शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

 सं १९७० में जब मैंने , एक इंजीनियर के बतौर , म:प्र: विद्युत् मंडल में ज्वाइन किया तो मुझे ट्रेनिंग देने वाले मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने हँसते हुए मुझे उनकी कुर्सी के पीछे लिखे वाक्य को पढ़ने के लिए कहा ,,जहाँ लिखा था--" सप्लाई इज   सुप्रीम " !,,,,मेरे पढ़ लेने के बाद उन्होंने कहा,, इसका अर्थ समझते हो ?  ,,,जिस विभाग  की जिस  शाखा  में तुम कार्य करने जा रहे हो  वह उपभोक्ताओं को विद्युत्  वितरित की शाखा है ,,जिसका काम है विद्युत् का रखरखाव और विद्युत् का संचालन   --" संचालन _ संधारण " ,,,,,यानी अंगरेजी में " आपरेशन एन्ड मेंटेनेंस " !  और ध्येय वाक्य है " अनवरत विद्युत् प्रदाय ही  प्रथम  ध्येय  " !

    इन दो वाक्यों का अर्थ बाद में मैंने बखूबी समझा !ये विद्युत् वितरण व्यवस्था के मूल मन्त्र थे ,,! संधारण यानी मेंटेनेंस  यद्यपि बाद में लिखा गया था किन्तु वास्तव में वह सर्व प्रथम था ! जो अधोसंरचना या  व्यवस्था है , उसका मेंटेनेंस सबसे पहले जरूरी था , ताकि वह चरमराए नहीं , और किसी आसन्न संकट का कारण ना बने ,!  और यदि वह किसी दैवीय प्रकोप से छिन्न भिन्न भी हो तो , त्वरित आपरेशन , यानी अविलम्ब , संचालन कर कम से कम अवधि में उसे दुरुस्त कर , हालातों पर काबू पाना !  इन सब का ही निचोड़ था ,,, " सप्लाई  इज    सुप्रीम " याने सभी कर्तव्य ,,,मात्र अनवरत विद्युत् प्रदाय करने के लिए है  क्यूंकि वह जीवन का महत्वपूर्ण अंग है !

     जैसे जैसे समय बदलता गया ,,,हम मूल ध्येय से हटते गए ,,! ४० वर्ष की नौकरी करने के बाद जब रिटायर हुआ तो ध्येय वाक्य बदल चुका था ,,,वह था " अधिकतम -राजस्व " ,,! येन केन प्रकारेण ,,, विद्युत् बेच कर विभाग को अधिकतम राजस्व जुटाओ ! यह बदलाव हमारे बदलते चरित्र के कारण हुआ , या देश की आवश्यकताओं के कारण , यह शोध का विषय है ,,!  किन्तु एक बात जरूर लगी की हम ब्रिटिश राज के उस पुराने माहौल में लौट गए हैं जहाँ जनता का अर्थ सिर्फ बाज़ार है जहाँ बिना किसी संवेदना के मात्र व्यवसाय करना और धन उगाना ही उद्देश्य है !

    पिछले ७० सालों में कई सरकारें बनी , ,,,कई अलग अलग उद्देश्यों और सिद्धांतो के साथ ,,, !वोट बैंकों के पूंजी के साथ कई नेता अवतरित हुए , और सरकारों में , अपने वोटबल के आधार पर ' मंत्री ' पदों पर आसीन हुए ,,! उन्हें बहुत बड़े बड़े विभाग सौंपे गए ,,,उनके संचालन संधारण के लिए ,,,किन्तु वे उन विभागों की मूल आत्मा से बिलकुल अनिभिज्ञ थे ! ना तो वे यह समझ पाए की ये विभाग " मानव -सेवा " की किस उद्देश्य से बंधे हैं और ना यह जान पाए की की उनका महत्त्व क्या है ! अपनी काम जानकारी को  ना बढ़ाते हुए , उन्होंने अपने अधीनस्थ आई  ऐ इस सचिव को मित्र बना लिया और उन्हें ही उसकी बागडोर संचालन के लिए सौंप दी ! नतीज़ा यह हुआ ,,की प्रशाशन के लिए प्रशिक्षित किये गए सचिव ,   अपने पुराने ढर्रे पर प्रशाशन को ज्यादा महत्त्व देते हुए विभाग चलाते रहे ,,,और " मेंटेनेंस " का कार्य लालफीताशाही वाले बाबुओं , और विभागाध्यक्ष पर छोड़ दिया !

