देगा  तुम्हें डिपार्टमेंट ..?? ... अरे पहले  घर देखो  ... यह सरकारी काम काज तो चलता ही रहेगा ..! "
 _ " यस सर ..!! " ... अर्जुन को लगा जैसे उसके घाव पर कोई मरहम लगा रहा हो  !
कृष्ण ने दराज खोली ,  सौ रुपयों की एक गड्डी तोड़ कर  उसमें से दस नोट तोड़  कर अलग किये  .. फिर एक लिफाफे में डाल कर , अर्जुन की और उछाल दिए !
- "  " मेहता ' दे गया था ..! ..., तुम्हारा जायज हक़ है इस पर ..! ... उसकी फ़ाइल है तुम्हारे सेक्शन में ... आज ही नोटशीट बना लाओ तो अप्रूव कर दूँ ! .."
 अर्जुन ने  लिफाफा उठा कर मोड़ा  और  चुपचाप जेब में डालते हुए कहा  -  " जी  सर .." !
 कृष्ण बोले - " और अपने परिवार का ध्यान रखा करो ..! ... आखिर कमाते किसके लिए हो ..?? ...उन्ही के लिए ना ..!! .... मेहता कह रहा था की तुम ' संकोची '  हो ...उससे कुछ लेते ही नहीं .......ऐसी बात है तो  मुझसे ले लिया करो   ... आखिर इस महगाई में कैसे चलेगा तुम्हारा ..?? "
- " जी सर " -- अर्जुन का स्वर भक्ति भाव में धीमा हो गया ! वह उठने लगा तो कृष्ण बोले -
_ " आजकल कोई किसी का सगा नहीं  अर्जुन ! वक्त पर कोई काम नहीं आता ..., ना मित्र ना रिश्तेदार ..!!   काम आती है तो ' विष्णु - प्रिया ' ..यह लक्ष्मी ...,  बेवकूफी में जिससे तुम परहेज करते रहते हो  ..!! "
 अर्जुन उठ कर हाथ बाँध कर खड़ा हो गया !
- और हाँ ... .. फाइलें तो बनती ही ' निबटने ' के लिए हैं ..., तुम नहीं निबटाते  तो मेहता किसी और बाबू से निबतवा  लेता  ! .. यह  सरकारी ' माया ' है ...और  याद रखो तुम   एक  किरदार ..!! "
- जी सर "  ... अर्जुन की आँखें मूंद गयीं !
- "जाओ अब  नोटशीट बना कर जल्दी ले आओ ..!! "

 अर्जुन बाहर निकला तो उसका चेहरा चमक रहा था  कृष्ण ने उसे ' तत्व- ज्ञान ' दे दिया था १ , वह अपनी ' सीट ' पर आरूढ़ हो .. , ' गांडीव ' की तरह ..' पेन ' हाथ में धारण कर ... नोट शीट पर ' शब्दों ' के बाणों की वर्षा करने लगा !


-सभाजीत

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

 लघु कथा :

::  लकी :: 

 दोनों दोस्त चाय के ढाबे पर बैठे थे  !  रफीक  साइकिल के पंक्चर बनाता था  और मंजीत डबल रोटी बेचने का काम ! 
- " कैसे फंस गयी वो यार तुमसे ..? " - रफीक ने मंजीत से उसकी मुहब्बत का राज़  पूछा ! 
- " बस योंही .. धीरे धीरे .., " 
 - " धीरे धीरे ..?? ... क्या तू बचपन से जनता था उसे ..? " 
- " अरे नहीं यार ... वो मुलाक़ात  तो अभी एक महीने पहले ही हुई थी ...दिनेश की वजह से " .., 
- " कैसे .." 
 - " वो पहले  दिनेश से उसका कुछ चल रहा था ..! दिनेश ने मुझे कहा  की डबल रोटी देते वक्त मेरा सन्देश कह दिया कर .." 
-" फिर ..?"  
- " फिर वो मुझसे पूछने लगी ..., बात करने लगी .., मैं भी सुबह शाम उस मोहल्ले में जाने लगा . वह दोनों टाइम मेरी पुकार सुन कर बाहर आने लगी ..!.. एक  बार डबल रोटी  पर मैं उसे लिख कर दे  दिया  -  " आई लव यु "   और बदले में उसने मुझे पांच रुपये के नोट पर लिख दिया .." इलू - इलू " ..!! 
_  "  वाह ..!!  तुन्हारे अन्दर क्या भा गया उसको ..? " 
- " उसने कहा  मेरा " हेयर कट " उसे पसंद है ... बिलकुल " सलमान " दिखता हूँ ,," 

