सोमवार, 17 सितंबर 2012

raamleelaa

( नेपथ्य  गीत ...,)

" रघुपति राघव राजा राम ,,
पतिति पावन  सीता राम "

            ---आजादी के कर्णधार , देश के परम प्रिय , रास्ट्रपिता , महात्मा  गांधी ने , जब यह भजन गाया था , तब देश अंग्रेजों की गुलामी के १५० वर्ष भोग चुका था ! १८५७ की भग्न क्रान्ति , देशवासियों को असफलता के गहरे दंश दे गयी थी ! आम भारतीय , राजे रजवाड़े , अंग्रेजों के दमन चक्र से आक्रांत हो चुके थे और तब हर भारतीय के मन  में जो आशा और आदर्श की एकमात्र  लो  टिमटिमा रही  थी - वह थे - " राम " ! वे राम जिन्होंने हर विपरीत स्थिति का सामना द्रढ़ता से किया , जिन्होंने मानव जीवन के  विविध संबंधों को नए आयाम दिए ,  वे राम जिन्होंने हाथ उठा कर प्रतिज्ञा की की वे हर हाल में , उन असुरों का बध करेंगे , जो मानव संस्कृति के दुश्मन  हैं !
                   इश्वर के न्याय में आस्था रखने वाला , भारतीय समाज , देश के कोने कोने ,   हर कसबे , , हर गाँव , ,  में  राम की उस मूर्ति को तलाशने लगा , जिसने एक ऐसे आदर्श राज्य के स्वरुप को , भारतीय जनमानस में स्थापित किया था , जहां ना कोई दरिद्र था , ना रोगी , ना अधर्मी , और ना  किसी के द्वारा प्रताड़ित - किसी विपदा का शिकार ! ' देहिक देविक भोतिक तापा - राम राज्य काहू नहीं व्यापा ..., की कल्पना को साकार करने के लिए , लोगों ने  गोस्वामी तुलसी दास जी के ग्रन्थ - रामचरित मानस को अपना मुख्य ग्रन्थ मान कर , घर - घर में स्थापित किया  और राम से  करवद्ध यह प्रार्थना की की वे स्वयं उनके  के बीच आ कर  , भारतीय गृहस्थों , परिवारों , ग्रामों -  नगरों , में बसे   समाज को प्रेम और कर्तव्य भावना से ओतप्रोत करके , एक संस्कारित समाज की स्थापना करदें  , जिससे भारतीय समाज एक जुट होकर आसुरी प्रवत्तियों , संस्कारों से लोहा ले सकें  !
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                सदियाँ गवाह रही है की , कोई भी विदेशी आक्रान्ता , भारतीय समाज की सहिष्णुता , सत्य प्रेम  , भाईचारे , और संतोषी जीवन शेली के गुणों के आगे , अपनी विदेशी संस्कृति के बीज रोपने में , आसानी से सफल नहीं हो सका  ! ऐसी स्थिति में , चतुर अंगरेजी कोम  ने १८ वीं सदी में , अंगरेजी संस्कृति को शिक्षा के माध्यम से  , भारतीय लोगों के दैनिक जीवन  में उतारने  का प्रयत्न शुरू किया , ताकि वे निर्बाध ब्रिटिश शाशन के लिए , ऐसा भारतीय समाज तैयार कर सकें , जिसमें अंगरेजी भाषा प्रेम  , अंगरेजी  संस्कृति के हिमायती , अंगरेजी रंग में रंगे , भारतीय समुदाय पैदा हो सकें , और जो भारतीयों को  पश्चिमी सभ्यता का दास बनाने में उन्हें सहायता कर सकें  ! अंग्रेजों की यह नीति काम कर गयी ..., और आधुनिकता के नाम पर , तेजी से भारतीय युवा , आंग्ल परिधान , आंग्ल खान पान , और आंग्ल विचारधारा  की और आकर्षित होने लगे !

                १८ वीं  और १९ वीं सदी के संधिकाल का  युग ऐसा ही युग था जिसमें भारत का  धनाड्य युवा वर्ग  , राजा रजवाड़ों की नयी पीढी , शिक्षा के नाम पर , विदेशी पढ़ाई करके , देश में एक नई विदेशी संस्कृति के बीज  बो रही थी , जिसमें अंगरेजी रीतियाँ , अंगरेजी खानपान , अंगरेजी संस्कृति का अनुसरण करना  गर्व का विषय हो गया था ! अंग्रजों ने इस नई देशी विलायती कोम के लोगों को , अपने शाशन में बड़े बड़े ओहदे देने शुरू किये , उन्हें पदवियां और रुतबे  बांटे , ताकि  अधिक से अधिक भारतीय , इस चकाचोंध से प्रभावित होकर , भारत में विदेशी संस्कृति के पुरोधा बन जाएँ !

                लेकिन दूसरी और , इस योजना को भांप कर , भारतीय जन मानस भी अपनी संस्कृति के रक्षार्थ सतर्क होने लगा ! अपनी अस्मिता पर आक्रमण होते देख , भारतीय समाज अन्दर ही अन्दर एक जुट होने लगा , और इस सांस्कृतिक घुसपेठ के विरुद्ध ऐसे मार्ग तलाशने लगा  , जो भारतीय युवाओं को , उनके धर्म , दर्शन , संस्कृति ,  रीत  रिवाज़ से अलग ना होने दे ! घोर अन्धकार में , उन्हें एक ही प्रकाशवान  मूर्ति नज़र आई ..., और वे थे जन जन के नायक - " राम " ! भ्रमित हो रहे भारतीय समाज को , अपनी संस्कृति से एकाकार करने के लिए , तत्कालीन भारतीय समाज ने - " राम कथाओं " को नाट्य माध्यम से , जन जन तक फैलाने का संकल्प लिया  और प्रारंभ हुई  गाँव गाँव में  ' राम लीला " नाट्य मंडलों की दूरगामी यात्राएँ !

                   मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में , छतरपुर जिले की वर्तमान तहसील के रूप में बसा . एक स्थान - " नोगाव "  , सांस्कृतिक उथल  पुथल की  इन दो सदियों का एक जीता जागता  महत्वपूर्ण गवाह रहा ! इस नगर की स्थापना अंग्रेजों द्वारा  सन  १८४३ में तब की गयी , जब बुंदेलखंड के दुरूह - प्रस्तर प्रांत में स्थापित , पन्ना  , छतरपुर , ओरछा , झांसी रियासतों पर उन्हें सैन्य कंट्रोल करना  मुश्किल प्रतीत होने लगा ! इन बड़ी रियासतों के सान्निध्य में आकर क्षेत्र की कई अन्य छोटी रियासतें भी बगावत के रंग में रंगने लगी थी , ऐसी स्थिति में एक बड़ी सैन्य छावनी के रूप में  - नोगाव  - अंगरेजी संस्कृति और अंगरेजी सैन्य शक्ति के  गढ़  के  रूप में उभरा  !
                     अपनी सैन्य छावनी के  रूप में अंग्रेजों ने इस नगर की संरचना  बड़े मनोयोग से की ! ४८ वर्ग किलोमीटर  के  क्षेत्र में फैले , इस सैन्य क्षेत्र में उन्होंने ४० किलोमीटर  लम्बाई की सड़कें  इस तरह फैलाई की प्रत्येक आधे  किलोमीटर पर एक चौराहा , दिशा चयन के लिए उपलब्ध हो जाये ! १३२ चौराहों से सज्जित , इस छावनी का एक भाग , साफ़ सुथरा  नगरीय क्षेत्र  बना , जहाँ चर्च , बाज़ार , सामान्य जनता , के घर बसाये गए ! सैन्य बेरक , सैन्य अधिकारीयों के बंगले  , अंगरेजी  पलटन की ट्रेनिंग और कवायद  के लिए अलग क्षेत्र  रखा गया जिसे आज लोग  एम् इ एस के नाम से पुकारते  है ! हवाई पट्टी, की व्यवस्था  के साथ यहाँ ३६ रियासतों पर द्रष्टि रखने के लिए , एक ब्रिटिश  पालिटिकल एजेंट  रखा गया  जिसके कार्यालय में  प्रत्येक रियासत के राजा आकर अपनी हजारी बजाते थे ! अंग्रेजों द्वारा बसाई  गयी यह छावनी न सिर्फ अंगरेजी हुकूमत का गढ़ थी बल्कि , अपरोक्ष में रजवाड़ों को  अंगरेजी संस्कृति की चकाचोंध में ढालने का एक केंद्र  थी !
                   इसी नोगाव कस्बे  में कानपुर से  सन १८९० में , एक सम्रद्ध खत्री परिवार , अपने व्यवसाय की चतुर्मुखी कल्पनाएँ लेकर,  आकर बसा ,  जो ' महरोत्रा ' परिवार के नाम से जाना गया ! इस परिवार के प्रथम व्यक्ति  श्री गोविन्द प्रसाद  जी महरोत्रा ने नोगाव में एक व्यावसायिक  फर्म की स्थापना की , जिसके तहत , घोड़ा  गाडी के ठेके , रेलवे आउट एजेंसी  , ब्रिटिश कंपनी को राशन सप्लाई का कार्य शुरू किया ! एक भव्य रहवासी बिल्डिंग का निर्माण , नगर के प्रमुख मार्ग के   प्रमुख चोक पर हुआ , जिसे नगर वासियों ने " कोठी " के नाम से उच्चारित किया !

>>>> इंटरव्यू ....(  श्री विनोद मेहरोत्रा का ..., उनके   पूर्वजो  और व्यवसाय  के  बारे में उनके द्वारा  संछिप्त विवरण )

                     श्री गोविन्द प्रसाद जी के छः पुत्र रत्नों में से ,  श्री बलभद्रदास जी ने प्रथम  यह महसूस किया की नोगाव अंगरेजी रियासत  बनती जा रही है जहाँ अंगरेजी संसकृति  अपना प्रभाव  ,  समाज पर शने:   शने:  जमा रही है ! इसके  प्रतिकार स्वरुप उन्होंने अपने पूज्य पिता  गोविन्द दास जी के  हाथों , नोगाव में सन १९०६ में रामलीला मंचन की नीव  खुद आग्रह करके डलवाई !  नोगाव जन मानस में  सभी सामाजिक कार्यों के अगुवा , और  धर्म ध्वजा के ध्वजारोही के रूप में ' बल्ली बाबू '  यानी बलभद्र दास जी ने  जो ज्योति जगाई वह  प्रकाशित होकर आज १०८ वर्षों तक  निरंतर जल रही है !

>>>>> इंटरव्यू   श्री विनोद महरोत्रा  ( श्री बल्ली बाबू के जीवन काल , उनके कार्यों , और रामलीला प्रेम के  बारेमें ..., उनका रामलीला में सक्रीय योगदान के बारे में संछिप्त विवरण  )

                   यूँ  तो ' रामलीला '  लोक नाट्य के रूप में १६ वी  शताब्दी से ही जन - मन के बीच आ चुकी थी  किन्तु उसमे द्रश्य परिवर्तन और द्रश्य संयोजन  की कला  समाहित ना होने से , वह सीमित दर्शकों के बीच ही अपना स्थान बना पाई !....' लोक नाट्य' - मात्र कुछ गिने चुने दो  तीन कलाकारों द्वारा ही मंदिर परिसरों , नगर के खुले चबूतरो  पर प्रस्तुत किया जाता था  , जिसमे नाट्य सामग्री  भी  मात्र सांकेतिक रूपों में  ही  व्यक्त की जाती थी ! इन नाट्य परम्पराओं में भाव  भंगिमा का स्थान ज्यादा था  और सूत्रधार  स्वयं मुख्य पात्र होता था ! किन्तु यूरोपियन  नाट्य शेली के  भारत में प्रवेश करते ही , भारतीय नाट्य विधा अधिक  रंग धर्मी , और चित्ताकर्षक  हो गयी !  नोगाव रामलीला के जनक वल्ली भैया ने - अपनी रामलीला को अधिक प्रभावी  और चित्ताकर्षक बनाने के लिए , पार्सियन थियेटर  की तकनीक और मंच सज्जा   को अपनाने का  मार्ग , एक प्रयोग धर्मी  युवा भारतीय की तरह चुना !  लेकिन ' राम कथा ' के मूल स्वरुप ,  उसके भक्ति भाव , उसके  चिंतन , और आस्था  के साथ कोई समझौता नहीं किया !   १९०६  में प्रथम मंचन , अस्थाई  मंच बना कर , वर्त्तमान बलभद्र पुस्तकालय की खुली भूमि पर हुआ  , जो कई वर्षों तक उसी प्रकार  चला !  राम लीला की कुछ लीलाएं ,  नगर के अन्य गणमान  लोगों ने  अपने  भवन द्वार  पर करवाई   जिसमे ' नाव नवैया ' , और  भरत  मिलाप  की लीलाएं  , श्री राम चरण बजाज , और सेठ कल्याण दास जी के भवन द्वारों पर की गयी !  बाद में यह लीलाएं भी निर्धारित रंग मंच पर होने लगी !

 >>>>>>>> इंटरव्यू  ( किसी पुराने सम्मानित नागरिक का  इतिहास बताते हुए )

                    ज्यो ज्यो समय बीता , नोगाव रामलीला और अधिक आकर्षक और अधिक पवित्र होती गयी !  नोगाव  नगर में रामलीला  सिर्फ नाट्य  की विषय वस्तु नहीं थी .., बल्कि वह हिन्दू उपासकों की गहन आस्था का प्रतीक थी ! इसलिए इस लीला   में   चयनित किये गए राम , लक्ष्मण , भारत , शत्रुघ्न , सीता के पात्र , अवयस्क ,ब्राम्हण  पुत्रों को सोंपे जाते रहे  ताकि आम जन,  इश्वर स्वरूपों में ही उन्हें नमन करे !  ...१३  दिनों की लीला के लिए चुने गए  बाल  ब्राम्हणों  के समूह को  , लीला के एक माह पूर्व से  ही आम जनता के सान्निध्य  में जाने से वर्जित कर दिया जाता था !  इन बालकों का अपने परिवार में रहना भी वर्जित था ! इनके खाने पीने की व्यवस्था , राजसी स्वरूप में , बलभद्र धर्मशाला  के विशेष कक्षों में रहती थी , जहां वे अपना पाठ याद करते , समायानुसार दैनिक दिनचर्या करते  !  ,   उनके स्वरुप को निखारने  के लिए उनका उबटन किया जाता ! दशरथ नंदन चारो भाइयों , और  सीता मां  के पात्र स्त्युत्य  होते थे   अतः  बालकों को यह आभाष करवाया जाता था की , जिन मर्यादा स्वरूपों का वे अभिनय कर रहे हैं , लीला के इन १३ दिनों में वस्तुतः वे खुद भी  उस इश्वर के   अंश  के स्वरुप की तरह ही  हैं    !
              १३ दिनों की राम लीला  के मंचन में , मुख्य स्वरुप पात्रों को मिला कर कम से कम ५०  अभिनेताओं की जरुरत  रामलीला मंडल को होती है  जिसकी पूर्ति नगर वासी स्वयं अभिनय करके करते हैं ! इन पात्रों में - ' विश्वा मित्र ' , 'दशरथ, कोशिल्या , केकियी , सुमित्रा , जनक , परशुराम , सुमंत , केवट , सूर्पनखा ,  रावण , मंदोदरी ,  मेघनाद , कुम्भकरण , बाली , सुग्रीव , एवं हनुमान के पात्र विशिष्ट हैं  ! इन सभी पात्रों के अभिनय का दायित्व , नगर के सभी वर्गों के विशिष्ट लोग  उठाते हैं !  विशिष्ट पात्रों में - ' रावण ' , मेघनाद , हनुमान , दशरथ , विश्वामित्र , परशुराम , और जनक के पात्र , आचारंयुक्त , संस्कारी , ब्राम्हण समुदाय के लोगों को ही आबंटित किये जाते हैं !