        यह भी सच है की भारत में जो भी नियम बने हैं ,,,उन्हें काम ना करने के लिए एक बैरियर की तरह ज्यादा उपयोग किया जाता है ! नियम इसलिए नहीं है की काम किस तरह हो सकता है ,,,बल्कि नियम इस लिए हैं की काम   किस तरह  नहीं हो सकता है ! इसलिए  जब बैरियर बने , तो भ्रस्टाचार ने सर उठाया ,,,यहाँ तक की बिना काम हुए कार्यों के बिल तो नियम अनुसार भुगतान हो गए , किन्तु किये हुए वैध कार्यों के भुगतान भी नियम के नाग पाश में बंध के मूर्छित हो गए !

     उत्तरप्रदेश के अस्पताल में , तीस लोगों की मृत्यु  कैसे हुई यह ' लीपा पोती ' की जांच वाली कार्यवाही हो सकती है ,,,लेकिन वस्तु  स्थिति यह है ,,की अस्पताल जैसे  जीवनदायी  संस्थान में प्राथमिक चीज़ , " आक्सीजन " और " दवाएं " ,,,,,"  संधारण "  की  सामान्य प्रक्रिया के अंतर्गत जीवित क्यों नहीं रह पायी ,,??  क्या स्टॉक मेन्टेन्स करना ' सर्वोच्च  ध्येय " नहीं हो सकता था ,,,जिसे हर कीमत पर पहले अनवरत बनाये रखा जाता  ??  क्या कोई मंत्री इस बात की जबाबदारी लेगा की यह उसका ध्येय वाक्य नहीं था ,,,जिससे इतनी मासूम जाने चली गयीं ,,! क्या  विभाग के बाउ और विभागाध्यक्ष बता पाएंगे की किन नियमों के चलते वे लंबित बिल पेमेंट नहीं हो पाए ,,,जिनकी व्यावसायिक परिणीति ,,लोगों की मरतीत्य के रूप में बदल  गयी। .?

शनिवार, 17 जून 2017

पिता ,,,!
 
   तुम्हे याद करता,,,, गर भूल जाता  जब ,,!
 लेकिन तुम्हे भूला ही कब ,,??

मेरे बेटे ने ,
मुझसे बहस की ,,,बराबर हो कर ,
तो मुझे लगा ,,,
 जैसे में खड़ा हूँ ,,,बेटा बन कर ,
और तुम खड़े हो मुझमें  समाये .!
वही धैर्य ,  वही  समझ , वही चुप्पी ,
लगा जैसे गुजरे दिन  फिर लौट आये ,,!

 पत्नी ने   ,
  बेटे  की हिमायती में ,
 बदलते वक्त के तकाजे ,
 जब मुझे समझाए ,
तो लगा ,,,की तुम ही सुन रहे थे ,जैसे ,माँ से ,
 ,
 दुनियादारी की  घिसी पिटी  बातें ,,
देख रहे थे ,,,चुचाप ,,,
  वे गुजरे लम्हे ,
 जो अपनों के लिए ,
 तुमने गवाएं  ,,!

 पोते का मुंह  देख कर ,
 जब तुम्हारे नयन ,, खुशी की बूंदों से छलछलाये ,
वही खुशी के आंसू मेरी भी आँखों में ,
पीढ़ी के आगे बढ़ जाने पर ,
उमड़ आये ,,!
वो संस्कारों की गठरी ,
 जो तुमने अपने पूर्वजों से ले कर ,
 नवागतों को  सौंपी थी , ,,
 वही कर्तव्य मैंने भी दोहराये ,,!

कदम कदम पर जब ,
 तुम मुझसे छूटे ही नहीं ,
तो अब डरता हूँ ,,,की
 कैसे तुम मोक्ष पाए ,,?
जीवंत रहे हर जगह , मुझमें ही ,
तो कहाँ विसर्जित हो पाए ,,??