 रफीक ने गहरी सांस छोड़ी   ! फिर मनजीत से   बोला --
 _ " '  बहुत  लकी ' है यार तू ..!  तेरा धंधा भी अच्छा है ! " 
मंजीत हंसा ..!बोंला -- "    तुझे  नहीं मिली अब तक कोई ..?? " 
 रफीक बोला - " मेरी दूकान तो लड़कों  के स्कुल के सामने है ! लड़के  आते हैं   - तो साइकिल मुफ्त बनवा   कर  उलटे  लड़ कर जाते हैं !  दिन भर हवा भरते ही बीत जाती है ! महीनो सेलून  नहीं जा पाता - मुहबात कैसे हो ..? 



- सभाजीत 
 





लघु कथा - 
 " ज़माना "

- वे बड़ी देर से पहले साहब के गेट , और फिर कारीडोर , में , साहब के बंगले से निकलने का इंतज़ार करते रहे ! एक दुसरे व्यक्ति , जो बाद में चमचमाती कार से आये , वो भी साहब का बाहर निकलने का इंतज़ार कर रहे थे ! थोड़ी देर बाद आखिर चपरासी ने दरवाजे से पर्दा हटाया और एक अधेड़ , रुआब दार अफसर के दर्शन हुए ! बाहर निकल कर वे पहले मुरलीधर की और मुखातिब हुए और प्रश् वाचक निगाह उन पर डाली - ,
" मैं ....मुरलीधर पाठक ..! ...मुझे मनोज जी ने भेजा था आपके पास ..! "
" अच्छा जी कहिये ..! " अफसर का स्वर उभरा ! .
" वो मेरे बच्चे के सिलेक्शन का मामला था ! उन्होंने यह पत्र भी दिया है ..." ! कहते हुए मुरलीधर जी ने एक पत्र अफसर को थमा दिया !

" अच्छा अच्छा ..." -अफसर ने पत्र हाथ में थाम लिया !

" देखिये ...!! " - मुरली धर जी की आवाज़ थोड़ी कांपने लगी - " मेरा बेटा वैसे मेरिट में है ! यूनिवर्सिटी टाप की थी उसने !...मैं यह सिफारशी पत्र ना लिखवाता ,लेकिन मनोज जी मेरे पुराने ज़माने के मित्र हैं - वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं .., उन्होंने कहा की थोड़ी शिफारिश हो तो कोई बुरी बात नहीं ! ..कह रहे थे की आपके बड़े भाई को नोकरी उन्होंने ही दिलवाई थी -- शिफारश पर ..., "

" हाँ हाँ ...मैं जानता हूँ मनोज जी को ..." ..अफसर का स्वर ' शुष्क ' हो चला था ! ...वह दुसरे व्यक्ति की और मुड़ गया !

--" जी मैं मायाराम अग्रवाल हूँ .., " दूसरा व्यक्ति स्वर में मिठास घोलते हुए बोला---" घंटाघर चौक पर सराफे की दूकान है मेरी ! ..."

- कहिये क्या काम है आपको ..? " -- अफसर के स्वर में फिर गुरुता आ गयी !

- " कोई ख़ास नहीं ..., बस दर्शन के लिए चला आया ..., ये कु छ नमूने हैं , मेडम देख लेंगी तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी ..! " -- कहते हुए मायाराम ने एक भरी लिफाफा अफसर को थमा दिया !

- " अच्छा..! अच्छा ..! ... अफसर के स्वर में भी मिठास आगई !

- और सर ... उस लड़के का नाम लिफाफे पर ही लिखा है , जिस के लिए आज आपसे महा पौर जी ने बात की थी ! " -- मायाराम ने करफुसफुसाकर कहा ..! और फिर झुक कर नमस्कार करके चला गया !