 >>>>>> इंटर व्यू .......( पात्रों की  विशेषता ,,, चयन .... रिहर्सल,,, आदि के बारे में - धर्मशाला के  बाहरी द्रश्य ) )
               नोगाव रामलीला में - परम्परागत मेकअप  पर बहुत पेनी द्रष्टि राखी गयी है  ! स्वरूपों के श्रृंगार में , अनुभवी  श्रन्गारियों की  टोली , मंच के पाछे जुड़े श्रृंगार कक्ष में सायं ६ बजे ही प्रवेश कर जाती है   ! श्रृंगार में , स्वरूपों के मुख पर पहले ' मुर्दाशंख ' नामक पत्थर को घिस कर लगाया जाता है  और फिर उसे समरूप किया जाता है ! भोहों को  काली स्याही से धनुषाकार  करके , कपोलों पर लाली लगाईं जाती है वा , तत्पश्चात ललाट पर  वैष्णव  तिलक की सुन्दर आकृति , लाल और सफ़ेद रंग से चित्रित करके , भोहों के ऊपर से लेकर गालों तक  लाल सफ़ेद तिपकियां   चित्रित की जाती है ! देखते ही देखते  ' स्वरुप ' सोंदर्य मय हो जाते हैं  और चेहरा देदीप्यमान  हो जाता  है ! ! शेष  शोभा - मुकुट , कुंडल , नाक की बुलाक , गले की मालाओं , विशेष राजकीय  वस्त्रों को पहना कर पूर्ण कर दी जाती है ! नोगाव की लीला में स्वरुप के चरण , मोज़े पहना कर आवृत किये जाते हैं ! स्वरुप में ईश्वरीय आव्हान  तब पूर्ण होता है , जब उनके मुकुटों पर किरीट लगाये जाते हैं और उनकी पूजा अर्चना एवं आरती संपन्न की जाती है !
  अन्य विशिस्ट पात्र जहाँ मुख पर मुर्दाशंख के   लेप  का प्रयोग करते हैं , वहीँ  साधारण पात्र  सिर्फ दाढी मूंछ लगाकर , साधारण सिरस्त्रान या मुकुट  पहन कर  पात्र के अनुरूप यथोचित वस्त्र धारण कर अपना श्रृंगार पूर्ण कर लेते हैं !
 श्रृंगार कक्ष दो भागों में बंटा रहता है ! जहाँ एक और स्वरुप का श्रृंगार पूर्ण होता है , और दूसरी और अन्य पात्रो का ! श्रृंगार कक्ष , रंगमंच के पार्श्व  के जुड़े हुए भवन में रहता है ! श्रृंगार कक्ष में  अनुशाशन बहुत कडा होता है , और किसी भी अपरचित का प्रवेश पुर्णतः वर्जित रहता है !

 >>>>>> इंटरव्यू ( श्रृंगार पर , सामान के स्टाक पर , वस्त्रों के स्टाक पर , प्रकाश डालता हुआ !  तथा पुराने श्रन्गारियों की याद ताज़ा करता हुआ ! ) "

               नोगाव रामलीला का सबसे आकर्षक और उत्कृष्ट अंग रहा -  उसका  रामलीला  मंच ! , जो थियेटर  की तरह एक सम्पूर्ण हाल रहा ! इस मंच एवं  हाल का निर्माण वल्ली बाबू ने वर्ष  १९३५ में करवाया !  २००  फीट गहरा , ७५ फीट चोडा, और प्रेक्षक स्तर से  ६ फीट उंचा  , एक चोकोर चबूतरा , जो बीच में विशेष प्रभावों को  दिखाने के लिए  खोखला रखा गया ! इसी चबूतरे पर ,  बाहरी भाग में , २५ फीट ऊँचे  स्थायी विंग लगाये गए  , जिनके पीछे लगाया गया प्रथम पर्दा - राम सीता , लक्षमण के भव्य स्वरुप को दर्शाता था ! इस परदे के पीछे , १०० फीट तक की गहराई तक , पांच पांच फीट के अंतराल में कई चित्ताकर्षक परदे होते थे , जो अयोध्या नगरी , महल , वाटिका , जंगल ,  और मायावी द्रश्यों का सजीव चित्रण  मंच पर उपस्थित कर देते थे ! इन पर्दों पर हुए चित्रों के अनुरूप ही बगल में दोनों और , तथा ऊपर , विंग लगाये जाते , जिन्हें द्रश्या अनुसार  धकेल कर आगे पीछे किया जाता था ! कुछ परदे स्क्रीन की तरह बीच से , दो भागों में बाँट जाते थे , जिसका प्रयोग चलते हुए द्रश्य के मध्य में ही किया जाता था !
 द्रश्य की प्रभावोत्पादकता  के लिए , प्रसंग के अनुसार पर्दों का उपयोग किया जाता था एवं उनसे सम्बंधित विंगो को खिसका कर आगे कर दिया जाता था ! पर्दा खुलते ही - दर्शक पहले .. द्रश्य के वातावरण में ही डूब जाता था ,  !
 इस मंच का दूसरा आकर्षण था . प्रसंग के अनुसार सेट्स बनाने का ! दशरथ दरबार में   दशरथ का ' सिंहासन ' . नदी के द्रश्य में लहरों का प्रभाव दरसाती , चलायमान पट्टिकाएं , हवन बेदी में लाल , पीली , पन्नियाँ लगा कर , उसे कम्पित करके अग्नि का स्वरुप देना  , सामान्य सेट्स की श्रेणी में आते थे , किन्तु  क्षीर  सागर में शयन करते , विष्णु को अचानक दर्शकों के सामने प्रगट करने के लिए , रिवाल्विंग सेट का प्रयोग , दशरथ को हवि सोपने  , और जनक के हल   चलाने  पर  धरती से बाहर अचानक  निकल कर आने वाले  अग्नि और सीता के पत्रों के लिए   अन्दर ग्राउंड लिफ्ट का प्रयोग , चलायमान रथ  पर सवार होकर वन गमन करते राम सीता के द्रश्य , अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करते थे , जिसकी कल्पना आज से ७० वर्ष पूर्व  मंच पर करना भी  शयद असंभव थी !
            निसंदेह  इस मंच की उत्कृष्टता , भव्यता  का  श्रेय , नोगाव रामलीला के पुरोधा - बलभद्र दास जी को ही जाता है -- जिन्होंने स्वयं अपना धन व्यय करके , नोगाव रामलीला को एसा  भव्य द्रश्यावली युक्त मंच प्रदान किया  ,


>>>> इंटर व्यू ...( कथन की सन १९२५ में रामलीला के मंचन को बंद करने के प्रकरण पर , झांसी राम लीला का आयोजन , और बाद में नोगाव में आनन् फानन में  सामग्री , चरखारी के थियेटर से खरीद कर , फिर से लीला करना )

                        लेकिन इससे भी अधिक उत्कृष्टता रही लीला के मंचन में ! , जहाँ भव्य सेट्स की प्रष्ठभूमि में , जो लीला खेली गई वह नितांत पारंपरिक शेली की थी !   १९०६ में , प्रथम मंचन के समय  से ही , लीला का मुख्य आधार ' रामचरित मानस ' को ही चुना गया ! वाचक परम्परा का निर्वाह करते हुए , मंच पर रामायण वाचक , दो व्यक्तियों के दल में , चोपाइयों का पाठ , उच्च स्वर में करते , और ' स्वरुप 'अथवा अन्य पात्र उन चोपाइयों के अर्थ को संवाद की तरह मंच पर बोलते ! वस्तुतः ये वाचक  लोग लीला के संवाहक के रूप में , लीला को आगे बढ़ने के लिए सूत्रधार की तरह काम करते !
            लीला के नाट्य अंग के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए , एक सहायक नाट्य ग्रन्थ - " राम यश दर्पण ' का चयन किया गया ! , यही नाटक आज भी लीला के नाट्य अंग का आधार है !
          भारतीय नाट्य परम्परा  में , ' संगीत ' पक्ष नाट्य का शसक्त अंग माना  गया है ! नोगाव रामलीला में , यही संगीत पक्ष , लीला का अत्यंत उज्जवल और मधुर  पक्ष है ! लीला के लिए निर्धारित  किये गए  सभी गीत और उनका संगीत  पुरी तरह  पारंपरिक है  , और उनकी धुनें अत्यंत मधुर एवं  पारंपरिक हैं !  अधिकतम गीत , राम , लक्षमण , सीता , के स्वरूपों द्वारा  गेय  हैं , जो  धनुष  यग्य , राम वनवास , लक्षमण शक्ति , एवं  जनकपुरी  की  पुष्प वाटिका  में गाये गए हैं !

>>>> इंटरव्यू ( गीतों की परम्परा , उनकी धुनों ,  , एवं प्रभाव के बारे में ) ( वाचक परम्परा में ... वल्ली बाबु , कृष्णदत्त पंडित ,घिस्सू बाबु का जिक्र ) * संगीत परम्परा में  मोनी बाबु , लखीराम जी , नारायण मास्टर , वगेरह का जिक्र   हारमोनियम  पर गीतों की रहर्सल , गाते हुए फ्लेश )

              अतीत  के झरोखे से , नोगाव  रामलीला  की यात्रा बहुत गौरव मयी  है ! इसके सञ्चालन में , तीन पीढ़ियों  के सदस्यों की भूमिका यादगार है ! १९०६ से लेकर आज तक , मंचित की गयी लीला में कई नाम ऐसे हैं , जो उनके कृत्यों के कारण अविस्मर्णीय है ! ७५ वर्ष तक , अपने वैभव का प्रतीक बना रामलीला भवन , जब एक उम्र के बाद , जीर्ण शीर्ण होने लगा , और हाल की केपेसिटी , दर्शकों की संख्या के लिए कम पड़ने लगी , तब हाल के ठीक बगल में , एक खुली ज़मीन पर , एक अन्य मंच बनवाने की योजना , रामलीला कमिटी द्वारा प्रस्तावित की गयी ! इसके व्यय का भर उठाया  महरोत्रा परिवार की तीसरी पीढ़ी के युवा सदस्य श्री विनोद मेहरोत्रा ने , जिसमे ग्राम वासियों के साथ मार्ग दर्शन मिला कमल महरोत्रा का ! एक वर्ष के अल्प काल में ही यह नया मंच १९८० में बन कर तैयार हुआ , और इसे कमिटी के अध्यक्ष श्री कमल महरोत्रा ने लोकार्पित करते हुए , राम लीला के भविष्य को  1980 में नए हाथो में सोंप दिया  !
             वर्ष १९८०, नोगाव रामलीला का हीरक जयंती का वर्ष था ! इस  वर्ष नगर के लोगों ने अपने पूर्वजों के योगदान को याद किया , उलास से हीरक जयन्ती मनाई !
              १९८० से लेकर . अब तक रामलीला , अब बाहरी मंच पर ही खेली जा रही  है ! पुराने रामलीला मंच का रूप इस मंच स्थानांतरण के कारण  क्षरित हो गया ! मंच की द्रश्यावली प्रभावित हुई , किन्तु लीला अपने स्वरुप में निरंतर रही !

>>>>>> इंटर व्यू ( १९८० के हीरक जयंती का वर्णन , मंच निर्माण का वर्णन )   !

              आज नोगाव रामलीला शतायु होकर - १०८ वर्षों का सफ़र पूरा कर चुकी है ! इन १०८ वर्षों की यात्रा में उसने कई परिवर्तन देखे हैं - लोगों के विचारों में - संस्कृति में, आस्था में !भारतीय समाज आज सजीव लीला को छोड़कर , मूर्तिपूजा के भव्य आयोजनों की और मुड  गया है ! एक और जहाँ मंच पर आकर्षक द्रश्यावली के कम होने से दर्शकों की संख्या घटी ,  वहीँ दूसरी और आधुनिकता की दौड़ में आँखे बंद कर के दौड़ती युवा पीढ़ी , टी वी , फिल्म , एवं झांकियों के आकर्षण में सिमट कर रह गयी  !
            आज ,,, १०८ वर्ष पूर्व ,जिन पूर्वजों ने , संस्कृति के क्षय से भयग्रस्त होकर , रामलीला के आयोजनों की परिकल्पनाएं की थी - उनके स्वप्न,  आज की युवा पीढ़ी के पश्चिमी संसकारों के आचरण को अपनाते  देख कर , ध्वस्त हो गए होंगे   !  एसा सिर्फ हमारे सामजिक कर्णधारों के साथ ही नहीं हुआ - हमारे स्वतन्त्रता संग्रामी  ,  देश पर प्राण  न्योछावर करने  वाले सभी रन बांकुरों , और हमारे प्रिय रास्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ भी हुआ है ,जिन्होंने भारत में रामराज्य का स्वप्न देखने के लिए  - जन मानस में राम का नाम उचारा था !
           लेकिन क्या यह अंत है ..? , शायद नहीं ! क्योंकि  राम तो अविनाशी  हैं , घट घट  में व्याप्त  .., और उनकी लीलाएं  मनुष्य का ..जीवन आधार ! तो रामलीला की आभा कभी  क्षीण नहीं होगी ! वह गंगा की तरह निरंतर है ..., वह सागर की तरह अटल है .., आकाश की तरह अनंत है ..., नोगाव की रामलीला इस निरंतरता को आज भी बनाये हुए है  और शायद कल भी बनाये रहेगी ! !


>>>>>> ( वर्तमान रामलीला के धनुष  यग्य के द्रश्य .., रावण  बध  ..., लोगों के गले मिलना ..., राज गद्दी ...) 