,,,,,सभाजीत








 




 

 

बुधवार, 18 जनवरी 2017

गंदगी पर  निबंध ..*****

       गंदगी  स्वच्छता  अभियान   की  जननी  है .!  गंदगी ना  हो  तो अमिताभ  बच्चन  को एड में देखना   कठिन  होगा ! अमिताभ  बिग  बी  है  ...ओर बी   का मतलब   मक्खी    है   जो  गंदगी  पर   मड राती  है !गंदगी से  ही  झाडू का अस्तित्व है   ओर झाडू  आजकल  दिल्ली  में  राज   कर  रही  है ! झाडू   आम  आदमी का  सिंबल  है  ...!!..आम  आदमी  वह  है  जो  घर  में  अपनी  पत्नी से  झाडू द्वारा  पीटा  जाता  है ! झाडू  गंदगी साफ   करती  है     ओर  खुद  गंदगी में  पडी   रहती है ..!

शुक्रवार, 17 जून 2016


    "  सावित्री " -' सत्यवान '  और ' यम ' ,,



  ' सत्यवान  ' के प्राण हरण करके ,,,,' यम '  गहन अंधकार के उस मार्ग पर चल पड़े जहाँ कुछ भी दृश्य नहीं था ! यह वह मार्ग था जहां पर सिर्फ अंधकार था ,,,अनन्त अन्धकार ,,,और प्रकाश  ,  का प्रवेश जहाँ वर्जित था! वे सदैव की भाँती आश्वस्त थे की उनके इस एकाकी मार्ग पर सिवा उनके कोई यात्रा नहीं कर सकता!   तभी उन्हें लगा की आज कुछ असम्भव सा होने वाला है !  उन्होंने  चारो और देखा , फिर पीछे मुड़े तो उन्हें एक ' साया ' अपने साथ साथ चलता प्रतीत हुआ !  उन्होंने पूछा --" कौन ' ,,,?
  किंचित हास्य भरे स्वर में एक स्त्री कंठ उन्हें सुनाई दिया ---' 'सब कुछ   जानने  वाले , अंधकार में भी  चलने वाले देव ,,,क्या आप को नहीं मालुम की आप के पीछे कौन है ,,??
  यम की छठी इंद्री जाग्रत हुई !  उन्होंने भी हास्य भरे स्वर में उत्तर दिया ,,, ' जानता हु ,,, किन्तु पहचानना नहीं चाहता !  तुम ' अश्वपति ' की पुत्री  ' सावित्री ' हो ! "
  ' आप  मेरे पिता को  पहचानते  हैं किन्तु मुझे नहीं ,,,ऐसा क्यों देव ,,?? "
   याम गम्भीर हो उठे ,," इसलिए , क्यूंकि ,,, ' अश्वपति '  एक तपस्वी है ,,, वह राजा के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुआ ,,,और  ' अश्व ' रूपी अपनी सभी इंद्रियों की रास को अपने ' बस ' में रखने में समर्थ है !  ' तपस्या ' एक साधना है ,,,और जो इसमें सफल होता है , 'यम ' की निगाहों में वह हमेशा आदर का पात्र होता है !'
  --- तो आप जैसे ' समर्थ देव को मुझे पहचानने में  शंका क्यों ,,??
 यम इस बार जोर से हँसे ,,,__ " तुम्हे ना पहचानू यह कैसे संभव है ,,? तुम सविता ' हो ,,, भले ही तुम्हे लोग ' सावित्री ' कह कर बुलाते हैं ,,,किन्तु मैं अपनी परम शक्ति  ' अंधकार '  की एक मात्र ' शत्रु  '   सविता को ना पहचानो यह संभव नहीं ,,, तुम्हारा उदय किस क्षण हो जाएगा ,,,और तुम कब मेरे इस अंधकार के साम्राज्य को छिन्न भिन्न कर दोगी ,,, उस क्षण को पहचानना कठिन है !,  इसलिए में जान कर भी तुम्हे पहचानना नहीं चाहता !  "
 अब सावित्री भी मुखरित हो गयी  !  वह बोली --' देव  आप सूर्य ' को तो पहचानते ही हैं ना ,,? '
--- हाँ सूर्य को पहचानता हूँ ,,,जैसे अंधकार  एक ' सत्य ' है उसी प्रकार  प्रकाश ' भी ,,,और वह सूर्य का ही रूप है !   "
     तो '  देव ' ,,, मैं इन दोनों सत्य के बीच की  वह बिंदु  हूँ   , जहाँ से ' सत्य अपना स्वरूप बदलता है !,,,, क्या में  अंधकार और प्रकाश की तरह ,  उसी कोख से उत्पन्न हुई वह  शक्ति नहीं हूँ  जो ' सत्य ' के स्वरूप को एक क्षण में  बदल देती है  ,? "
  यम थोड़ा  थम  गए ! उन्होंने कहा ---" यह बात में जानता हूँ ,,,इसलिए इस गहन अंधकार में भी  तुम्हे  मेरे पथ का अनुसरण करते देख मुझे आश्चर्य नहीं हुआ !  तथापि अब मेरा अनुसरण छोड़ दो ,,,क्यूंकि मैं इस अंधकार में ही विलीन हो जाऊंगा ,,,,जबकि  तुम्हारा ' विलीन ' होना संभव नहीं ! "
  सावित्री हंसी !   बोली ---' आप सहर्ष विलीन हो देव ,,!  किन्तु उस ' सत्य ' के साथ नहीं  जो कभी विलीन नहीं होता ! "
    ---' किस सत्य के साथ ? "  यम  थोड़ा  हिचकिचाए  !
   --- उस सत्य के साथ जो आपकी मुट्ठी में कैद है ,,और जिसे आप सदा के लिए अंधकार में  अपने साथ विलीन कर देना चाहते हैं !"
----" मेरे मुट्ठी में तो ' सत्यवान ' के प्राण है ,,, और जिसने जन्म लिया उसे समाप्त होना ही है  यह तो नियति है सावित्री ! "
       ----' देव "   यदि सत्य को धारण करने वाला , सत्य को संचालित रखने वाला , भी अन्धकार में सदा के लिए विलीन हो जाएगा ,,,तो सत्य  किस तरह इस मृत्यु लोक में प्रदर्शित होगा ,,??
    यम अब ठिठक कर खड़े हो गए !    वे बोले--- ' सत्यवान ' अमर नहीं हो सकता सावित्री !"
'----'क्या आपका यह परम सेवक,' अंधकार ' अमर है देव ,,?  क्या 'प्रकाश भी अमर है देव ,,,"  क्या ये नित जन्मते और मरते नहीं ,,?? "
     यम समझ गए थे की वह सावित्री के वाक् चातुर्य में उलझ गए हैं ,,! सबसे बड़ी चिंता उन्हें यह होने लगी की अंधकार  के क्षीण होने का से भी निकट आ रहा था ,,,,और तब ' सावित्री ' किसी भी क्षण अंधकार को  प्रकाश  में बदल देने वाली थी ! अंधकार की समाप्ति का अर्थ था उनकी यात्रा में ' अवरोध ' !