अफसर ने लिफाफे को चिट्ठी पर रख लिया ! फिर मुरलीधर की और मुड़ कर बोला -

- .." मनोज जी को मेरा प्रणाम कहियेगा ! देखिये ,,,! अब वो ज़माना नहीं रहा बहुत बदल गया है ! ... देश बहुत आगे बढ़ गया है .., बहुत तरक्की हो गयी है ! सब जगह हाई टेक है .. कंप्यूटर का ज़माना है .., , शिफारिशें नहीं चलती ! .. कोशिश करूंगा लेकिन कोई वायदा नहीं कर सकता >>! " --कह कर अफसर तेजी से मुडा और पर्दा उठा कर फिर बंगले में घुस गया ! 
-  सभाजीत

,

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

" लाइफ आफ्टर डैथ "



( मरणोपरांत जीवन )



'लाइफ आफ्टर डैथ ' एक रहष्यमय विषय है वर्षों से लोगों के लिए एक कोतुहल रह़ा है कि , मृत्यु के बाद क्या होता है ? हम कहाँ जाते है , क्या करते है , और क्या मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है ?



इस विषय पर पश्चिमी समाज में कई तर्क , कथाएँ प्रचिलित है रहस्यवादी शोधकर्ताओं ने ऐसे कई लोगों के इंटरव्यू लिए - जो कुछ समय के लिए मृत घोषित किये जा चुके थे करीब करीब सभी तथाकथित मृतकों का अनुभव एक जैसा ही सामने आया -एक लम्बी सुरंग की यात्रा , एक प्रकाश पुंज से साक्षात्कार , और फिर लाख टके का एक प्रश्न - " क्या तुमने अपने सभी काम पूर्ण कर लिए है - क्या तुम संतुष्ट हो ?" उत्तर अगर 'हाँ ' में हुआ तो निश्चित मृत्यु और अगर ' ना ' में हुआ तो पृथ्वी पर वापसी



भारत में हिन्दू धर्म में एक पूरा पुराण ही " लाइफ आफ्टर डैथ " के लिए लिख दिया गया है । प्रत्येक घर में - " गरुण " पुराण के रूप में , किसी मृत्यु के वाद इसका वाचन किया जाता है । पंडितों के अनुसार , पुनर्जन्म से बचने के लिए ' मोक्ष ' की कल्पना की गई है -और मोक्ष पाने के लए विधि -विधानों की । किसी मृत्यु के बाद यदि मृतक का कर्म नहीं हुआ , पिंड दान नहीं हुआ , 'प्रयाग' - 'गया' जाकर श्राद्ध नहीं किया गया , ब्राम्हणों को भर पेट भोजन नहीं दिया गया , तो मृतक मृयु क्र पश्चात भी इसी लोक में रहेगा -" भूत योनी " में । मरणोपरांत कोई भी नहीं चाहता की उसके परिजन भूत योनी का जीवन जियें , इसलिए सभी , अपनी हेसियत से बढ़ चढ़ कर इन कर्म कांडों को करते है ।