नामावली स्क्रोल ...!   !  ,












शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

" बे-ताल पच्चीसी "

                                 " बे-ताल  पच्चीसी " 


............सरपंच का लड़का , खूंटी से बस्ता उतार कर, उसे  " वेताल "  की तरह कंधे पर लाद कर  एक बार फिर स्कुल की और बढ़ लिया ! स्कुल में एक ही कक्षा में पढ़ते हुए उसे कई साल हो रहे थे ,  लेकिन वह हर बार किसी ना किसी विषय में फेल हो जाता था ! उसके सरपंच पिता ने  शिक्षा विभाग से कहकर , कई नालायक  मास्टरों के तबादले करवा दिए थे की उसका लड़का बोर्ड परीक्षा में पास हो जाये , लेकिन लड़का था की अति विवेकी होने के कारन पास ही नहीं हो रहा  था !
  आधे रास्ते चलने के बाद ,  रामलीला ग्राउंड के पास पहुंचते ही बस्ते , में रखी हिन्दी की किताब ने , सरपंच के लड़के से यूँ प्रश्न किया -
".. इस ग्राउंड पर हर साल दस मुह वाले " रावण  " का पुतला जलता है ! क्या रावण दस मुह वाला रहा होगा ?  यदि हाँ तो वह सोता कैसे होगा ?   उसे दशानन क्यों कहा गया ? ....इन बातों के उत्तर तुम जानते बुझते भी नहीं दोगे  तो तुम्हारे पिता की सरपंची इसी क्षण छिन जायेगी ! "

सरपंच का लड़का किताबों के ऐसे उलज़लुल प्रश्नों से बहुत परेशान था ! ये किताबें उसे स्कुल तक पहुँचने ही नहीं देती थी  ! बीच मार्ग में ही उससे  सवाल  पूछ कर ,उसे  इम्मोशनल  धमकियां देती रहती थी ! उसे '  विद्या-माता ' की ताकत से  बहुत डर लगता था   ! भले ही  लड़के को , पिता से उतना प्रेम नहीं था लेकिन पिता की सरपंची से वो बहुत प्यार करता था इसलिए थोड़ी देर चुप रहकर आखिर वह इस प्रकार बोला  -

 " इस प्रश्न को एक बार मेरे पिता ने मडिया देव के पुजारी देवीदीन से भी पूछा था !मेरे पिता को जब भी सरपंची जाने का डर लगता है तो वो मडिया देव के पुजारी से गण्डा ताबीज़ बंधवाने जाते है ! तब उस दिन वे मुझे भी साथ ले गए थे ! महाराज ने अपने पास रखी रामायण की सभी पोथी , गुटका से लेकर अर्थ वाली बड़ी रामायण  , पलट डाली , लेकिन इसका उत्तर  उन्हें बाल काण्ड से लेकर उत्तर  काण्ड तक कही नहीं मिला ! शयद तुलसी.दास जी भी इसका उत्तर  लिखना भूल गए थे ! खेर , मडिया देव के पुजारी ने अपनी अकल लगा कर जो बापू को समझाया वही में तुम्हे बताये देता हूँ !
......रावण लंका में शाशन करता था , जैसे आज भारत में  आज लोग शाशन  करते हैं ! उसके दरबार में ' विभीषण ' विपक्षी दल के रूप में बैठता था - जैसे आज अपने देश में सदनों में विपक्षी दल बैठते हैं !  रावण   और विभीषण एक ही कुल के वंशज थे , एक ही खून , और उन दोनों में एक ही बात को लेकर मतभेद था की ' गद्दी ' कौन सम्हाले ! बाकी वे भाई भाई थे ! रावण गद्दी छोड़ना नहीं चाहता था और विभीषण बिना गद्दी लिए टलने वाला नहीं था !
रावण  के पेट में बहुत सारे मायावी चहरे समाये रहते थे ! इन चेहरों के पेट नहीं थे  , लेकिन बड़े बड़े  मुह जरुर थे  जिससे ये  बहुत सारी सामग्री , जैसे विटामिन , अयस्क , मिनिरल , प्रोटीन , वगेरह गटकते रहते थे .., रावण के पेट में रहने के कारण इन्हें जनता ठीक से  पहचानती  भी नहीं थी , और रावण को भी अपनी उदरस्थ की गयी चीज़ें , पचाने में  इससे आसानी होती थी !  शांति काल में रावण  अपने मूल मुख से ही शाशन करते हुए , खाता पीता रहता था !   लेकिन युद्ध के समय उसे शत्रु को मुर्ख बनाने के लिए, और अपनी शक्ति दिखाने के लिए  कई चेहरों की ज़रूरत होती थी ! रावण के पेट में समाये चहरे .., युद्ध में काटे जाने के डर से बाहर नहीं आते थे ! रावन भी उन्हें बाहर नहीं आने देना चाहता था की वे कहीं खाई हुई चीज़ों के बारे में - " बक झक " ना दें !  तब रावण ने कुछ बाहरी चेहरों को अपने चेहरों के साथ जोड़ लिया ! जैसे आज हमारे देश में मूल शाशन कर्ता   पार्टी को सहयोग देने,  अन्य पार्टीयाँ ,शाशक  के साथ जुड़ जाती हैं !   ये चहरे वक्त पड़ने के साथ उसके दोनों और जुड़ कर  अट्टहास करते थे , जिससे रावण बहादुर और शक्तिशाली नज़र आये ! इन चेहरों में किसी के कट जाने पर उसका स्थान दूसरा चेहरा आ जाता  था , और दशानन को कमज़ोर नहीं होने देता था !  
राम से अंतिम युद्ध करते समय उसके वही सहयोगी चहरे - माल्यवान , कुम्भकरण , इन्द्रजीत , मारीच , वगेरह  राम को   डराने के लिए  दशानन बन कर आये थे , !
अंतिम युद्ध में रामने  मूल रावण  के साथ  उसके दुसरे  चहरे भी  विभीषण के द्वारा बताये जाने पर , काट डाले , तभी रावण समाप्त हुआ !
 इस प्रकार दशानन के दस चेहरों का राज. पंडित देवीदेन्न द्वारा बताई गई बातों से  मेने बखान किया !.... शायद तुम संतुष्ट हो जाओ !
... रही बात दशानन के सोने की समस्या की ..! तो दशानन को ये चहरे ' ' सोने ' ही नहीं देते थे ..,इसलिए वह इन चेहरों को दरबार में ही छोड़ कर घर आता था ! दुसरे उसे  एक डर यह  भी था की कहीं दस चेहरों के साथ ' मंदोदरी " ने उसे देख लिया तो समस्या पैदा हो जायेगी  , .. कहीं  ' मंदोदरी'   मूल चहरे को छोड़ कर किसी दुसरे चहरे पर रीझगयी तो रावण का  क्या होगा    ! '''" ..


..... सरपंच के कड़के के मौन भंग होते ही ....बस्ते  में से हिन्दी की किताब टपक कर बाहर गिर गयी ,,,  स्कुल में बस्ता खोलने पर जब किताब नही दिखी  ,, तो उसे वापिस उठाने लड़का फिर घर की और दौड़ पडा !....!!

- ' अथ   "  बे-ताल  " पच्चीसी !'



------ सभाजीत


vyang

 " व्यंग "  का जन्म कब हुआ यह तो कहा नहीं जा सकता , किन्तु यह विधा राजाओं के युग में ,  धर्म निष्ठ चिंतकों , कवियों , के बीच बहुत तेज़ी से तब  उभरी , जब उन्होंने खुद को मृत्यदंड से बचाते हुए  ,  सत्य और कडवी बात राजा को सुना देने के लिए ,   परिमार्जित भाषा का सहारा लिया ! बहुधा तब यह विधा इस प्रकार प्रयोग की गयी की राजा  ,  भाषा या अभिव्यक्ति के विरुद्ध , कोई आरोप सिद्ध ना कर सके , किन्तु बात उसके मर्म पर चोट कर जाये ! व्यंग करते समय व्यंगकार , राज्य , राजा , और राजधर्म का पूरा सम्मान बनाये रखने की कोशिश करता था , और यही कारण था की ब्याज स्तुति  में निंदा होते हुए भी , राजा व्यंगकार पर आरोप नहीं मढ़  सकता था !
 ओरछा की प्रसिद्द नृत्यांगना ,   राय प्रवीण को जब मुग़ल बादशाह अकबर ने , जबरन अपने दरबार में शामिल करने के लिए , ओरछा से दिल्ली बुलाया ... तो उसने उस महाबली अकबर को इस दोहे में व्यंग करते हुए ललकारा -
 विनती राय प्रवीण की , सुनिए चतुर सुजान ,
 झूठी पातर भाखत हैं ,  बायस , बारी  स्वान ,
 वस्तुतः यह महाबली अकबर के लिए सीधे  सीधे गाली जैसी ही थी , किन्तु  वह यह कठोर बात सुन कर भी मुस्करा उठा , और उसने  राय प्रवीण को मुक्त कर दिया !
आज व्यंग  एक व्यवसाय की तरह उभर रहा है ! व्यंग विधा का प्रयोग आज  कोई इसलिए नहीं करता है है की , उसे समाज को जाग्रत करना है , या वह किसी मर्म पर चोट करके उसका  सार्थक परिणाम  समाज को देगा , बल्कि  वह उसका प्रयोग खुद को प्रसिद्द करने , रोजी रोटी कमाने , के लिए करता है ! राजाओ के काल में व्यंगकार को जहा अपने अस्तित्व की रक्षा करने की भी चिंता , अपनी अभिव्यक्ति के साथ थी . आज वह चिंता व्यंगकार को नहीं है ! इसीलिए अब व्यंग - ' हास्य की श्रेणी में आ गया है , जिस पर हम  लोग हंस कर भूल जाते हैं !
किन्तु व्यंग के विषय चुनते समय  राज धर्म को निबाहना मेरे ख्याल से आज भी जरुरी हैं ! व्यंग , व्यक्ति , नीति , और कथन पर किया जाना चाहिए ! जिस व्यंगकार के पास व्यंग करने के लिए उचित माध्यम, प्रतीक  ना हो , उसे व्यंग करने का अधिकार नहीं ! व्यंग की पहली शर्त है उत्तम चिंतन . सार्थकता  ,सोम्य  भाषा , और दूर द्रष्टि ! व्यंगकार कहलाने से पहले किसी को भी ये गुण अर्जित कर लेना चाहिए !
- सभाजीत 

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

sinhaasan batteesi bhag do

                                           सिंहासन बत्तीसी 

                                                                        एक नाटक  
                                                               लेखक - सभाजीत 
                                            *  भाग दो *    


(..मंच पर प्रक्काश तीव्र होता है ! )
(..राज़ा का दरबार ,,,कुर्सी पर बैठा व्यक्ति कुर्सी को दोनों हाथों से कस  कर पकडे है ! ) कुर्सी के पीछे पुतला और दायें बाएं अन्य   चारों पात्र खड़े हैं ...))
( अचानक बादलों की गडगडाहट ,,,विभिन्न आवाजें .., विभिन्न प्रकाश।।)

  ( कुर्सी पर बैठा राजा )   >  "  कौन है ..? कौन है ..?? यह क्या हो रहा है ..?? " 

    (नेपथ्य में एक स्त्री कंठ  में गूंजती आवाज़ ) > .... शांत राजन ! शांत ..!! ..में कुर्सी बोल रही हूँ  महाराज विक्रमा दित्य की कुर्सी .  जिस पर अब तुम बैठ चुके हो !  मुझ पर बैठने के बाद अब तुम मेरे और इस पुतले के मालिक बन चुके हो !अब तुम्ही राज़ा  हो  .! "
 " वास्तव में मैं एक तिलस्मी कुर्सी हूँ .... ! मेरा तिलस्म इस पुतले में और पुतले का तिलस्म मुझमें छिपा है ! यथार्थ  में हम दोनों एक दुसरे के हिस्से ही है ! राज़ा बन जाने  के बाद  अब जो भी बात यह पुतला कहेगा  वह सिर्फ तुम्हें ही सुनाई देगा .. इसी तरह जो बात मैं कह रही हूँ वह भी सिर्फ तुम ही सुन पाओगे,कोई और नहीं सुन सकेगा   इसलिए तुम परेशान मत होना  !  इस कुर्सी के पीछे खड़े पुतले को अब  तुम्हारे सिवा कुछ भी नहीं दिखाई देगा  क्योंकि उसका तिलस्म ही इस तरह का है ...वह सिर्फ जब तक कुर्सी खाली रहती है .. तभी तक अन्य  दुसरे लोगों को देख सकता है, उसके बाद नहीं  !  पुतले के संचालन के लिए इस कुर्सी के दोनों हत्थों में कल पुर्जे लगे हैं जिनसे तुम इस पुतले से कोई भी मनचाहा काम ले सकते हो ! !"
" अब ध्यान से तुम वह एतिहासिक तिलस्मी राज  सुनो    जो मुझे छोड़ किसी को नहीं मालूम ...और मेरे मालिक होने के नाते तुम्हे वह राज बताना मेरा  फ़र्ज़ है !  " 
" इस कुर्सी पर कई सालो पहले राज़ा  भोज ने बैठने की कोशिश की ! ...तब कुर्सी से जुड़े बत्तीस पुतलों ने उन्हें बैठने नहीं दिया ! राजा  भोज ने क्रोध में आकर उन बत्तीस पुतलों को मनुष्य बना दिया   जो बाद में भोज की प्रजा में जा घुसे ! उन्होंने प्रजा को बरगला कर राजा  भोज के अस्तित्व पर हो प्रश्न उठवा दिया   और जनता उन्हें राजा  भोज की जगह " गंगू  तेली " पुकारने लगी ! उसी समय अंतिम पुतला  जो  अभी इस कुर्सी के पीछे खडा है .. कुर्सी को लेकरअन्दर ग्राउंड  हो गया !  प्रजा में हुए प्रचार के कारण  राज़ा  भोज अपनी स्मरण शक्ति खो बैठे  और विक्षिप्त हो कर जंगल चले गए ... वे वहीँ रह कर स्मरण करने की कोशिश करते रहे ... लेकिन  वहां भी लोगो ने उन्हें कुछ भी याद नहीं आने दिया ! वही राजा  भोज  किसान के रूप में अभी फिर लौट आये हैं ...जिनके आँखों पर पट्टी बांध कर तुम कुर्सी पर बैठ चुके हो !  इस कुर्सी के दोनों और खडी   यह चारोँ आकृतियाँ भी वस्तुतः   वे पुतले ही हैं ! इन्हें यदि  पीछे खड़े " तिलस्मी पुतले " से  स्पर्श  करवा कर अपने आधीन रखा जाये , तो वे पुतलों की तरह ही तुम्हारी आज्ञा मानेंगे ! वे बाकी पुतलों को भी प्रजा में से ढूंड निकालेंगे और उन के साथ मिलकर तुम्हारा हर काम पूरा करेंगे ! इस तरह तुम्हारा राज निर्विघ्न चलता रहेगा ! "
   परन्तु सावधान ...! यदि राजा  भोज यदि पुनः जाग गए और उन्हें सब कुछ स्मरण आ गया  तो मेरा और इन पुतलों का तिलस्म टूट जाएगा  और फिर तुम्हारा महत्त्व समाप्त हो जाएगा ! .... अब किस तरह तुम राज करो ...यह तुम्हारी चतुरता पर निर्भर है ! ..." 