   वे बोले ,,,-- तुम चाहती क्या हो  ? अपना अभिप्राय स्पष्ट करो ,,! "
    सावित्री बोली----- ' अमर तो कुछ भी नहीं देव ,,!     जन्म के बाद मृत्यु  और मृत्यु के बाद जन्म एक शास्वत सत्य है !    यही एक ऐसा सत्य है जिसकी निरंतरता बनी ही रहनी चाहिए ,,!  किन्तु देव ,,, जब ' सत्य ' को धारण करने वाले ' सत्यवान ' को ही आप अंधकार में विलीन कर देंगे तो जन्म मृत्यु के इस चक्र का ओचित्य भी क्या शेष बचेगा ?? "    सत्य सिर्फ एक शक्ति है ,   किन्तु इसे धारण करने वाला ' शिव ' भी चाहिए !  भले ही निरंतरता बनाये रखने के लिए जन्म मरण हो ,,,किन्तु ' सतयवान ' को एक अवसर भी तो मिलना चाहिए की वह अपने सत्य को दूसरे को थमा कर जाए ,,!  और मैं यही कहना  चाहती हूँ की सत्यवान ने अपना वह ' कर्म ' अभी पूर्ण  नहीं किया है ,,,,इसलिए अभी आप उसे अपने साथ ले कर नहीं जा सकते ! "

    यम ने दूर नज़रें फैलाई तो पाया की अंधकार क्षीण होने लगा था ,,! सावित्री की आभा बढ़ गयी थी ,,,, अब अंधकार में यात्रा संभव नहीं थी !    उन्होंने पुनः सोचा  और निश्चित किया की "  सत्यवान ' को उन्हें लौटा देना चाहिए ,,, जब तक वह अपना कर्म पूरा ना करे ,,,और सत्य को धारण करने वाला अन्य व्यक्ति पैदा ना कर ले उसे मृत्यु देना उचित नहीं !  रह गयी ' समय ' चक्र की बात तो वह तो चलायमान है ,,,स्थिर नहीं की पुनः लौट कर ना आये ,,!