आर्य समाज के प्रवर्तक , स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक - " सत्यार्थ प्रकाश " इस विषय पर व्यापक चर्चा की है - जो सनातनी धर्मावलम्बियों को मंजूर नहीं है । मेरी पत्नीk घोर सनातनी है - वह इश्वर के कई स्वरूपों में विश्वास करती है - हर देवालय में माथा टेकती है - वर्ष के प्रत्येक तीज त्यौहार - बिना भूले चूके- कलेंडर देख कर मुहूर्त के अनुसार मनाती है । दिन भर वृत रहकर , शाम को विशेष व्यंजन -" फलाहारी " बना कर खाती है , जिसे खाने में मेरी भी रूचि रहती है । विवाह बेदी पार सात फेरे लेते समय मेने कुछ कसमें खाई थी जिनमें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की एक कसम भी शामिल थी । यह कसम गाहे बगाहे में पूरी करता रहता हूँ - उनके साथ - " कथा कीर्तन , धर्म व्याख्यानों में भाग लेकर ।
लिहाजा एक धार्मिक व्याख्यान माला में उनके साथ में भी गया । आयोजकों ने विशाल मंडप तैयार किया था । मंच फूलों से सजा था । स्त्री और पुरुष वर्गों के अलग अलग बैठने की व्यवस्था थी - ताकि धर्म के बीच स्त्री पुरुषों के बीच का प्रेम सिर ना उठा ले । मंच पर व्यास गद्दी थी और व्यास गद्दी पर , क्लीन शेव्ड , रेशमी भगवा वस्त्र धारी ,ललाट पर त्रिपुंड लगाए, गले में रुद्राक्ष धारण किये , उँगलियों में कई करामाती पथ्थरों की अंगूठियाँ पहने , गोर वरनी पुरुष विराज मान था । मंच के बाएँ और आर्केस्ट्रा था , जिसमें बांसुरी प्रमुख थी । ' संगीत, प्रकाश , और दवानी का अद्भुत करिश्मा व्याख्यान में घुल मिल गया , जिसे सुन कर सभी रस विभोर हो गए ।
कथा सुन कर जब वापिस घर आया तो मन बोझिल हो उठा मेने सोचा - मेने तो कुछ भी नहीं किया है - इह लोक और परलोक सुधारने के लिए मृत्यु के बाद चौरासी लाख योनियाँ मुंह बाए मेरा इंतज़ार कर रही है " कूकर - शूकर , जलचर- नभचर , कीट- पतंग , सभी तो बनना पडेगा फिर इन जन्मों के बीच एक टाइम स्लाट और भोगना पडेगा - " भूत - योनी " का - पीपल पर लटक कर , इस बात का इंतज़ार करना होगा की कब मेरे पुत्र गया जाकर मुझे मोक्ष दिलाएं मुझे अपने पुत्रों पर विश्वास नहीं है वे बहुत ही आलसी और काम टालू प्रवत्ति के है
भरी मन से चुपचाप आँखें बंद कर के मैं लेट गया सोया ही था की अचानक एक बजे मेरी नींद खुल गयी घबरा कर उठ बैठा तो देखा कि एक व्यक्ति मेरे पलंग के पास , कुर्सी पर बैठा मुझे ताक रहा है मेरी पूरी तंद्रा भंग हो गयी उस आदमी को अपने शयन कक्ष में पाकर , मेने डरते हुए पूछा -
" भाई साहब !! आप कौन है और मेरे शयन कक्ष में इतनी रात में कैसे घुस आये ? "
जबाब में वह मुस्कराने लगा
मेने सोचा - जरुर ही यह चोर है पूरी गेंग होगी इसके बाकी साथी मेरे परिवार के अन्य कमरों में माल असबाब कि तलाशी कर रहे होंगे और यह मेरे ऊपर पहरेदारी करने के लिए बैठाया गया होगा मेने हिम्मत बाँध कर फिर पूछा -
" भैया !! कृपया मेरे सवाल का जबाब दें आप अन्दर मेरे कमरे में कैसे प्रवेश किये ?"
वह व्यक्ति गंभीर हो उठा मुझे ताकने लगा फिर धीरे से गहन आवाज़ में बोला -
" हम कहीं भी -जा सकते है हमारे ऊपर कोई बंधन नहीं है "
" भला कैसे ? बिना मेरी परमिशन के आप मेरे निजी शयन कक्ष में कैसे कर बैठ सकते है यह क़ानून विरुध्ध है "
उसने फिर मुझे ताका और ठंडी आवाज़ में बोला-
" क्यौकि हम 'हवा ' है हम 'मरे' हुए व्यक्ति है "
" मरे हुए ?? - यानी भूत ?? " - में सिहर उठा तो पुराण सही कहते है प्रमाण स्वरूप एक भूत मेरे कमरे में उपस्थित था मेने पूछा-