   ( गडगडाहट की ध्वनि धीमी होती जाती है और फिर समाप्त हो जाती है )
( मंच पर प्रकाश पुर्णतः तीव्र हो जाता है )
 एक प्रहरी >  " बा अदब बा मुलाहिजा होशियार ..., दरबारे राज़ा  भोज  ... होश में  आ रहा है ..."   ( हलचल होती है )
 राजा >  ( भाषण के स्वर में )....  " मेरे साथियो ! मेरे दरबारियों ..!! मुझे आपने राजा बनाया , अच्छा किया ! क्यूंकि हम इस योग्य थे ! पहले लोगों ने इस सिंघासन पर बैठ कर बहुत ज़ुल्म ढाए  हैं- अब हम ज़ुल्म ना होने देंगे  ! पुराने राजा भोज ने जो गलतियां की हैं हम उस की खोज बीन करवाएंगे - उन पर कार्यवाही करेंगे !  हमें बहुत कुछ करना है - पहले अपने विशवास पात्र लोगों को पद बंटाना है   जिससे मजबूत दरबार बन सके ! फिर पड़ोसी राजाओं , और उनकी स्थिति के बारे में सोचना देखना है !  हमें बहुत खतरा  भी  है ..जो पहले भी था ..आज भी है ...और आगे उसके बने रहने के पुरे आसार हैं ! मैं चाहूंगा की आप उन खतरों के बारे में निरंतर सोचा करें ..यदि आप का ध्यान उस और बंटा   रहेगा  तो बहुत अच्छा रहेगा !  हम आपके आभारी हैं ..और आप हमारे रहिये की हमने यह कुर्सी की कठिन जबाबदारी सम्हाली है ! हमारा सम्बन्ध जन्म जन्मान्तरों का है - प्रजा और राजा  का ... जिसमे हम आपको और आप हमें पालेंगे  तो अच्छा रहेगा  ! . आइये अब हम और लोगों को भी  जिम्मीदारियां सोंप दे ! 
 ! "
 (एक व्यक्ति आगे बढ़ता है- पुतला उसके सर पर हाथ रखता है - झन्न की आवाज़ आती है - वह व्यक्ति कांपता है ! ) 
 राजा >  " तुम कौन।।? "
 व्यक्ति >  आपका सेवक " 
 राजा >   "अब से तुम्हारा नाम हुआ -  " हाकिम "  जाओ फटता झाड पोंछ कर , आसन जमाओ  .., " 
  (दूसरा व्यक्ति आगे बढ़ता है  पुतला सर पर हाथ रखता है - झन्न की आवाज़  ) 
राजा < " तुम कौन ..? " 
व्यक्ति >  " आपका चाकर " 
 राजा > " हमने तुम्हे खोज बीन के लिए रक्खा ...!जाओ खोजो और बीनो ... ख़ास बातें  हाकिम को बताओ " 
 (तीसरा व्यक्ति आगे बढ़ता है  - पुतला हाथ रखता है - झन्न की आवाज़) )
राजा  > " तुम कौन  ?/" 
व्यक्ति >  " आपका गुलाम .." 
राजा > ' हमने तुम्हें काटने  छांटने  और बसूल करने  के लिए रक्खा ..., जाओ कंधे पर एक वसूला रखो ... काँटों ..छांटो ... और वसूलो ... ! "
(चौथा व्यक्ति आगे बढ़ता है )
 राजा > " तुम कौन ..? " 
 व्यक्ति ( पलट कर  तेज स्वर में ) > " तुम कौन।।।।??" 
राजा हतप्रभ हो जाता है !   .. 
 पुतला  > राजन  इसका शरीर पुतले का हो  सकता है  लेकिन दिमाग नहीं ..! वह बिगड़ चुका है ! " 
 राजा > " यह कैसे काबू में आयेगा ,,,? " 
पुतला >  "इसकी दिमागी खुराक कागज़ , स्याही - विज्ञापन , प्रचार है   इसका कोटा बाँध दें ... कभी कभी इसे राजकीय भोज पर आमंत्रित करते रहें ! " 
 राजा > जाओ तुम उन  तीनो  के पीछे लगे रहो ...! कागज़ स्याही में दूंगा ...!  तुम अकल लड़ाते रहो ..उनके बारे में लिखते रहो ! " 
व्यक्ति > ( आँखे तरेर कर ... )  "  याद रहे की मेरी खुराक मुझे मिलती रहे ! " .. ( चला जाता है ) 
 ( मंच पर प्रकाश मद्धिम हो जाता है ...) मंच के बाएं कोने में आगे की तरफ कमर में पेटी बांधे  सांकल से कुर्सी तक जुडा  किसान , सर पर हाथ रखे हताश  बैठा है ... तभी खोजे और वसूले आते हैं ... वसूले कंधे पर एक वसूला रक्खे है ) 
खोजे >  " महाराज ने खोजने बीनने के नियम बड़े  कठिन बनाये हैं ..!" 
 वसूले >  " हाँ ! जिसे खोज लें उसे बीने ना .. और जिसे बीन ले उसे  खोजें ना ..!! "
 खोजे >  " पता नहीं महराज किसे धुंधवा रहे हैं ..? " 
 वसूले > " मैं तो वसूला कंधे पर रक्खे रक्खे थक गया ! " 
खोजे >  " जब बिना वसूला चलाये ही वसूल हो जाये तो क्यों लादे फिरते हो   ( अचानक सामने किसान को बैठे देखा कर ) ... अरे !! देखो देखो !! कौन बैठा है वहां ..? " 
.वसूले   >  (  हाथ आँखों पर लगा कर दूरबीन बना कर  देखते हुए ) - हाँ मिस्टर खोजे कोई बैठा है उकडू  ..सर पर हाथ रक्खे हुए ! "
खोजे  > कोई फ़कीर ना हो ..! "
 वसूले > " फ़कीर वहां क्यों होगा ,, वह तो आश्रम में मिलेगा चेलो चमचो से घिरा   .. ..., 
खोजे >    " तब कोई हिप्पी न हो ...,  शांति की खोज में गांजा उड़ा रहा हो ! "
वसूले >  " बिना  हिप्पानियों के हिप्पी कैसे . इसके तो हिप भी नहीं है ..? और फिर  हिप्पी तो समुद्र तट पर पाए जाते हैं ."
 खोजे > ' तो फिर कोई लुटेरा न हो ... यानि  ' क्रिमिनल "..! " 
  वसूले >  अह।।! हः।।!!  क्या लुटेरे भी कभी सोचते हैं ... इस तरह सर पर हाथ रख कर ...?? " 
 खोजे  >  भैया  मुझे यह   सुपर स्टार लगता है .... किसी गरीब की एक्टिंग कर रहा है  वहां बैठ कर ..! " 
वसूले   >   " बिना कैमरे और लाइट के ...?  भीड़ भी तो नहीं है उसे घेरे ..! "
 खोजे > ( परेशान होकर ) .." तब कौन हो सकता है  वह ... जो सरकारी ज़मीन पर बैठा है  ...?" 

 वसूले  >  " खास बात है की उकडू बैठा है ... " मुर्गे  " की तरह ...!! "
खोजे  > ( उछलकर ) ... मुर्गा ...!!!  ...ही ही ही ... मुर्गा !! ...,"
वसूले > " चलो पूछ लें कही मुर्गा ही ना हो ..., इससे पहले की वह " बांग " दे , और कोई दूसरा जाग जाये ... क्यों ना  हम ही उसे दबोच लें ..!! " 
खोजे > .." बिलकुल " ..!!
 ( दोनों किसान के पास जाते हैं ) 
खोजे > " क्योँ भाई किस " फ़ार्म " के हो ..? " 
 वसूले >  " देशी हो या विलायती " ..? 
किसान . > ( हाथ जोड़ कर ) ' मर्जी " ...! "
दोनों एक दुसरे को देख कर ) - " क्या मतलब ..? "  ( निराशा से सर हिलाते हैं (
खोजे <  " क्यों भाई पहले कब कटे थे ..? " 
वसूले > " " तुम्हारे पंख कब नोचे गए ..? "
किसान ( हाथ जोड़ कर ) _ " हुकुम " ! 
 ( खोजे वसूले प्रश्नवाचक द्रष्टि से  एक दुसरे को देखते है  ) 
खोजे > क्या नाम है तुम्हारा ..? " 
 किसान > " भोज " 
वसूले >  "  नाम तो ' शाही "  है ... शाही मुर्गा है ! " 
खोजे > " आगे।।।  जात- पांत ...? " 
किसान >  " राजा ..!  राजा भोज।। " 
वसूले  > ( चौंक  कर उछलते  हुए )  ..  " यह मालिक का  खानदानी  है ...! रिश्तेदार लगता है ... " 
खोजे > " (  ..! हंसता हुआ ) अरे नहीं भाई ..यह  चिन्तक है   स्कीम सोच रहा है प्रगति के नए चरण " 
वसूले  > ."  फारेन रिटर्न  हो सकता है ! "
 खोजे >  "   फारेन का आदमी  ! रिटर्न भी  दे सकता  है ... लेकिन  रिटर्न सीधे मालिक को ही देगा।। समझे ? "
वसूले > " चलो मालिक को खबर कर दें .." 
खोजे > " पहले हाकिम को बतला दें ! " 
वसूले > " हाकिम खुश हो जायेंगे ! " ..हमें ओहदा दे देंगे ..!! " 
खोजे ..." दौड़ो ...!! " 
वसूले >  " भागो।।" ! 
( दोनों दौड़ कर मंच के दुसरे कोने पर जाते हैं जहाँ " हाकिम " खड़ा खड़ा ..हवा में कलम चला रहा है ! उसके सामने एक लम्बी मेज़ है .. जिस पर कई ' डिब्बे ' रक्खे हैं ! वह कागज़ इधर उधर कर रहा हिया ..., हाथ उठा कर फोन करता है ! एक और मुंह करके चिल्लाता है ... डांटता है ... फिर कलम चलता है ) 
 खोजे वसूले दोनों वहां पहुँच कर थोड़ी देर हाथ बांधे   ' हाकिम " के एक्शन देखते रहते हैं फिर बोलते हैं ) 
खोजे >  " हुजुर ..हाकिम जी  !  लेटेस्ट न्यूज़ ..!! "
वसूले >  " ब्लास्टिंग - सीक्रेट  न्यूज़ "..! 
अफसर >  " बको .." 
खोजे >  " वहां मैदान में एक रहस्यमय आदमी उकडू बैठाहै ! " 
वसूले > " नाम है भोज  ...जात है राजा   " 
खोजे >    " कमर में सुनहरा पट्टा लगाये है .. राज दरबार की परम्परागत पेटी " 
अफसर  >  " पुरातत्व के दिब्बेमें नीले फार्म के साथ - पीली चिट  चिपका कर - एक अर्जी के साथ डाल दो ..! "
(  खोजे - वसूले , दोनों एक दुसरे की और देख कर भौं चक्के हो जाते हैं )
खोजे  > ' हुजुर वह सोच भी रहा है " 
अफसर >  " साहित्यकारों की बही में सबसे आखिर में , सफ़ेद चिपकी लगा कर एन रोल कर लो   और हरे डब्बे में  डाल दो  ..! "
खोजे  >  " हुजुर !!  वह सरकारी ज़मीन पर है  ! "
अफसर > " नगर पालिका के डब्बे में मुह घुसा कर फूस फुसा दो   वे बुलडोज़र से उखडवा देंगे ..! "
 ( दोनों एक दुसरे को परेशान हो कर देखते हैं ) 
खोजे > ( चिंता से ) क्या करें ..?? "
 वसूले > " हाकिम व्यस्त है ... रात भर सोया नहीं है ! "
 खोजे >  " सूचना तो देनी पड़ेगी ... वरना नौकरी भी जा सकती है ! "
वसूले > हाँ भाई खोजे ... सूचना तो देनी ही पड़ेगी ! " 
खोजे > ( अफसर से ) - सर !! वह " मुर्गा " भी हो सकता है   उकडू बैठा है ! " 
अफसर > ( चौंककर )  " क्या।।।???" ... उकडू बैठा है ..?? फ़ौरन लाल नीले डब्बे में रिपोर्ट करो -- आज कल यहाँ बहुत मुर्गे दिख रहे हैं ..! या खतरनाक होते हैं ... ' मुर्गियों ' का जीना हराम  कर रक्खा है इन्होने ..! "