     यम  ने मुस्करा कर कहा --- ' शब्द ' भी एक ' शक्ति ' है सावित्री ,,,, यह समय को बाँध सकते हैं ,,, विचारने को विवश कर सकते हैं ,,, और जय पराजय के प्रतीक हैं !  तुमने जिस शब्द शक्ति के प्रयोग से ' सत्य ' की व्याख्या ' की वह स्तुत्य है !  मैं तुम्हारे लिए ' सत्यवान ' को छोड़ रहा हूँ ,,, किन्तु इसे   निरंतरता देना तुम्हारा कर्तव्य है !   जाओ तुम वापिस लौट कर अपने उस ' सत्यवान  ' से मिलो जिसकी अभी   उस मिथ्या जगत में  जरुरत ,,शेष है " ,,! "
 यह कह कर यम अंधकार में विलीन हो गए !
  प्रकाश की वह ' आभा ' फूट पडी थी ,,, जिसे लोग " पौ फटना ' कहते हैं !


---------"  सभाजीत शर्मा ' सौरभ '

शनिवार, 7 मई 2016

                                                      .......1.......

इधर कुछ दिनो से , कई मित्रों के ब्लॉग मे , प्यार को लेकर कई किस्से लिखे जा रहें हैं !प्यार क़ी कथाओं का अंबार लगा है ! प्यार पर एस एम एस हैं, और प्यार क़ी परिभाषा तथा विवेचना पर टिप्पणी क़ी धारा बह रही है !