" भूत ?? तो आप भूत है ? "
जबाब में वह चुपचाप मेरी और एक टक देखता रहा फिर बोला -
" भूत तो जो व्यतीत हो गया वह 'समय' है , हम भूत नहीं "
"नहीं ? तो फिर क्या है ?"
" आत्मा !! सिर्फ आत्मा !! इश्वर का एक अविनाशी अंग !!"
" क्या आपका मोक्ष नहीं हुआ ?"क्या आपके पुत्रों ने आपका तर्पण , मोक्ष नहीं करवाया ? "
इस बार वह थोड़ा मुस्कराया फिर बोला -
" हमें मोक्ष कि आकांक्षा नहीं "
" मोक्ष की आकाक्षा नहीं - भला क्यों ? "
" क्योंकि हम मरणोपरांत जीवन जीने में विश्वाश करते है , हम मरणोपरांत जीवन जीने वाले लोग है "
" अजीब बात है !! आप जीवित रहते हुए भोग विलास से तृप्त नहीं हुए , जो मृत्यु उपरान्त भी जीवन चाहते है ? "
" भोग-विलास तो शरीर करता है आत्मा नहीं "
" यदि भोग - विलास नहीं चाहिए तो आप जीवन क्यों चाहते है ? "
" इसलिए की हम जीवित रहेंगे तो समाज भी जीवित रहेगा "
कैसी अजीब आत्मा है - मेने सोचा धर्म व्याख्यानों में तो मृतक के नाम पर कई कर्म कांडों और अच्छे भोजन की बात कही जाती है मृतक का दायित्व परिजनों तक सीमित रहता है और यह है कि मरने के बाद भी ' समाज ' के लिए बात किये जा रहा है मेने सोचा- बड़े काम की आत्मा है क्यों ना इससे मृत्यु उपरान्त जीवन का रहस्य पूछ लू। मेने पूछा -
" महोदय !! क्या मृत्यु उपरान्त भी जीवन होता है ? "
" जरुर !!- हम तो उसे जी ही रहें है "
" " क्या आप स्वेक्षा से उसे जी रहे है ? "
वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर उदास भाव से बोला -
" आप उसे स्वेक्षा या मज़बूरी कुछ भी कह सकते है "
" यदि मज़बूरी हो तो वह क्या हो सकती है ? " - मेने अब उससे चुटकी लेना शुरू कर दिया ।
"मृत्यु के उपरान्त भी हमारे ' नाम ' अभी संसार में जीवित है , लोग हमें याद रखे है । जब तक नाम जीवित है हम मर ही नहीं सकते ।
मृत्यु उपरान्त जीवन के रहस्य की कुछ परतें मेरे समक्ष खुलने लगी । मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी ।
" महोदय !! क्या में आपका वह नाम जान सकता हूँ जिसके कारण आप अभी भी संसार में विद्यमान है ? "
" नाम ?? कुछ भी कह सकते हो हमें क्योंकि हम नाम से ज्यादा , अपने काम के कारण जीवित है यह बात और है की यह पार्थिव दुनिया हमें अब सिर्फ नाम से ही जानती है ।" " मान लो की मैं 'शेलेन्द्र ' हूँ ! गीतकार शैलेन्द्र ! मेने कई गीत लिखे , लोग अभी भी गुनगुनाते है । मुझे याद करते है । इसलिए मेरा नाम मर नहीं रहा है । "
यह एक कड़वा सत्य था । शैलेन्द्र के गीत अमर थे । उन्होंने फ़िल्मी गीतों में साहित्यिक उपमाओं का सहज प्रयोग किया था । पहले एच , एम् वी, वालों ने अपने व्यवसाय हित में रिकार्ड बना कर , उन्हें बेच कर , गीतकार का नाम जीवित बनाए रखा , अब वे ही गीत यु ट्यूब पर फिर से चहक रहे थे । लोग भी उन गीतों को अभी भी गा रहे थे , भूल ही नहीं पा रहे थे ।
" आप से यह पाप कैसे हो गया महानुभाव ? लोग तो आज कुछ भी उलटा सीधा लिख देते है । धड़ल्ले से बिक जाता है - लोगों को यह याद भी नहीं रहता की गीतकार कौन है उसका नाम क्या है । "
" हम तो आदतन अच्छा लिखते रहे , चाहते तो भी सस्ता नहीं लिख सकते थे । फिर एसा पाप करने वाले तो बहुत लोग है । "
" यानी बहुत सी आत्माएं है जो अभी भी जीवित है ? "
" हाँ !! मिलना चाहोगे और लोगों से ? "
" लेखकों में भी हैं कोई ?"
" सभी वर्गों में है । जो मृत्यु उपरान्त जीवन जी रहे है , लेखकों में बहुत है । किससे बात करना चाहोगे ?- " शरत चन्द्र जी से करोगे ? '