( दोनों झुक कर एक कागज़ पर कुछ लिखते हैं   और फिर वसूले लपक कर उसे  एक डिब्बे का मुह खोल कर अन्दर डालता है .. अचानक   ' खट ' की आवाज़ होती है डिब्बे का ढक्कन बंद हो जाता है ... वसूले  का हाथ डिब्बे के अन्दर ही रह जाता है !) 
 वसूले > ' अरे ... अरे  मर गया .." 
खोजे >  ( घबरा कर )  ..." क्या हुआ वसूले ,,,?? " 
वसूले > "( कराहते हुए ) मेरा हाथ फंस गया ! "
खोजे ( घबरा कर )  ( - "  अफसर से ) - सर !! वसूले का हाथ फंस गया ! " 
अफसर > " खाली हाथ डाला था क्या ..? " 
खोजे > " यस सर ! "
अफसर > "  व्हाट नानसेंस !! ...इसने चूहे वाले कटघरे में हाथ क्यों दाल दिया .. वो भी खाली ..? " 
खोजे >  " सर उसे पता नहीं था  .. न समझ है .. बच्चा है सर ..! " 
अफसर > " वसूले और न समझ ..??.... किस गधे ने नौकरी दी ... ? " 
पहला >  " सीधा अप्वाय्मेंट है सर ... मालिक की तरफ से ..! "
अफसर > ... ओह।।।!! ..सारी ...!! ..लेकिन मालिक ने नोकरी देते समय अकल  तो नहीं ले ली थी ... वो कहाँ गयी ..! " .
खोजे > " वसूलने में खर्च हो गयी सर ..! उसे छुडवा दीजिये ! "
 अफसर > " तुम्हे मालुम है ..??  इस पिजरे की चाबी सीधे मालिक की कमर से बंधी है ...? " 
 खोजे > " नहीं मालूम सर !!  सीक्रेट बातें नहीं मालूम ..! "
अफसर > " कटघरे को खोलना आसान नहीं ...! खोजे।।।। वह विदेशी हाथ फंसाने के लिए रखा गया  है ! "
वसूले > ( आर्त स्वर में ) ..." अब क्या होगा सर !! मुझे बचाइये ..!! "
खोजे >  " अब कोई सही रिपोर्ट आपको नहीं देंगे सर सर ... इस बार बचवा लीजिये ! "
अफसर >  " कौन बचा सकता है   इसे ..? इसका हाथ तो गया ..! "
खोजे > ( आश्चर्य से )  क्या सर ....???" 
वसूले >  ( आर्त  स्वर में चीखते  हुए  ).... नहीं सर।। !  प्लीज़ सर ..!! "
अफसर > " हाथ तो काटना ही पडेगा वसूले ..! अब यह बतलाओ कहाँ से काटूँ ..??
वसूले > " नहीं सर ..!! प्लीज़ सर ...!! " 
अफसर . " जल्दी बोलो ..! मालिक को पता चले  इससे पहले बोलो ..! " 
खोजे >  " ... लेकिन सर ... बिना हाथ के यह कैसे वसूलेगा ...? "
 अफसर > " नए नियम बिना हाथ के ही वसूलने के आ गए है ! "
वसूले ( ( चिल्ला कर ) नहीं सर ..! प्लीज़ सर ..! "
( तभी पत्रकार आता है ) 
पत्रकार >  " क्या हाल है मिस्टर " गड़बड़ी !!  " ..क्या चीख पुकार मची है डिपार्टमेंट में ..? " 
अफसर  > ..." ओह आप ...!! आइये क्या लेंगे ..? " 
 पत्रकार >  " न्यूज़ और सिर्फ न्यूज़ ..!! "
अफसर  ( हंसते हुए ) .... न्यूड ..??   भैया ... न्यूड तो बाहर मिलेगा .. यहाँ विभाग में कहाँ ..? "
 पत्रकार >  धन्यवाद ..!! मुझे तो सिर्फ ' न्यूज़ " ही चाहिए ... हाँ अगर न्यूड -... न्यूज़ हो  तो और भी शुक्रिया !  
अफसर > " कहाँ फ्लेश करेंगे ..? "
पत्रकार >  " दैनिक कन्फ्यूज़ में " 
अफसर > .." देखिये आप कुछ भी लिखते हैं ...! पिछली बार मेरे पीले डिब्बे के पेंट पर लिख डाला आपने ..! .. डिब्बा खड्खादा  गया ! मुझे नया पेंट करवाना पडा ..! मालिक का खर्चा हुआ ! "
पत्रकार >   "  अब हमें क्या मालूम की " पीला डिब्बा  " काम का भी है या नहीं ....कभी प्रेस नोट तो दिया नहीं  और ना कभी विज्ञापन  ! .."
 खोजे ( बेचेनी से हाथ मलते हुए ) .." कुछ कीजिये सर !! वसूले का हाथ अभी फंसा हुआ ही है ! "
 अफसर  >  " अरे हाँ ..!  लाओ वसूला ! "
 पत्रकार > " क्या कर रहे हैं ..?? "
अफसर >  " आपके लिए समाचार बना रहा हूँ ! ... वसूले का हाथ वसूले से कट रहा है ! "   मजबूरी है ... फंस गया है ! "
वसूले >  '' नहीं सर  प्लीज़ सर ..!" 
खोजे > " कुछ कीजिये सर !! हम लोग बड़ी इम्पार्टेंट  रिपोर्ट लाये थे ..! "
पत्रकार  > " क्या रिपोर्ट थी भाई ..?? ... कितनी इम्पार्टेंट थी ..? 
अफसर >  " अरे जाइए यह आपको ना बताई जायेगी ..! "
खोजे >  " हाँ मैदान में उकडू बैठा आदमी क्या है .. यह  सब हम नहीं बताएँगे  ! "
अफसर >  ( खोजे से ) ( जोर से ).... चोप्प्प ....!! "
पत्रकार >  ' बस बहुत है !  ( लिखते हुए )  मैदान में ... उकडू आदमी ... अभी देखता हूँ ... ( भागता है ) 
अफसर > ( खोजे को डाँटते हुए ) .. कर दिया ना लीक ..मोस्ट इम्पार्टेंट टॉप  सीक्रेट ... अभी डब्बे में गया ही नहीं नहीं ...और उसे मालुम पद  गया .!! 
खोजे > " (  दबे स्वर में ) - अब क्या होगा सर।।?? " 
 अफसर > " होगा क्या ...?? ... जीप में डीज़ल डलवाओ ..! चलो फील्ड पर चेक करो ..!! थोरो चेक करो ..! डिटेल्ड रिपोर्ट लगेगी ..! "
 वसूले > ( चिल्लाकर ).."   नहीं सर प्लीज़ सर .." 
( अफास  र्खोजे भागते हैं ... दौड़ कर  मंच के  दुसरे कोने में किसान के पास पहुँचते हैं  वहां पत्रकार पहले ही पहुँच चुका है  और कैमरे से विभिन्न एंगल से उसके फोटो ले  रहा है  )
अफसर >  ' बस।।! बस।।!!  इट  इज  अवर प्रापर्टी ..हमने खोजी है ... आप फोटो नहीं ले सकते ! "
पत्रकार > " आप मुझे नहीं रोक सकते !   यह आपका माल नहीं है ! "
 अफसर >  " व्हाट आई से .. इस करेक्ट .. ! "
पत्रकार >    " व्हाट  आई राईट इस परफेक्ट ..! "
किसान > ( बद्बदते हुए ) ... " मर्जी .." 
अफसर > " क्या नाम है तुम्हारा ..? " 
किसान >  " भोज .." 
अफसर ( कड़क कर )>  ...' जात ..?? "
किसान > " राजा .... आदी  राजा ..!! " 
अफसर  > " पटवारी हल्का ..? "
खोजे >   "यह बिना पट्टे  के है हजुर ..! "
अफसर > " पट्टा  तो डाला है कमर में  !  ..  देख नहीं रहे हो ..? "
 खोजे > " तुम सरकारी ज़मीन पर क्यों बैठे हो ..? " 
 किसान >  " मर्जी।।" 
खोजे > " सरकारी ज़मीन पर  सिर्फ सरकार बैठ सकती है ... ' हाकिम ' बैठ सकते हैं ! "
 अफसर > "...और फिर उकडू बैठे हो  !! ":
खोजे > '  गन्दगी कर रहे हो ...! "
अफसर >  वह भी सर पर हाथ रख कर ..! "
खोजे > ' सोच रहे हो या षड्यंत्र  कर रहे हो ...! "
अफसर > ' तुम पर तो एक साथ कई धाराएँ लग रही हैं ...! "
 खोजे > "  कई कई दफा  लग रही हैं ! " 
अफसर >  "  बोलो क्या किया जाये तुम्हारे साथ ..? "
खोजे >  " अपनी सज़ा तुम खुद बतला दो ..! "
अफसर >  " कहो तो तुम्हारे घर हवालदार भिजवा दें ..? "
पत्रकार >  " बिना अपराध।। वारंट  के आप कुछ नहीं कर सकते ... समझे ..?? " 
अफसर >  " मिस्टर खोजे वेरीफाई करो ... पटवारी हल्का  नंबर सात में  ज़मीन किसकी थी ... ! कौन था मालिक ..? "
( खोजे एक बही निकालता है   खोजता है।।।।एकाएक  चौंक कर  )
 खोजे > '' यह रहा हुजुर !!  यहाँ लिखा है ... ' यह "  गंगू तेली " है ! "
अफसर >  ( चौंक कर ) .... " गंगू तेली ....?? हैं .. ?? गंगू तेली ..!!   मालिक  का  कम्पटीटर    .??  "
खोजे >  हाँ सर ..!! मालिक की तुलना में इसने एक कहावत बनवा दी थी .... " कहाँ राजा  भोज ... कहाँ गंगू तेली " .....आज तक चल रही है ! 
पत्रकार > " वंडर फुल ...!!!  यह गंगू तेली है .. !!  इसके नाम की कहावत से तो लोग आज तक कन्फ्यूज़ होते हैं ..! " 
खोजे > ' हनन   कहाँ राजा  भोज कहाँ गंगू तेली .. " 
पतरकार >  औरयहं  " कहाँ " शब्द  किसके लिए लागु है .. यह आज तक स्पस्ट नहीं हुआ ! " 
 अफसर > ( स्वतः  फुसफुसाकर ) .. " यह  तो बड़ा खतरनाक शख्श है ! ... वेरी   डेंजरस ..!"
पत्रकार >..."  दिस इज अ ग्रेट  स्कूप ..!! ..." राजा  भोज के भेष में गंगू तेली  की अद्भुत खोज ...! " 
अफसर > ' मिस्टर खोजे ...!! " 
 खोजे   " यस सर " 
 अफसर > " हॉट लाइन पर खबर करो ... फ़ौरन मालिक को खबर करो ..! " 
 (दूर  वसूले की चींख ...)...' नहीं सर ... प्लीज़ सर ..! " 
(अफसर बात करता है , दूर कुर्सी पर बैठा  राजा  सुनता है   बोलता है ... सामने पुतला खड़ा ऊँघ  रहा है )
 राजा > ' क्या छपा  है अखबार में ..? " 
  अफसर > " गलत छपा है .. बिलकुल गलत ... वो गंगू तेली है ... हमने डिटेल्ड चेकिंग कर ली है .. उसका बाप भी गंगू तेली था ...! बाप का बाप  यानी दादा भी गंगू तेली .... परदादा भी ... लकड़ दादा भी गंगू तेली था .  वह खानदानी तेली है ..मालिक  ..! " .!
भोज > ' यही तो बहस का मुद्दा है !  हम भी खानदानी है   बाप भी भोज थे .. दादा परदादा .. लकड़ दादा  भी भोज  ..! " 
पुतला >  " राजन ... !! सावधान !! . गंगू तेली को दूर रक्खें .!! " 
भोज >   ' तुम लोग बताये  सूत्रों पर गंगू को सम्हालो ..! उसका मनोरंजन करो ..! तब तक में कुछ नए फार्मूले भेजता हूँ ..! " 
(प्रकाश पुनः किसान पर केन्द्रित होता है ) 
खोजे > ( किसान को पुचकार कर ) - " गंगू जी !! आप इस तरह सर पर हाथ क्यों रखे हैं ..?? " 
 अफसर > " हाथ पर सर  रखिये ..! " 
खोजे > " हाँ दुनिया बदल रही है ... दुनिया के साथ चलिए ..! "
 अफसर > " अच्छा  देखिये आपको कुछ तमाशे दिखाएँ ..! "   मिस्टर खोजे पिटारा लाइए ! " 
 (खोजे एक बड़ा डिब्बा लाता है जिस का मुह टी वी जैसा है )
अफसर > ' कितना सुन्दर दिखता है  यह देखो गंगू ... इसमें ..' 
खोजे > " नाचती परियां ... बहते झरने ... ध्यान से देखो इसमे कहीं कहीं तुम भी दिखोगे ..! "
अफसर > ' अच्छा !!क्या  तुम्हारे पास तुम्हारे पुरखों के चित्र हैं ..? तुम्हे याद है  अपने बाप दादाओं का चेहरा ... नहीं ..?
खोजे >  ( एक बड़ा आइना लाता है )-( गंगू को दिखा कर )- " यह देखो अपने  पिताजी का चित्र ..... अब जरा मुह मोड़ो  कुछ तिरछे हो ... इस तरह से  ! ( आइना घुमाता है ) ..यह है तुम्हारे दादाजी का चित्र .  और ऐसा ही है तुम्हारे लकड़ दादाजी का चित्र .! " 

अफसर > " देखो सब तुम्हारे जैसे ही दिखते  थे  !   बिलकुल फर्क नहीं .. वैसे ही जैसे तुम आज  दिखते  हो ..! " 
 खोजे > " उनके पास कुछ भी नहीं था .. तुम्हारे पासभी कुछ भी नहीं !   " 
 अफसर > " लेकिन तुम्हारे लिए हमारे पास बहुत सी स्कीम है ! " 
खोजे > " बहुत से प्लान ..! " 
अफसर > " अब हम इन स्कीमों के बारे में  पढ़  कर तुम्हे बताएँगे ..! तुम सर हिलाते जाना , देखो यह पीली स्कीम - खास तुम्हारे लिए .
खोजे > " .. तुम नहीं जानते ... तुम्हारा ' बांया ' हाथ कमज़ोर है !  हम उसे और मजबूत  बनायेंगे ! " 
 अफसर > " उसे दांये हाथ के बराबर बना देंगे ..! " 
किसान > परन्तु मेरे तो दोनों हाथ बराबर हैं ...ये देखो ..! "  ( हाथ दिखाता  है ) 
अफसर > ( सहानुभूति से ) - अरे नहीं गंगू !! तुम नहीं समझ सके आज तक ., हजारों साल बीत गए ...! " 
खोजे > " अच्छा  गंगू  !! यह बताओ ..  तुम अब तक हवन , दान , जैसे पवित्र कार्य किस हाथ से करते रहे ..? 
किसान > इस हाथ से - दांये हाथ से " 
 खोजे >   " और शौच , मुखारी , जैसे गंदे काम किस हाथ से ..? " 
 किसान >  ( दूसरा हाथ दिखा कर )  " इस हाथ से ... बांये हाथ से ...! "
 अफसर >  " तो साफ़ है की बांया हाथ दांये हाथ से हमेशा नीचे रहा ! उससे सदियों तक गंदे काम लिए गए .., उसकी   अवहेलना की गयी।।। क्योँ ??    इसलिए हम उसे दाहिने हाथ के बराबर कर देंगे  ..,! "
 किसान > ( दोनों हाथ आगे ला कर दिखाते हुए ) - देखिये मेरे तो दोनों हाथ बराबर है ..! "
 खोजे > हाथ का मतलब पूरा हाथ ..! अंगुलियाँ कहाँ बराबर हैं .. ? स्कीम बराबर करने की है ... हम उंगलियाँ बराबर कर देंगे ! " 
 किसान > "  नहीं मैं ठीक हूँ , मेरे हाथ ठीक है ! " 
खोजे > " तुम्हें कैसे मालूम की तुम ठीक हो ..? फिटनेस सार्टिफिकेट है तुम्हारे पास ..?? " 
अफसर > " तुम्हे और भी सुविधा मिलेगी  गंगू ..!!   लो यह हरा फार्म भरकर पीले डिब्बे में  डालने .के लिए ! " 
खोजे > " और यह नीला फार्म  सफ़ेद डिब्बे में डालने के लिए  ..! " 
अफसर > " यह गुलाबी फार्म बेंगनी  डिब्बे के लिए .." 
 खोजे > इधर आओ गंगुजी ..!! यहाँ लगाओ अपना अंगूठा ...यहाँ ..! " 
अफसर > " और अब इस फ़ार्म को आगे बढ़ कर नीले डिब्बे में डाल  दो ! " 
( किसान हाथ में फार्म लेकर आगे बढ़ता है ! डिब्बे तक नहीं पहुँच पाता  है - कमर में बंधी सांकल रोकती है ) 
अफसर > " थोड़ा पर जोर लगाओ गंगू ... थोड़ा और ..! " 
 ( किसान आगे बढ़ता है , .. जोर लगता है ..., सांकल खिंचती  है   जिससे कुर्सी हिलती है ) 
पुतला > ( जोर से चिल्ला कर ) _ कौन कुर्सी हिला रहा है ...? " 
अफसर > " कोई नहीं सर ! .. गंगू अपनी अर्जी डिब्बे में नहीं डाल पा रहा है ..! "  
 खोजे > " थोड़ी सांकल ढीली कीजिये सर ..!! कड़ियाँ लचीली कीजिये सर ..! " 
पुतला >  " सांकल  पुरानी है , उसकी  कड़ियाँ बहुत मोटी हैं ..ढीली नहीं की जा सकती ! "
 अफसर > " थोड़ा और आगे आओ गंगू ! "
किसान  के आगे बढ़ने पर सांकल खिंचने  से फिर कुर्सी हिलती है ) 
राजा > ( चिल्ला कर ) - " बेवकुफो ..!! कुर्सी हिल रही है ! डिब्बों को उसके पास ले जाओ ..! "
(दूर - वसूले की चींख - नहीं सर प्लीज़ सर ..) 
अफसर > " ठहरो  गंगू ..!! हम हम तुम्हारे लिए डिब्बों को ही उठा कर .तुम्हारे नज़दीक ला देते हैं  ! " 
( खोजे और अफसर दोनों मिलकर डिब्बों को उठाने का प्रयत्न करते हैं - डिब्बे भारी हैं .. , बहुत ताकत लगाने पर भी हिलते नहीं . दोनों को पसीना आ जाता है .! ) 
खोजे > ( हताश स्वर में ) " यह बहुत भारी हैं ...सर ..!!   ...उठते  ही नहीं ) ! " 
राजा > ( कड़क कर ) " गधों ..!! ... नए डिब्बे बनवा लो ..., खर्च की चिंता मत करो ..!  डिब्बे उसके चारो और सज़ा दो ..! "
अफसर > " मिस्टर खोजे  नए डिब्बे बनवाओ ..! " 
( दूर से वसूले की चींख - नहीं सर प्लीज़ सर ) 
खोजे >  "  तबतक गंगू क्या करे सर ..?? ....उसके हाथ में फ़ार्म है ! " 
राजा > " मूर्खो ..!! तुम्हारे किये कुछ ना होगा ..! में खुद आता  हूँ ! " 
( राजा चल कर किसान के पास आता है  साथ में पीछे पीछे पुतला भी है ) 
अफसर >  " महाराज की जय ..! " 
खोजे > " सरकार की जय ..! " 
राजा > " शांत।।! शांत ..!!  हम गंगू भाई के लिए  चल कर आये हैं ! ... हम उनके लिए ज़मीन पर चलेंगे ..,  हम उनके सेवक हैं ! उनके लिए नयी नयी सुविधाएँ लाएंगे  ! " 
अफसर-  खोजे > " महाराज की जय - सरकार की जय "
राजा >  "  हम और गंगू भाई दोनों खानदानी हैं ... एक ही समय के एतिहासिक लोग ..! हमारा उनका  बड़ा पुराना  साथ  है ! हम उन्हें बहुत पहले से जानते हैं ... भले ही वो हमें ना जान पाए हो ..!"

अफसर- खोजे > महाराज की जय - सरकार की जय " 
राजा > " गंगू भाई  आगे बढ़ सकें ..! सबके साथ कदम से कदम मिला कर चल सकें , इसके लिए हम कोई कसार बाकी ना छोड़ेंगे ..! नए डिब्बे  बनवायेंगे ..! कई नए फ़ार्म छपवायेंगे ! " 
अफसर - खोजे >   " महाराज की जय - सरकार की जय ! " 
राजा >  "  हम गंगू भाई को नयी दिशा देंगे ...,प्रगति का पाठ पढ़ाएंगे ..... आओ गंगू भाई हम मिल कर नयी दिशा की और बढ़ें ..! " 
 (  राजा गंगू के कंधे पर हाथ रख कर , कुर्सी के चारो और चक्कर मारता है ! पीछे पीछे पुतला . हाथ में डिब्बे लिए  अफसर ,  और सर पर बहुत सारे  फ़ार्म लादे खोजे चलता  हैं )
कुर्सी के चारो और  घुमाने से किसान की कमर पेटी से बंधी सांकल . कुर्सी के चारो और लिपट कर छोटी होती जाती है ... और अंत में बहुत छोटी होने से कुर्सी के निकट हो जाती है ! ) 
 (दूर वसूले की आवाज़ धीरे धीरमद्धिम होकर बंद जाती है ) 
 कुर्सी के पास आकर राजा कुर्सी पर फिर बैठ जाता है ... अपने पेरों के पास किसान को बैठा कर उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगता है , अफसर खोजे दायें बाएं खड़े हो कर फ्रीज़ हो जाते हैं .... प्रकाश मद्धिम होने लगता है ) 

 जब रजा और किसान कुर्सी के चक्कर कट रहे होते हैं  तब समवेत स्वर में एक गान गूंजता है ) 

" सेरी के रे सेरी के .., पांच पसेरी के ..,
 उड़ गए तीतर  बस गए मोर .., 
 सड़ी डुकरिया ले गए चोर ..! 
चोरन के घर क्घेती भाई .., 
खाय डुकरिया मोती भाई .., 
मन  ,मन , पीसे मन मन खाय ,
 बड़े गुरु से जुझन जाय ..!
राज लुट सब चोरन खाय ..,
 बुढिया  उनकी  लेय   बलाय ..!! 