एसे मे मेरे टटपूंजिया विचार वाले ब्लॉग पर जब कोई टिप्पणी मुझे नही मिली तो दिल ने कहा,-
यार !! तुम भी तो सोचो , क्या तुमने कभी प्यार किया ?या फिर तुम्हे भी कभी प्यार हुआ ?
दिल के उकसाने पर मेने यादों क़ी पिटरी खोली तो एक प्यार का वाक़या , जो आक्सीजन लेने के लिए अंदर छ्टपटा रहा था, उछल कर बाहर आ गया !उसे देखते ही मेने कहा ; हाँ शायद यही है वह जिसकी मेरे को जरुरत है
सन 1974 मे शायद में जवान रहा होऊंगा ! प्यार के लिए जवानी क़ी उतनी ही जरूरत होती है , जितनी क़ी बिजली को बहने के लिए तार क़ी ! बिजली को अगर बहने के लिए तार चाहिए तो जवानी को ठहरने के लिए प्यार चाहिए !
उस वक्त़ , प्यार करने के लिए मुझमे पर्याप्त गुण मौजूद थे , जैसे क़ी में गिटार बजाता था, कविता लिखता था,गीत गाता था, और चश्मा लगाता था !
चश्मा लगाना उस समय का एक उच्चस्तरीय गुण था क्योंकि फ़िल्मो मे हीरोइने या तो चश्मा लगाने वाले अमिताभ , जितेन्द्र, जैसे जीनियस हीरो पर मरती थी या फिर अमोल पालेकर जैसे किसी निरे बुद्धू पर.!
खैर !!..
में जीनियस दिखने क़ी कोशिश करता था, और यह अंदाज़ लगाने क़ी कोशिश करता रहता था कि कितने युवा लड़कियाँ मुझे आँखों क़ी कोर से निहार रही है ! .,उस समय शर्म और प्यार का कॉकटेल चलता था, नीत प्यार नही चलता था
!एक दिन मेरे एक विभागीय मित्र ने मुझे फिल्म दिखाने को कहा ! मेने उसकी बात मान ली ! क्यौकि वह मेरा मित्र ही नही, मेरा गहन प्रशंसक था ! यदि वह कोई लड़की होता तो मे उसके प्यार मे फँस कर उसीसे विवाह कर लेता !
उस छोटे से शहर मे बालकनी से फिल्म देखने वालों कि संख्या बहुत थी !इसलिए हमे बीच क़ी कतार का टिकिट मिला !टिकिट ले कर हम दोनो टाकीज़ मे घुस कर अपनी सीट पर बैठ गए !
थोड़ी देर मे सभी सीटें भर गयी, और स्क्रीन के पिछे लगा स्पीकर हिट गाने बजाने लगा ! आदतन मेने अपने चारों ओर निगाहें घुमाई - कैसे कैसे लोग,और कैसी कैसी युवा लड़कियाँ कहाँ कहाँ बैठी है !
देखा तो मेरे आगे क़ी दो कतार छ्चोड़कर , तीसरी कतार से एक सुंदर आकृति , घूम कर मेरी ओर देख रही थी !मुझे खुद क़ी ओर देखता पाकर वह मुस्कराई और और तुरंत अपना मुँह वापिस मोड़ ली !
बला का सौंदर्य था !-
गोरा रंग,सुंदर नाकनक्श, बड़े बड़े नेत्र , सुराहीदार गर्दन पर बल खाती लंबी वेणी ,!! में हतप्रभ रह गया !
स्क्रीन पर तो सुंदर हीरोइन दिखने मे अभी देर थी ! लकिन यह हीरोइन तो टाकीज़ मे ही विद्यमान थी !
तभी उस मूर्ति नेफिर पीछे मूड कर देखा !- उसके पतले गुलाबी होंठ प्यार क़ी मुद्रा मे हँसे, और फिर फैल गए , छिपे हुए दाँतों क़ी धवल पंक्ति भी अपनी छटा बिखेर गई !
मुझे देख कर उसने फिर अपनी गर्दन वापिस मोड़ ली !
यह घटना फिर से घटती, इस से पहले ही अंधेरा हो गया और स्क्रीन पर फिल्म डिवीज़न क़ी भेंट चढ़ गई !
मेरा मन अब स्क्रीन पर बिल्कुल नही लग रहा था !मेरा मित्र मुझे फिल्म के सोन्दर्य पक्ष के बारे मे बताने लगा !मसलन- द्रश्य कितना सुंदर है, हीरोइन कितनी भोली है हीरा उसे कैसे चाहता है वग़ैरह..! लकिन मे तो अपनी सीट के आगे क़ी तीसरी कतार मे नज़र गडाने लगा - ! ना जाने कब वह सुराहीदार गर्दन मुड़े और और फिर मुझे देखे !
और फिर मेरी आरज़ू पूरी हुई ! जैसे ही स्क्रीन पर रोमांटिक गीत शुरू हुआ , फिल्म के हीरो हीरोइन घास पर लोटे, हीरो अपना मुँह हीरोइन के मुँह के पास लेजाकार गाना गाने लगा , तभी वह गर्दन फिर पलटी!
इस बार उन आँखों मे रोमांस का नशा था !मेरी ओर देख कर वह फिर उसी अदा से वापिस पलट गई ! मेरा दिल बल्लिओ उच्छलने लगा
- " हे भगवान !! यह कौन है जो मुझ मे इतनी दिलचस्पी ले रही है ??
इतनी सुंदर कन्या केलिए तो मे सभी गुणों से पूर्ण होने पर भी खुद को उसके योग्य नही समझता था !
फिल्म मे क्या हुआ कैसे हुआ मे कुच्छ नही देख पाया !सिर्फ़ सम्मोहित सा टकटकी लगाए , अंधेरे मे आगे क़ी सीट पर आँखे गड़ाए रहा !
तभी इंटरवल हुआ , और हॉल रोशनी से जगमगा उठा !
लकिन इस बार उस लड़की ने पिछे मुड़कर नही देखा !
मेरे दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे हिलाया और कहा - " चलो सौरभ चाय पिलाओ !"
में अनमने भाव से उठ गया !दरवाजे पर कुच्छ और दोस्त मिले -सभी ने कमेंट किए _ क्या शानदार फिल्म है !! ,तुम्हे कैसी लगी सौरभ ?
मे चुप रहा ! मुझे जो शानदार दिखा था , वह मे भूल नही पा रहा था !
बाहर लाबी मे आकर मेरे मित्र ने पुचछा
-"क्या बात है यार ? खोए खोए से क्यो हो ? क्या सेंटिमेंटल हो गए हो ?"
मेने कहा - " नही यार !!"
-"तो कुच्छ तो है ही ! बतलाओ !!" मेरा दोस्त मेरे पीछे ही पड़ गया !
मेने सोचा - फिल्मों मे हीरो के प्यार का राज़दार उसका दोस्त ही तो होता है ! तो क्यों ना मे अपने इस दोस्त को अपना राज़दार बना लू ?
मेने उसे बताया _ "यार ! टाकीज़ मे मेरे सीट के आगे बैठी एक लड़की मुझे मूड मूड कर बार बार देख रही है ! मेने पहले उसे कभी नही देखा ! वह एसा क्यो कर रही है मे मुझे समझ मे नही आरहा है !"
दोस्त मुस्कराया , फिर बोला - यह प्यार का मामला है - 'भाई ! तुम प्यार को पहचान नही रहे हो ! "
-" लकिन मेने तो उसे पहले कभी देखा ही नही !"-
- तुमने उसे भले ही ना देखा हो ,पर उसने तुम्हे पहले ज़रूर देखा है ! हो सकता है - कभी तुम गिटार बजा रहे होगे और वह श्रोताओं मे बैठी रही हो ! या फिर तुम कविता कर रहे होगे ..तब,..या फिर..""
-" बस बस रहने दो भाई !! चलो जल्दी अंदर चलो मे तुम्हें उसको दिखाता हूँ !"
में उसका हाथ पकड़ कर वापिस हाल मे लपका !
लकिन मेरी किस्मत !!- उसी समय हाल मे फिर अंधेरा हो गया !
अपनी सीट पर जाकर हम लोग बैठ गये ! मेरे दिल मे थोड़ी थोड़ी गुदगुदी होने लगी! मेने तब तक प्यार सिर्फ़ फिल्मों मे ही देखा था !लकिन ना तो प्यार किया था और ना ही मुझे प्यार हुआ था !आस यह घटना तो मुझे प्यार के पोखरे मे डुबोने लगी थी!
यह कैसे मुझे जानती है ..?क्या वाकई मेरे किसी गुण से प्रभावित है ..?क्या वाकई मुझ से प्यार करना चाहती है ..? मे धीरे धीरे डूबने लगा !
तभी मेरे दोस्त ने मेरा हाथ दबाया ! मेने चौंक कर उसे देखा तो उसने अंधेरे मे मुझे इशारा किया - -,
सामने क़ी सीट क़ी गर्दन फिर मूडी हुई थी !लकिन जब तक मे उसे देखता वह फिर सीधी हो गई !
फिल्म का समय जल्दी ही ख़तम हो गया ' दी एंड ' के पहले ही परिवार वाले लोग उठ कर दरवाजे क़ी ओर बढ़ लिए !जल्दी ही दरवाजे पर भीड़ जमा हो गयी !
मे भी धक्का खाते हुए जल्दी बाहर निकलने क़ी कोशिश करने लगा - ताकि बाहर निकल कर उस सुंदर कन्या को पूरी तरह ठीक से देख सकूँ !
लकिन ऐसा नही हुआ !मे पिछे रह गया !