" शरत चन्द्र ?? ' यानि बंगाल के प्रसिध्ध लेखक - । " क्या वे भी मरणोपरांत जीवित होंगे ? "
" क्यों ना होंगे ? उनका भी तो समाज से सरोकार रहा । सभी रचनाएं मर्मस्पर्शी , सभी कथाएं समाज के लिए । "
" एक बात बताएं "- मेने हिचकिचाते हुए पूछा - ' मरणोपरांत आप कहाँ निवास कर रहे है ? क्या पीपल पर - जैसा की पुरानो में कहा गया है ? "
" पीपल पर ??- " वह हंसा - " हम भला वहां क्यों निवास करेंगे ?? हम तो विभिन्न कई जगहों पर बस रहे है ."
" जैसे ?? "
" जैसे में गीतों में , शरत चन्द्र साहित्य में , गांधी भारतीय मानस में , विवेकानंद ज्ञान में , मुकेश गायकों में , राज कपूर अभिनय में ....."
" लम्बी फेहरिस्त है । मेने मन में सोचा । लकिन फिर एक प्रश्न मन में उठा -ये आज मुझसे मिलने मेरे शयन कक्ष में क्यों आये इन्हें मुझसे क्या सरोकार है ? प्रकट में पूछा -
" में बहुत कुछ जान गया हूँ । किन्तु एक बात नहीं समझ पाया । "
" क्या ? "
" यही की आप आज यहाँ मेरे शयन कक्ष में कैसे आये ? "
वे गंभीर हो गए । फिर धीरे से बोले -
" कुछ नहीं सिर्फ तुमसे मुलाक़ात करनी थी । "
" मुलाक़ात !! मुझसे ?? भला क्यों ? "
" क्योंकि देर सबेर तुम भी हमारे साथी बनोगे । हमारे साथ रहोगे । "
" आपके साथ क्यों ? मुझे मोक्ष नहीं मिलेगा क्या ? "
" मोक्ष तो होता ही नहीं । "
" मोक्ष नहीं होता ? पुराण , पंडित , कर्मकांडी कह रहे है की मोक्ष होता है ।"
" वे अपनी क्षुधा से मोक्ष पाने के लिए यह व्यवस्था बनाएं है , वरना मोक्ष तो होता नहीं । "
" तो क्या सभी जीवों को मृत्यु के पश्चात इस योनी , यानि आत्मा योनी में विचरना पड़ता है ? "
" नहीं "
" नहीं ?? " - " तो फिर हम आप ही क्यों विचरेंगे इस योनी में ? '
" क्योंकि हमें समाज की चिंता है ।"
" और जो समाज की चिंता नहीं करते ?'
" उनके लिए " चौरासी लाख योनी " का क्रम है ही । ' कीट-पतंग', शूकर - कूकर, जलचर- नभचर , ...."
में पेशोपेश में पड़ गया । मेने सोचा , इन्ही से पूछ लूँ , की मैं क्या करूँ ।
" मुझे बतलाएं की मैं क्या करूँ ? "
" यदि कीट- पतंग , शूकर कूकर बनना पसंद हो तो वही करो , जैसा दुनिया कहती है - " हल्का- फुल्का , मनोरंजक , विषयों पर विचार विनमय करो , लिखो । चौरासी लाख योनियों की यात्रा करो , भोग करो , जनन करो , बार बार मरो । "
" और यदि कीट पतंग नहीं बनना हो तो ? "
" तो अपना नाम जीवित रखो । मरणोपरांत जब तक तुम्हारा नाम जीवित रहेगा तुम भी रहोगे - हमारी तरह समाज के लिए साहित्य में समाये रहोगे सदा के लिए । "
एक और कुवां था तो दूसरी और खाई । कुँए से तो बाहर निकला जा सकता था , किसी प्यासे के द्वारा लटकाए गए घट को पकड़ कर बाहर आया जा सकता है , लकिन खाई से ? वह तो निगल ही जायेगी । मेने देखा वह व्यक्ति धीरे धीरे धुवां हो रहा था । मेने उससे कहा -
" एक आखरी बात ! मरणोपरांत जीवन का क्या यही अर्थ है । "
" हाँ , बिलकुल यही !! और कुछ भी नहीं । " - उसने ओझल होते हुए कहा ।
में बड बढाने लगा - में ' आत्मा योनी में रह लूंगा किन्तु लिखूंगा तो सिर्फ सामाजिक सरोकार के लिए । में किसी भी हालत में कीट पतंग नहीं बनना चाहूँगा ।"
तभी किसी ने मुझे झाझ्कोरना शुरू किया । उठ कर देखा तो पाया की पत्नी मुझे उठा रही है - " क्या बडबडा रहे हो ? उठो दिन निकल आया है - आज आवला नवमी है पंडित जी ने बत्ताया है की आज के दिन मुहूर्त पर पूजा करने पर सीधे मोक्ष मिलता है , मुझे मंदिर जाना है , चलो कार ड्राइव करो ।"
__________ सभाजीत शर्मा ' सौरभ'