( प्रकाश धीमा होते ही  ... मंच पर अन्धकार हो जाता है )






***** समाप्त *******


 



.



सोमवार, 10 सितंबर 2012

भगवान् " राम " सदेव  हिन्दू धर्म  के उद्धारक ' के रूप में  , हिन्दुओं केकाम आते रहे हैं ! जब १६ वीं सदी में ओरंगजेब ने , हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया ,  और हिन्दू आक्रांत हुए , तो " राम " ने गोएवामी तुलसीदास को प्रेरणा दी , और उनके ग्रन्थ  रामचरित मानस  के माध्यम से हिन्दू ना सिर्फ एक हुए बल्कि उन्होंने अपने चारित्रिक उत्थान के लिए ' राम कथा ' का अनुगमन किया !
 बाद में जब  अंगरेजी राज्य में ,  अंग्रेजों के वायसराय लार्ड मेकाले ने सांस्कृतिक युद्ध छेड़ते हुए , अंगरेजी संसकारों , अंगरेजी भाषा के लिए , अपने पिट्ठू भारतीयों को प्रेरित किया , तो भारत के हिन्दू समुदाय फिर जागे !   हिन्दुओं ने प्रत्येक नगरों में , संसकारों की रक्षा के  लिए , " रामलीला " खेलने का आयोजन किया , जिसमें न सिर्फ आम जनता सामने आई , बल्कि तत्कालीन धनाड्य वर्ग ने भी , ' राम ' कथा को ' रामलीला ' के माध्यम से जन जन में उतारने के लिए पूरा सहयोग दिया ! यह राम लीला विदेशी संस्कृति के विरुद्ध , हिन्दू संसकृति को अक्षुण रखने के लिए , निरंतर आजादी के बाद भी खेली जाती रहीं !
नीतियों , भारतीय मूल्यों , को साहित्य में  , सुरक्षित रखने के लिए हमारे रास्त्र्री स्तर के कवियों ने भी " राम " का सहारा लिया और मैथिली  शरण गुप्त ने " साकेत " की रचना की ! राम कथा का अनुवाद हर भाषा में हर प्रान्त में हुआ ! जन जन जैसे " राम माय " हो गया !
भारतीय राजनीती में , महात्मा गांधी ने जन जन से जुड़ने के लिए " राम " का सहारा लिया , और खुले  मन से गाया - " रघुपति राघव रजा राम " ! वे राम प्रेम और राम अनुयायी के रूप में ही आम हिन्दू जनता में महात्मा के रूप में , स्थान बनाये !  कहा गया की उन के अंतिम उदगार भी यही थे .." हे राम " ..!
भारतीय जनता पार्टी को जब अपने अस्तित्व के बचाव के लिए कोई मार्ग नहीं मिला तो उन्होंने भी " राम " का सहारा लिया ! 'राम मंदिर " के नाम पर ही भा जा पा की डूबती नैया को  नई दिशा मिली और वे फिर सत्ता में अस्तित्व में आये ! बजरंग दल , विश्व हिन्दू परिषद् , धर्म के कई ध्वजा रोही भी " जय श्री राम " कह कर ही आम हिन्दू जनता के बीच अपनी पैठ बनाये !
प्रसिद्द गायक " मुकेश " कई भावपूर्ण गीत गए , किन्तु उन्होंने जब " रामायण  " गाई तो जैसे  वे जन जन में पहुँच गए ! लता ने भी " ठुमुक चलत " और  " पायोजी मैंने रामरतन " गाया तो  ये गीत कई गानों से अलग , रत्नों की तरह सराहे गए !  ' राम कथा " पर जब जब फ़िल्मी दुनिया में " रामायण " फिल्म बनी तो सदेव सफल हुई  !
छोटे परदे पर  कई अन्य कथाएं लेकर , कई निर्माता आये , लेकिन जो प्रसद्धि " रामानद  सागर ' को " रामायण " बनाने के लिए मिली , वह अद्वित्तेय है ! इस सीरियल में काम करने वाले पात्रों में " अरुण गोयल " और दीपिका " के कलेंदरों को  ग्रामीण लोगों ने राम सीता के रूप में अपने अपने घरों में जगह दी ! अन्य पात्रों में " रावण " तक को संसद में सांसद बनाने का मौका मिला !  अभिनेता " दारा सिंह " तो हनुमान बनकर सदेव के लिए अपना नाम अमर कर गए !
इसका स्पस्ट अर्थ है भारत राममय है !   लोग भी भले ही हास्य में  भले ही यह कहें की यह देश " राम भरोसे " चल रहा है .., किन्तु यह  बात अक्षराह्साह  सही है !
ऐसे भारतीय आत्मा में बसे " राम " को आज हम फिर भूल रहे हैं ! जरुरत है की हम राम कथाओं का मंचन , पुरी तकनीक , पुरी आस्था के साथ फिर से गाँव गाँव करें , ताकि स्टेज पर " नाट्य " में आकर्षण पैदा हो ! , ध्वनी , संगीत , और प्रकाश के प्रभाव से युक्त इन नए प्रयोगों के जरिये , लोगों में स्टेज के प्रति आकर्षण तो  बढेगा  ही  और " राम कथा " पाकर आम भारतीय मानस फिर से हिंदुत्व को पहचानेगा फिरसे जीवित होगा , ,  फिरसे धर्म सेजुड़ेगा !
ग्रामीण लोग कहते हैं   " राम नाम की लूट है   , लूटत बने तो लूट , अंत काल पछतायेगा जब प्राण जायेंगे छूट ..!! .... तो इससे पहले की पछताना पड़े  आइये फिर से राम से जुड़ जाइये ... " राम लीलाएं " पुनर्जाग्रत कीजिये ..  और हिन्दू धर्म की रक्षा कीजिये !
---- सभाजीत

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

                                 " सिंघासन बत्तीस्सी "

                                                                     एक नाटक  
                                         लेखक - सभाजीत 
                                                * भाग एक * 




( पुराने नोटंकी नुमा हारमोनियम और नगाड़े की आवाज़ ...! मंच पर एक प्रकाश धीरे धीरे उभरता है ! मद्धिम प्रकाश में मंच पर एक कुर्सी दिखती है ! जो स्वर्णिम पत्तियों से जड़ी है ! मंच पर एक ओर... क्रमबद्ध तरीके से पांच आकृतियाँ ( कलाकार )  फ्रीज़ होकर खड़ी हैं , जो विभिन्न मुद्राओं में है ! मंच पर कुर्सी के पास एक बलिष्ठ  वर्दी धरी व्यक्ति पुतले की तरह  खड़ा है )

( नेपथ्य में एक ध्वनि उभरती है )

".... परदे के पीछे से , मंच के नीचे से , अथवा चुपचाप आँखें मींच कर खड़ी इन आकृतियों के बीच से , कहीं से भी में ' सूत्र धार'  बोल रहा हूँ .., ! चूँकि मेरे बिना कोई भी नाटक शुरू करना  , परम्परा के  विरुद्ध है , ओर यह नाटक सेधान्तिक रूप से  अत्यन्तं परंपरा गत है , अतः पर्दा खींचने के बाद अपनी आवाज़ आप तक पहुँचाना  में अपना   नेतिक कर्तब्य मानता हूँ ,   ओर  अनेतिक  रूप से उस माइक को भी टेस्ट कर लेना चाहता हूँ , जिसके जरिये आप इन आकृतियों  को पहचान पायेंगे  ! ...,
इस नाटक में मै  अपने नाम ओर काम , दोनों से बहुत शर्मिन्दा हूँ , क्योंकि बहुत धुंडने  पर भी . इस नाटक का 'सूत्र ' मै नहीं निकाल पाया हूँ , ओर चूँकि नाटककार पहले ही से मंच पर कब्जा जमाये हुए हैं , इसलिए मेरा काम सिर्फ पर्दा खींचना ही रह गया है ! ...,
यह नाटक कुछ विशेष कारणों से मै बीच में ही शुरू कर रहा हूँ , ओर बीच मै ही बंद कर दूंगा !, इसके लिए कोई क्षमा मांगने भी में आप लोगों के बीच मै नहीं आउंगा ! मुझे विशवास है की इस माइक की इको वाली आवाज़ के कारण आप मुझे पहचान भी नहीं पाएंगे ...अतः अपनी सुरक्षा ओर कुशलता के प्रति मै पूरी तरह आश्वस्त हूँ
तो लीजिये ...!..., 'टाइटल मुजिक ' जिसे अक्सर आप मूंगफली खाते हुए भी सुन लेते हैं अब बंद करवा हूँ ओर फ्रीज़ द्रश्य को अन्फ्रीज़ कर रहा हूँ ...,!

( मंच पर प्रकाश धीरे धीरे तीव्र होता है ओर सब कुछ स्पस्ट दीखता है )

 ( फ्रीज़ हुई आकृतियों मै हलचल होती है , ओए वे पंक्ति बना कर सिंहासन की एक परिक्रमा करके ..सामने आकर खड़ी हो जाती है , फिर आकृतियाँ धीरे धीरे कुर्सी के  पास पहुँच कर  उसे छूने ओर उस पर बैठने का प्रयत्न करती हैं )
 (तभी कुर्सी के पास खड़े वर्दीधारी पुतले मै से  एक तेज गंभीर आवाज़ उभरती है ...)

पुतला >.... "' सावधान ''.!!!" ..,
( सब चोंक पड़ते हैं ,  एक दुसरे को देखकर आँखे फाड़ते हैं ... फिर आपस मै फुस्फ्साहत भरे स्वर मै .., )
एक>   " यह आवाज़  कहाँ से आई ...? ' .....,
दूसरा >  " यह कौन बोला भाई...?? " ..,
पुतला >  ( तेज़ आवाज़ मै ) .., "  मै बोला...!   यहाँ कुर्सी के पास से  से बोला ...!!"
सब लोग  >  ( चोंक कर आश्चर्य भरे स्वर मै )  " बोलता पुतला ..???"
 दूसरा > ' तिलस्मी पुतला ,,,,?? , "
तीसरा >  ' कुर्सी छूने पर बोलता है ..."
 चौथा >  " चलो फिर  कुर्सी छू कर टेस्ट करें .." !
 ( सब कुर्सी की ओर बढ़ते हैं )
पुतला > ..." ठहरो आगे मत बढ़ो ..!!"

पहला >  "  वाह जी ..! आगे न बढ़ें तो क्या पीछे बढ़ें ..? "
दूसरा >   " कुर्सी पर ना चढ़ें तो क्या आप पर चढ़ें ..?? "
पुतला > " ठहरो ...! कुर्सी पर वही बैठे जो योग्य हो..!"
सभी > ( समवेत स्वर मै )....  " हम सभी योग्य हैं .."
पुतला >   " तब सिर्फ वही आगे बढे जो अयोग्य हो ..,!"
( सब  एक दुसरे का मुंह देखते हैं - खुसर फुसर करते हैं )
 पहला >   "  यह भी कोई बात हुई .?? "
दूसरा >  " पुतला सनकी है .."
तीसरा >  " पुतला ही तो है ... ज्यादा अकल कहाँ होगी उसमें ..."
चौथा >....  ' नहीं नहीं ऐसा मत कहो ..., कम्पूटर है ... बहुत अक्लमंद होता है .."
पांचवा > हाँ ..!! कंप्यूटर तो आदमी से भी ज्यादा अक्लमंद होता है ..! "
पहला >   " रांग फीडिंग हो गयी होगी "
 दूसरा > ....होने दो ..! जैसा  पूछता है वैसा ही जबाब दे दो ..!! "
 तीसरा >   " हाँ भाई ,...!!  ससुरा जैसा चाहता है वैसा ही बन जाओ ... !"

( पहला व्यक्ति दांत निकालकर आगे बढ़ता है )
 पुतला ( टोकते हुए ) - >   " कुर्सी छूने से पहले अपनी ' अयोग्यता ' जाहिर करो .., "
पहला >  ( हाथ जोड़ कर सर नवाते हुए )... हे आभामयी , स्वर्णमयी , कुर्सी  !! तू वन्दनीय है .., तू पुरातन है , महान है .., तेरी प्राचीनता को देखते हुए   मै छुद्र   इस योग्य कहाँ की की........'
पुतला ( उसे रोकते हुए .., दुसरे की ओर इशारा करके ...) >  ...." तुम ..!! ."
( दूसरा व्यक्ति मुस्कराकर  कर आगे बढ़ते हुए )> ....."  धन्यवाद..!!  में जानता था की यह भार मुझे ही उठाना पड़ेगा ..!! "
पुतला ( कुर्सी के आगे हाथ  अडाते  हुए ) >    " बैठने के लिए नहीं ...' अयोग्यता ' बखानने के लिए कहा ..!! "
दूसरा >  " अभी जरुरी है क्या ..? बैठने के बाद तो वह ज़ाहिर होती ही रहेगी ..!! "
पुतला > ..." नही ! कुर्सी पर बैठते ही तुम ' योग्य ' बन  जाओगे ...,बैठने से पहले ज़ाहिर करो ..!! "
 तभी पांचवा व्यक्ति हाथ मै कलम कागज़ लेकर आगे बढ़ता है )
......" ज़रा एक मिनिट देंगे ..?  "
पुतला >   "क्या तुम भी अयोग्य हो ..? "
पांचवा >   " नहीं मै ' जर्नलिस्ट '  हूँ .. पत्रकार ..!! "
 पुतला > ..." 'क्या पूछना है .. ?" "
पांचवा > " क्या यह कुर्सी आपकी है .?
पुतला >  ."  नहीं "
पांचवा  >   " तब आप कौन होते है रोकने वाले ..? "
 पुतला >  " इस कुर्सी का पहरेदार "
पांचवा  >  " तो पहरेदारी करो .. कोई चुरा न ले ...! लोगों को  मना क्यों करते हो ..? "
पुतला  >  " इसलिए क्योंकि मालिक का हुक्म है .."
पांचवा  >  " कौन है मालिक..? "
पुतला >  " राजा भोज " ..!! "
(सब लोग आश्चर्य से ) -- " राजा भोज ...!!! कैसे भोज ..? कौन से भोज ..?? "
पहला > " भोज तो हम पार्टियों को कहते हैं ..'
दुआसरा > " जैसे रात्री भोज -- यानि  ' डिनर "
तीसरा >    "राजा भोज का मतलब तो हुआ --" राजाओं का भोज ...यानि इम्परर्स डिनर .." !! "
चौथा>    " महराजाओं का भोज "
पहला >    " यानि इम्परर्स डिनर "
पुतला >  ' ..मूर्खतापूर्ण बातें मत  करो ..!! यह राजा भोज की कुर्सी है , उनका सिंहासन .., ऐतिहासिक राजा भोज , न्यायप्रिय राजा भोज , प्रजा पलक राजा भोज .., !"
पहला >   ...अच्छा ..! अच्छा !! ...तो  यह राजा भोज की कुर्सी है .. यानि सिंहासन ..' !
दूसरा >   " बत्तीस पुतलियों वाला ' ! "
तीसरा >. " हाँ .. कई साल पहले . चन्दा मामा मै छपी थी इसकी कथा ..., ! "
( पांचवा ) पत्रकार >  " तब बाकि पुतलियाँ कहाँ गयीं ?? "
पुतला >  ' आसमान मै उड़ गयीं "
 पहला >  "  तब आप  भी यहाँ क्या कर रहे हैं ..? वहीँ जाइये ..! "
दूसरा >     "  हाँ हां !! ...बाकी  पुतलियाँ आपकी बाट जोह रही होंगी ..! "
चौथा > ( कड़क कर )...' चुप रहो ..!! जानते नहीं यह कुर्सी समेत उड़ जाएगा ..!"
तीसरा >  " हाँ  ! हाँ !! ठीक कहा ! छठवीं कक्षा मै नहीं पढ़ा क्या ..? "
दूसरा >   " छठवीं कक्षा कहाँ पास की है मेने ..??
पत्रकार >  ' तो जाओ ! पहले छठवीं कक्षा की परीक्षा देकर आओ ..! "
पहला  >.. " हाँ ! तो पुतले जी ..!! कहाँ मिलेंगे राजा भोज ..? "
पुतला  >   " वहां ..., दूर मैदानों मै .., जंगलों मै .., खेतों मै .., खेत खोदने के बाद सुस्ता रहे होंगे ..!! "
पहला  >  " तो क्या बिना उनसे पूछे नहीं बैठ सकते इस कुर्सी पर ..? "
पत्रकार  >  " अरे क्यों इस पुतले से दिमाग लड़ाते हो ..सीधे राजा भोज से पूछो ..!! "
सब ( समवेत स्वर में ) - हाँ चलो ..यही ठीक है ..! "
 ( सब मिलकर गाते हुए खोजने का उपक्रम करते हैं )
' खोज खोज खोज ... कहाँ है राजा भोज ..., " 
खोज खोज खोज ... कहाँ है राजा भोज  "
( तभी दो लोग आगे बढ़ते हैं ओर विंग के बहार से  अँधेरे से एक किसान को दोनों हाथों पकड़ कर ले आते हैं )