- मित्र का हाथ पकड़ कर मे जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरने को हुआ तो देखा क़ी वह कन्या पूरी सीढ़िया उतर कर मुझ से काफ़ी आगे निकल गई है !
मे भीड़ मे जगह बना कर तेज़ी से नीचे उतरा ! लकिन तब तक वह कन्या बाहर लान मे पहुँच गई - और एक लेंब्रेटा स्कूटर पर उचक कर बैठ गई !
मुझे कुच्छ दिखा नही तो मेने उस लेंब्रेटा का नंबर नोट कर लिया !
वह नंबर प्लेट यद्यपि बरसात मे पानी खाकर ढूढ़ली हो गई थी , फिर भी मेने उसका नंबर हथेली पर लिख लिया
- एल ओ वी 22 16... !
अब मुझे उस कन्या के बारे मे एक सूत्र मिल गया था !लॅंब्रेटा का नंबर..!
तभी मेरा दोस्त आ गया ! बोला
- " क्या हुआ यार !! तुमने उसे देखा..?
-" नही यार !! नही देख पाया ! लकिन वह लंबी , छहःरहे बदन क़ी सुंदर लड़की है !! बाकी उसकी अदाएं तो देख ही चुका हूँ !"
दोस्त फिर मुस्कराया , बोला- "मेने काफ़ी कुच्छ देख लिया है ! - यार! वह मेरी भाभी बनने लायक है !"