 बाकि लोग > ( दूर से देख कर ) .." .हाँ ! हाँ!!  यही हैं राजा भोज ...!! "
पहला>..." वही नम्रता , चाल में सोम्यता .पजा के सम्मान में झुका हुआ बदन .!! ,"
 दूसरा > " वही शरीर पर मात्र उत्तरीय .."
तीसरा >   " हवा में लहराते सूखे केश .."
 चौथा >  " प्रजा की चिंता में मुरझाया चेहरा "
सब > हाँ! हाँ ..!!  वही हैं राजा भोज   "( आगे बढ़ कर शाष्टाग लेट कर )  - ' महराज की जय हो !! " महराज की जय हो ..!! "
किसान >  " क्या बात है भैया ..?? "
पहला >    " महाराज आप मिल गए .., हमें स्वर्ग मिल गया ..!! "
दूसरा  >  " हम अंधों को  तो जैसे आँखें मिल गयीं .."
तीसरा >   " दरिद्रों को दीना नाथ मिल गए ..! "
चौथा > "  हमें कुर्सी   मिल गयी ! "
पहला >  " आपके बिना तो हम जैसे अनाथ थे ..! "
दूसरा  >  " अब हम उस पुतले को नाथ लेंगे ..! "
तीसरा   >  " हाँ !  ,, वह तिलस्मी पुतला . कुर्सी पर हाथ ही नहीं रखने दे रहा .! "
चौथा  >  " आपके आदेश के बिना पसीज ही नहीं रहा ..! "
किसान  >  " कौन सा पुतला ..? कैसी कुर्सी ..?"
पहला >    " अरे वही कुर्सी  - बत्तीस पुतलियों वाली .."
दूसरा  >   " जो पहले जमीन में गडी थी  "
तीसरा  >    " और खेत खोदने पे निकली थी ..! "
चौथा   .  " वही खेत  जो आप खोदते रहते हैं .."
पहला  >  ' और वो  आपके खेत में ही गडी थी ..! "
दूसरा  >  ' जिसके खेत में गडा माल मिले - वही उसका मालिक .."
तीसरा >  इसलिए वह कुर्सी आपकी ही है .."
चौथा   >  'आप ही मालिक हैं ..! "
पत्रकार  >  ( सबको हटाने की कोशिश करते हुए ) - " ज़रा एक मिनिट...! "
दूसरा  >  ' क्या एक मिनिट  ..?  क्या इंटरव्यू लोगे ..? "
पत्रकार  >  " हाँ भाई ! इम्पार्टेंट मेटर है ..! "
पहला ( पत्रकार को हटाते हुए ) - " अरे हटो महराज को परेशान मत करो ..! "
दूसरा >   बड़ी  मुश्किल से मिले हैं महराज ! "
पत्रकार  >  " ये क्या आप की खोज हैं ..??"
पहला  >  " नहीं तो क्या आपके बाप की खोज है ! "
पत्रकार  >  " देखो शिष्टता से बात करो.... वरना ...."
पहला  >  " वरना क्या करेंगे आप  ? "
पत्रकार  > " आपकी अशिष्टता छाप देंगे १ "
दूसरा  >    " जो आपको पसंद है वही तो छापेंगे आप ..! " 
पत्रकार  >    " देख लूंगा   बाद में  ( पैर पटकता हुआ चला जाता है )
किसान   >  " मत लड़ो भैया ..! "
पहला    >  ' अरे हाँ ! महराज चलिए ..! "
दूसरा   >   " चलिए अब वह अपनी कुर्सी उस पुतले से वापिस ले लीजिये..! "
तीसरा   >  " वह उस कुर्सी पर किसी को बैठने ही नहीं दे रहा है ...! "
चौथा    >   " कंप्यूटर है रांग फीड हो गया है ससुरा ..! "
किसान   > ' कहाँ है कुर्सी  ..? "
सब लोग  >  "   महाराज की जय ..! चलिए महाराज ... देखिये महराज  आपनी कुर्सी ! "
 ( किसान को लेकर कुर्सी के पास आते हैं )
पहला  >  " लो भाई पुतले जी   आगये महाराज..! "
दूसरा  >  " मालिक आगये अब वही न्याय करेंगे ! "
तीसरा  >  " वही फीड करेंगे तुम्हें ..! "
 किसान   >  " यह क्या है ... ? "
पहला  >    " यह आपकी बत्तीस पुतलियों वाली कुर्सी है ! जिसका अब सिर्फ एक पुतला बचा है ! "
दूसरा  >     " वह पुतला इस कुर्सी के पीछे खड़ा है - तिलस्मी है ... बोलता है ..! "
तीसरा   >  " कहता है की सिर्फ आपकी बात मानेगा ..आप मालिक हैं ..! "
चौथा  >    " क्यूंकि आप पहले इस कुर्सी पर बैठते थे ..! "न्याय करते थे-- धन दौलत लुटाते थे ! "
पहला  >   " राजा कम - प्रजा अधिक थे ..! "
दूसरा   >  " वही कुर्सी आज खाली पड़ी है . ..! "
तीसरा   >   " एकदम वेकेंट  ..उस पर कोई नहीं बैठा ..! "
पहला  >    " पुतला उसे किसी को छूने भी नहीं दे रहा ..! "
दूसरा   >  " अब आप मालिक हैं तो आप ही इसे छू कर देखिये ..! "
तीसरा   >  "हाँ ! हाँ !! पहचानिए हुजुर अपनी कुर्सी को ..! "
  ( सब लोग किसान को धकेलते हुए   जबरन उसका हाथ पकड़ जर कुर्सी से छुल्वाते हैं  ...! किसान के कुर्सी को छूते ही  पुतला सर झुका कर किसान को प्रणाम करता है .. पीछे हट जाता है ! )
( सब चौंक उठते हैं आश्चर्य से आँखें फाड़ते हैं )
पहला  >  " यह तो सचमुच राजा भोज हैं ..! "
दूसरा   >  " हाँ भाई ! पुतले ने उन्हें प्रणाम किया ..! "
तीसरा   >  " सर झुका कर हट गया ..! "
चौथा  >  " ऐसे डाउन हो गया जैसे वोल्टेज कम हो गया हो ..! "

 ( किसान  खुद आगे बढ़ कर फिर कुर्सी टटोलता  है ! )
 पहला  > "  महराज को याद आ रहा है  ! "
दूसरा   >   " हाँ ! वे पहचान रहे हैं ! "

किसान .  ( सर पर हाथ रखा कर सोचते हुए ) " कहीं यह वही कुर्सी तो नहीं  .., जिसे कल्लू लोहार ,  लल्लू बढई , छल्लू कारीगर , और धल्लू बंजारे ने मिल कर बनाया था ! जिसकी लकड़ी मेने अपने आँगन के उस पेड़ से दी थी जो मेरे अनजाने  पुरखों ने बोया था..... ! "
सब >    "  हाँ  हाँ  !!  महराज !! ..यह वही कुर्सी है ! "
किसान  >  " कहीं यह  वही कुर्सी तो नहीं जिस पर सभी कारीगरों ने अपने हाथों के निशान बना दिए थे .... जिससे में याद कर  सकूँ की , की लल्लू बढई कितना चतुर  कारीगर .., कल्लू  लोहार मजबूत छाती वाला , छाल्लू कितना मेहनतकश मजदूर , और धल्लू बंजारा कितना निर्मोही और मीठा गायक था ..! "
 सब   >  " हाँ हाँ महराज  सच कह रहे हैं आप ..! "
किसान  >  " तब भैया ... तुम लोग कितने भोले हो ... जो उन कारीगरों के हाथों के निशान को पुतलियाँ  समझते रहे ! ....वह तो मेरे साथियों के दिल हैं जो इस कुर्सी से जुड़े थे ...! दिल ...जो धडक रहे थे !  दिल ... जिनकी धड़कने  उनके बड़प्पन की कहानिया कहती रही  ..! "

 पहला   >  हाँ महाराज हम सचमुच बड़े सीधे हैं ..! "
 दूसरा  >  " हम सब ये बातें क्या जाने  ,,, "
तीसरा  >  " हम तो कुर्सी  जानते हैं ... वही देखते आ रहे हैं ..! "
 किसान ( हर्षित होकर ) >  " तब भैया - यह सचमुच मेरी कुर्सी है ! परन्तु में इस पर कभी नहीं बैठा , इसलिए भूल गया था ! यह हमेशा मेरे मेहमानों से भरी रही ! मेहमान ... जो चाहे थोड़ी देर बैठे हो या ज्यादा देर .... परन्तु आराम से बैठे ..!  में तो उनके आगे अपनी ज़मीन पर ही बैठता रहा ! "
पहला   >  " हम कब कह रहे हैं की आप कुर्सी पर बैठें ..! "
 दूसरा >  " आप की जहाँ मर्ज़ी हो वहीँ बिराजे!"
तीसरा  >  " आप तो बस कुर्सी को पहचान ले ...! "
  चौथा  >   " ताकि पुतले का  टंटा मिटे ..! "
किसान  >  " मेने पहचान लिया ..! यह मेरी ही कुर्सी होनी चाहिए ! परन्तु एक बात है ... मेने इसे सोने से नहीं जड़ा था .., यह तो अब बहुत चमकदार बन गयी है ...  ..! "
पहला >  " हाँ  महराज .. हम जैसे लोगों ने इसे छू छू कर चिकना कर दिया है ! "
 दूसरा  >  " इसलिए यह चमक गयी ! "
 तीसरा  >  " अब तो इस पर बैठते ही फिसलने का डर बना रहेगा ..! "
चौथा  > " बिलकुल सोने की  मुर्गी जैसी हो गयी ... आपकी कुर्सी ! "
 किसान > ठीक है !..  ठीक है !!   आप कहते हैं तो फिर यह  वही    कुर्सी होगी ..! "
सब लोग ( चींखते हुए ) >   महराज जान गए .., महराज पहचान गए .., महराज मान गए ..!! "
 पहला   > अरे जाओ रे।।! हर्ष ध्वनि करो ..., नगाड़े बजाओ .., फुल उछालो ..! आज खुशी का दिन है सब शहरों में घरों में बंदनवार बांधो।।, "
( नेपथ्य में आतिशबाजी , पटाखों की आवाजें . नगाड़ों की ध्वनि ....फुल उछल उछल कर मंच पर आते हैं )
पहला  >   " महाराज आज हमारा मन झूम झूम कर नाचने का हो रहा  है ! "
 दूसरा >  " यह महान दिन है .. आज के दिन आपकी कुर्सी आप को वापिस मिल गयी- खाली  ! "
तीसरा  >  " वह कुर्सी जिसे पुतला लेकर आसमान उड़ गया था ...,और ऊपर ही ऊपर उड़ता रहा ! "
चौथा >  " वह कुर्सी ...जिसे हमने ढूंडा ...! "
पहला > ' वह कुर्सी  जिसे हमने महराज को दिखाया !"
चौथा >   " महाराज ..!! अब हमें भी पहचान जाइये ..! "
पहला   >  " हम आपके वाही सेवक हैं ..! "
दूसरा  >   " जो तन मन से  सदा आपके धन के बारे में सोचते रहे हैं ! "
तीसरा  >  " और इसीलिए अब हमने निश्चय किया है की इस कुर्सी को दुबारा उड़ने ना देंगे ..! "
 चौथा  >  " चाहे इसमें हमारी जान ही क्यों न चली जाये .."
पहला  > ' हम मर मर  कर भी इस कुर्सी की   हिफाज़त करते रहेंगे .."
किसान  ( खुश हो कर )  >  आप  लोग कितने भले हैं .. जो मेरी चीज़ के बारे में सोच रहे हैं ! "
पहला  >  "  हाँ महाराज  अब हम यह सोच रहें है की इसे उड़ने से कैसे बचाएं ..! "
दूसरा .   >   " मेरे ख्याल से  हम इस कुर्सी को आधा ज़मीन में गाड़ दें ..! "
 तीसरा    >  " ' जिससे पुतला इसे उड़ा  ना पाए ..! "
चोथा  >  " नहीं ...! पुतला  बुलडोज़र से उखाड़ लेगा ..! "
पहला  >  " तब पुतले को आधा ज़मीन में गाड़  दें ..!"
 तीसरा  >  " जिससे वह खुद ही ना उड़ पाए ..! "
चौथा  ..( पहले से )... " पुतले को तुम गाड़ोगे  ..? "
 पहला  > ( हकलाकर ) नहीं ...! में नहीं .., परन्तु हम में से जो सबसे अधिक ताकतवर हो वह गाड़   दे ! "
चोथा  > .  " कौन है ताकतवर .?  "
 ( सब बगलें झांकने लगते हैं )
पहला >   " तब हम बारी बारी से पहरा दें ..! "
दूसरा  >  " लेकिन अगर पुतले ने पहरेदार को फुसला लिया तो ..? "
तीसरा  >  हाँ हम सब फुसलने में बहुत कमज़ोर हैं ..! "
 पहला  >  " तब पहरेदार को कुर्सी से .. और कुर्सी को खूंटा गाड़ कर ज़मीन से बाँध दें ! "
चौथा >  " ठीक है  पर कौन है खुद को बंधवाने के लिए तैयार ... आगे आये ..! "
( सभी बगलें झांकते हैं )
पहला  > ' ठहरो सुनो .... ( दुसरे के कान में फूंकता है )
दूसरा > " वंडरफुल आइडिया ..!! ( तीसरे के कान में फूंकता है )
तीसरा  > " एक्सीलेंट ..!! "  ( चोथे के कान में फूंकता है )
चौथा  >    ( खुश होकर ) " इसे कहते हैं राजनेतिक हल ..! "
( सब लोग किसान की औरबढ़ते  हैं ) ....,
पहला  >   "
महाराज अब आप ही इस कुर्सी को बचा सकते हैं ..! "
 किसान  > "( चौंक कर ) ... में .....!!
सब  >  " हाँ महाराज आप और सिर्फ आप ..!! क्योंकि इस कुर्सी के मालिक सिर्फ आप हैं ..! "
 पहला >  " और जिसकी कुर्सी  वही  बचाए "
दूसरा >  " अपना बोझा खुदी उठाये ..! "
तीसरा >  ' बिलकुल ..!!! जिसकी होवे भेंस वाही लाठी चलवाए ..! "
चौथा  >  हाँ ! जैसे जिसकी लाठी , उसकी भेंस ..! "
पहला >    " चुप।।!   यह हिंसक सिद्धांत है !  अपनी परम्परा  और धर्म के विरुद्ध ..! "
दूसरा  >  ( चौथे से ) ..." सही ढंग से बात बनाना भी नहीं आती तुमको  ..?  "
चौथा >    " सही ढंग क्या है भाई ..? "
तीसरा >    " गलत बात को इस तरह बोलना की वह सही लगे ..! "
किसान >   "ठीक है ! ठीक है ... भैया परन्तु में कैसे बचा सकता हूँ इस कुर्सी को ..? "
सब > .    " .. यह हमने सोच लिया है ..! "
पहला  >    " इधर आइये महाराज .. "
दूसरा   >  " आगे बढिए महा महिम ..! "
तीसरा  >  ( गाते हुए )  " हम सेवक इन चरणविन्द   के  ..! "
(चौथा व्यक्ति एक सुनहरी जंजीर (  लम्बी - मोटी सांकल ) ले कर आता है  जिसमें एक और एक कुन्दा ( गोल छल्ला ) है और दूसरी और एक सुनहरी  कमर पेटी ( बेल्ट ) लगी है ! कमर पेटी में एक कब्ज़ा लगा है जिसमें ताला  लगाया जा सकता है )
चौथा  >  " यह है वह यंत्र   "
पहला  > " तंत्र मंत्र ..! "
दूसरा  > " कड़ी दर कड़ी  बंधी शक्तिशाली  व्यवस्था की  ज़ंजीर ..! "
तीसरा  >"  जो आपको और इस कुर्सी को जोड़ कर रखेगी ..! "
 चौथा  >  " पुतले के इरादों का मुंह तोड़ कर रखेगी ! "
 पहला   >  " अच्छे अच्छों  की हड्डियां फोड़  कर रखेगी ..! "
( सब किसान को पकड़ लेते हैं )
 किसान  >    " अरे यह क्या कर रहे हैं आप लोग  ..? "
पहला   >  " शांत !!..  महराज शांत !! " .
 दूसरा  >  " धैर्य ... से  काम  लें हुजुर ..! "
तीसरा >  " यह मजबूत इरादों .. का अवसर है ..एक बार दिखा दीजिये पुरी दुनिया को अपने मजबूत इरादे ..! "
 ( दो लोग मिलकर किसान को पकडे रहते हैं और एक आदमी आगे बढ़ कर पहली सांकल के एक छोर पर लगे छल्ले को कुर्सी के पैर में फंसाता है , और फिर सांकल को फैलाते हुए किसान के पास आकर उसकी कमर में  लपेट कर पट्टा   बाँध देता है ! )
पहला  > " वह आई कुर्सी ज़ंजीर की गिरफ्त में ..! "
दूसरा  > और फिर यह  ज़ंजीर आपकी गिरफ्त में ! "  ( कब्ज़े में ताला लगाता है ) !
 तीसरा   > और यह लगा ताला .! "...
  चौथा   >  " .अलीगढ  वाला ! "
 पहला   >  " अब यह कुर्सी पुरी तरह आपकी है ! "
दूसरा >   " जैसे ही यह कुर्सी  हिलेगी ...ज़ंजीर हिलेगी ...! "
तीसरा   >  " ज़ंजीर हिलेगी  तो आप की कमर हिलेगी ..! "
चौथा   >  " कमर हिलेगी तो ज़ाहिर है आप हिलेंगे ..! "
पहला   >  " और तब आपको यह पता चल जाएगा की कोई कुर्सी छू रहा है ! "
दूसरा   >   " बस ..!! तब आप फ़ौरन हमें बता देना ! "
तीसरा  >  "  और हम कुर्सी को उड़ने नहीं देंगे ..! "
 किसान  >  " ठीक है ! ठीक है  ! "
 पहला   >  ( किसान के कान के पास मुंह ले जा कर,  रहस्यमय स्वर में  ) ...' लेकिन महाराज अभी खतरा टला नहीं है ! "
दूसरा  >  "  हाँ जब तक पुतला है   कुर्सी खतरे में है ! "
तीसरा   >  "  इसलिए  इसकी चौकीदारी  करना भी जरुरी  होगा  ! "
किसान  >  "  ठीक है ! में इसकी चौकीदारी कर लूंगा ! "
सब  >  ( हैरान होकर आश्चर्य से ) ..."  महाराज आप ..? "
पहला  >  " नहीं नहीं !! यह कैसे हो सकता है ! "
दूसरा   >   " यह हमारी परम्परा के विरुद्ध है ! "
तीसरा   >  " हमारे देश की महान  परम्परा ..! "
 चौथा   >  " परम्पराओं में महान हमारा देश ..! "
 पहला  > ..." भला  यह कैसे हो सकता है की महाराज चौकीदार बन जाएँ ...? "
दूसरा   >   " जो महाराज हैं वो महाराज ही रहेंगे ..! "
तीसरा   >   "  और जो चौकीदार हैं वो चौकीदार !! "
 चौथा  >  "   परम्परा बनाये रखने के लिए ... परम्पराओं से लेकर परम्पराओं तक ....! "
पहला   >  " हम यह पूर्ण प्रयास करेंगे  की .."
दूसरा    >  जो जैसा  हैं वैसा ही बना  रहें ..! "
किसान   >  " ठीक है भैया !  ....  जैसा  आप  चाहें ..! "
पहला  >    " तो अब आपके हुकुम से हम सब लोग बारी  बारी  से इस कुर्सी की चौकीदारी करेंगे  ..! "
दूसरा   >     " हम कुर्सी पर बैठ कर देखेंगे की कोई इसे फूंक से उड़ा तो नहीं रहा है ..! "
तीसरा   >    " पुतला  कुर्सी छूने से पहले  हमें पूछेगा ! "
 चौथा    >   " हम जागते रहेंगे ... चाहे उंघते हुए जागना पड़े ..! "

( सब समवेत स्वर में गाते हैं )

  " कुर्सी पर बैठ कर , नारों को सेट कर ..,
    एक राग गायेंगे ... कुर्सियां बचायेंगे ..!
    तू तू और में में  को , आपस की चेचे को ,
    राजनीती बताएँगे ..कुर्सियां बचायेंगे !
   हम दो हमारे दो .., दोनों के फिर दो दो .,
  सबको बुलाएँगे .., कुर्सियां बचायेंगे ..!! "

पहला   >  ( सबको हटाते हुए )  तो ठीक है पहले में बैठता हूँ ! '
दूसरा  >  ( चिल्ला कर बोलते हुए )   " तुम क्योँ ..?? .. पहले में बैठूंगा ! "
पहला  >  "तुम नहीं में ..! "
दूसरा   >  में नहीं में ..! "
 पहला  >..'  में अनुभवी चौकीदार हूँ ..! "
 दूसरा    >   " में खानदानी चौकीदार हूँ ..! "
 (सब चिल्लाने लगते हैं  ) ...." में ..में ...में।।।में ..!!
पुतला  > ( दहाड़ कर ) ... " बंद करो यह संगीत ! "

 (सब सहम जाते हैं )
 पहला  >  " क्यों भाई तुम्हे क्या हो गया ..?  "
दूसरा   >  " तुम फिर बोलने लगे  ..? "
तीसर्रा  >  " क्या तुम्हे यह ' वेस्टर्न " ट्यून  समझ में आगई ..? "
चौथा    >  " यह तो हमारा कौमी गीत है ..! "
पहला  >  " कौमी ताल तो अभी बजी ही नहीं ..! "
पुतला  >    " बकवास बंद करो ! ....चौकीदार महराज मुक़र्रर करेंगे ...! "
 ( सब किसान की और मुड़ते हैं )
 पहला   >   " अरे हम तो भूल ही गए थे ...महाराज तो अभी यहीं हैं ! "
दूसरा   >  (  तेज स्वर में )   हाँ ! हाँ ! ...वही  मुकर्र करेंगे ..! "
तीसरा  >  " हाँ महाराज ही    चुनेंगे चौकीदार ..! "
चौथा  >  " महाराज हम में से एक को चुन लीजिये ! "
पहला   >  " हाँ ! याद कीजिये स्वयंवर की ..! "
 दूसरा   >  " वरमाल की  !    "
तीसरा  >     " आपको चुनना ... चुनवाना तो आता ही है ! "
चौथा  >     " कितने ही चुनवाये होंगे आपने ...! "
पहला   >    " चुप मुर्ख ! ... चुनवाने को याद मत दिला .. सिर्फ चुनने  की बात कह ..! " ..
दूसरा   > .. हाँ  हाँ सही कहा !   ( किसान से ) ...हजुर  जल्दी कीजिये ! "
 तीसरा   >  " ..  वो पुतला फिर बोल रहा है ! "
चौथा  >  '     "  उसके  इरादे ठीक नहीं है ! "
पहला >       ' वह तिलस्मी है ..! "
दूसरा    >   "  इससे पहले की  उसमे वायरस आये ..  आप चुनाव कर लीजिये ! "

( सब एक लाइन में खड़े हो जाते है  ....)किसान सबको देखने लगता है )
पहला  >  ( दुसरे की और इशारा करके )  ...."  इसे आप ज्यादा गौर से मत देखिये ! ...ये फरेबी है ! "
दूसरा  > ( पहले  की और   इशारा करके ) ..."   इसे मत चुनिए ..इसका बाप नचनिया है ! "
तीसरा  >  ( चौथे की और इशारा करके ) ..."  इसे भूल जाइये .. .. यह लौंडा है ! "
चौथा > >  ( तीसरे की और इशारा करके )    " इसके घर में चूहों के बिल है ! अन्दर ही  अन्दर सुरंगें हैं ! "
पहला   >  " मुझे देखिये में मजबूत हूँ ! "
दूसरा   >  " मुझे देखिये में रात भर उल्लुओं की तरह जाग सकता हूँ ! "
तीसरा   >.  " ... में बिल्लियों की तरह लड़ सकता हूँ , नोंच सकता हूँ .. खसोट सकता हूँ ! "
चौथा   >     " मुझे देखिये   में सात पुश्तों से चोकीदार हूँ ..! "
किसान   >  " आप लोग लड़िये मत  "
सब   >  " हम कहाँ लड़ रहे हैं हुजुर।।,
              हम तो नया युग गढ़ रहें है हुजुर ..,
               आपके पैर पड़ रहे हैं हुजुर ..,
               कुर्सी के लिए सड  रहे हैं हुजुर ..! "
 किसान हैरान होकर सबको देखने लगता है )
 पहला   >  " ठहरो।।! ठहरो।।!!   एक तरकीब है ..! "
  ( एक कपड़ा निकालता है , किसान की और बढ़ाकर ))
इसे अपनी आँखों पर बाँध लें सरकार ..! "
किसान   >  " क्योँ ..?? "
पहला   >   " जिससे आप हमें देख कर ना चुन सकें ! "
 ( आगे बढ़कर किसान की आँखों पर पट्टी  बांध देता है )
 दूसरा  > अब हम फिर से एक लाइन में खड़े हो जाते हैं ! "
 तीसरा   >   " आप हम में से किसी भी एक का हाथ पकड़ लें ..! "
किसान  >   " परन्तु इस तरह तो में कुछ भी न देख पाउँगा की मेने किसका हाथ पकड़ा है ! "
पहला  >  " पुतला देख रहा है सरकार ..! "
दूसरा  >   "  वह देख लेगा की आपने किसका हाथ पकड़ा है ! "
तीसरा   >  " वह आपको बता देगा !"
पहला    >   " इसी लिय तो हम आपके कान नहीं बाँध रहे है की आप सुन सकें ! "
दूसरा   >  " मुह नहीं बाँध रहे हैं ..की आप बोल सकें ..! "
  किसान   >    "  ठीक है भैया ...."  
पहला   >      " तो अब शुरू होता है ... पुतले जी आप बोले -  एक  दो  तीन ..! "
पुतला   >  " ठीक है  ! ...तो,,,,,,,,. एक,!,,,,,,,,,,,,,,,दो  !!.................. ... "
( सब लोगों में भगदड़   मच  जाती है  ... सब एक दुसरे के ऊपर चढ़ कर किसान को खुद अपना हाथ पकडवाने की कोशिश करते हैं  और एक दुसरे की टांग घसीटते हैं !  जूते  मारते हैं ...दबोच लेते हैं ,  
काफी देर उछालते कूदते हैं .., पुतला देखता रहता है ! तभी खानदानी चौकीदार सबको हटाकर खुद किसान का हाथ पकड़ने में सफल हो जाता है !  उसके हाथ थामते ही सब हट जाते हैं ) )
पुतला   >   "  तीन ...!! "
पहला  >  "  धन्य है महाराज ...!
 दूसरा  >  " महाराज की परख चोखी है ! "
तीसरा  >  सही आदमी को सही काम ..! "
पहला    >  बिलकुल  सही काम ...! "
सब लोग  ( चिल्ला कर ) .... खल्क खुदा का , मुल्क बादशाह का .., और राज   भोज का ..! "
चौथा   >  ( नगाड़े की चोट पर ) ....सुनिए एलान ..!!...अब महराज के हुकुम की तालीम करने के लिए  में महाराजा का प्रतिरूप  --- "  चौकीदार महाराज  "   पांच घंटों तक इस कुर्सी की रखवाली करूंगा ! पहली पांच घंटो तक बराबर ...और बाद में  जब तक महाराज चाहेंगे तब तक  ...! "

 दो    ( चमचे )  >   " महाराज आपको चाहते  थे , चाहते रहेंगे ...! "
 बाकि चमचे  >    " हम भी आपको चाहते हैं .. चाहते थे .. ., चाहते रहेंगे ...,! "

( सब लोग चुने गए चौकीदार को हाथों में उठा कर कुर्सी पर बैठाल देते हैं )
 ( सभी फ्रीज़ हो जाते हैं  प्रकाश मद्धिम हो  जाता है .. नेपथ्य से सूत्रधार की आवाज़ ...) 

 "....मैं सूत्रधार हूँ ! बीच में टांग   अड़ाने  के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ! यह बतलाते हुए मुझे प्रसन्नता है की यह इन्टरवल  है  यानी मध्यांतर ! उबासी लेते हुए दर्शक गण , सम्मानित अतिथि गण जिन्हें और भी कई उद्घाटन समारोहों में जाना है , इस अँधेरे का लाभ लेकर उठ सकते हैं ! महिला वर्ग से जिन पत्नियों ने अपने पतियों को घर चलने के इशारे किये हैं , वे भी  घर जाने को स्वतंत्र हैं ! ...,
यह इंटरवल जैसा की आम इंटरवल होता है वैसा ही है ! अर्थात कुछ क्षणों का ..!... " क्षणिक " ..! यह चूँकि परम्परागत रूप से किया जाता है इसलिए किया गया है .. इस बीच दर्शक द्रश्यों के आधार पर नाटक के अंत के बारे में कयास लगाते हैं  .., रोमांचित होते हैं ..., शायद भयग्रस्त भी होते होंगे !  लेकिन दर्शकों से हमें क्या लेना देना ..? हुई है वाही जो राईटर रची  राखा ! ,,! "
नाटक के बीच में जिन महानुभावों  ने  फिकरे कसने या हूट करने का प्रयास किया है  उन्हें बधाई ..! प्रसन्नता की बात है की भीड़ में बैठी अपनी प्रेमिकाओं का ध्यान वे अपनी और आकर्षित करने में सफल हुए हैं ! हूट  ना करने वालों को भी बधाई ...उनके बुद्धिजीवी होने का वांछित प्रभाव , उनसे सम्बंधित लोगों पर बखूबी पडा है  और हमें आशा है की लोगों पर उनके बारे में  बना यह भ्रम बना ही रहेगा ! ! 
तो लीजिये सब कुछ हो चुका ...और अब फिर पेव्श है वही सब कुछ,,,," 

(..मंच पर प्रक्काश तीव्र होता है ! )


........ .........( क्रमशः .... भाग दो पढ़ें ..)








 
   





 


 


 









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