" भाभी ??" -मे चौंका !

- " हाँ भाभी !! यानी तुम्हारी पत्नी !- अब दोस्त भी शरारत से मुस्कराने लगा !

मेरी बची खुची बुद्धि भी ख़तम हो गई !!मेने कहा -
" लकिन मे तो उसे जनता ही नही "
दोस्त बोला -" अब हम उसे जान लेंगे ! लेंब्रेटा का नंबर है हमारे पास !"
मेने गिरते पड़ते अपनी मोटर साइकिल क़ी ओर कदम बढ़ाए !! दोस्त को घर छ्चोड़ कर मे अपने घर पहुँचा !
देर रात तक पहले तो नींद नही आई,
और जब आई तो स्वप्न मे मुझे कई लेंब्रेटा दिखे !
                                        
                                       .......2..........
दूसरे दिन मेरे प्यारे दोस्त क़ी मेहरबानी से , यह खबर बिजली क़ी तरह मेरे दोस्तों के बीच फैल गई !

किसी को विश्वाश ही नही हुआ , कि में प्यार कर सकता हूँ - या मुझे प्यार हुआ है ! क्योंकि प्यार के प्रयोगात्मक कार्य मेने कभी नही किए थे !

मेरे मित्रों मे सभी लोग थे !

सिविल कांट्रेक्टर, लेखक, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, गीतकार , संगीतकार वग़ैरह वग़ैरह..,!

मुझ से मिलने पर वे पूछ ने लगे -

" मिला लेंब्रेटा का पता ..?"
अब में क्या जबाब देता ..?

मेरे एक मित्र जो इरिगेशन विभाग मे इंजीनियर थे , प्यार मे बहुत एक्सपर्ट थे ! उन्होने कई बार प्यार किया था !और प्यार के सभी लटकों झटकों से परिचित थे!
एक और मित्र जो साउथ इंडियन थे , उन्होने प्यार करके एक बंगाली लड़की को अपनी पत्नी बनाया था , मुझे बहुत चाहते थे !
तीसरे मित्र प्रोफ़ेसर थे !उन्होने एक डिप्टी कलेक्टर की बेटी के प्यार मे डूबकर , घर से भागकर आर्य समाज मंदिर मे विवाह किया था !
ये सब मुझे प्यार से ग्रसित मानकर , मेरी मुफ़्त सेवा के लिए तत्पर हो गए !

सब लोग एक साथ मेरे घर आ धमके !
बोले -

" हम आज ही से शुरू करेंगे अभियान..!"

"कैसा अभियान ? "- मेन्ने सकपका कर पूछा !

मेरे अभिन्न मित्र ने , जो टाकीज़ मे मेरे साथ था , मुस्क्राकर कहा -
" देवी सीता को ढूँडने का अभियान "

सभी लोग एक बार ज़ोर से हँसे !फिर मेरी ओर शरारत भरी निगाह उठा कर बोले-
" अपनी भाभी को तलाशने का अभियान !"

में न हंस सका , न गंभीर हो सका!
दिल था की मान ही नही रहा था कि वह लड़की मुझे नही चाहती होगी,

उसका टाकीज़ मे मुड़कर देखना और मुसकराना मुझे बार बार याद आ जाता था !
फिर भी अपने मन को दबाकर मे मौन रहा !-
' भाभी 'शब्द मेरे दिल मे गुदगुदी करने लगा था !

मेने कहा-

" लकिन कैसे ? में तो उसे जानता ही नही, कभी भी पहले उसे नही देखा ! सिर्फ़ एक स्कूटर का नंबर भर है मेरे पास !"

वे बोले -
" वही तो है जादुई चाबी !, अब देखो हम क्या करते है!"

मेरे इंजीनियर मित्र अपने साथ एक परिचित मेकेनेक को लाए थे !

उन्होने उसे नंबर देते हुए कहा-

" शहर कि हर मेकेनेक कि दुकान को छान लो !यह स्कूटर कहाँ सुधरता है , शाम तक पता लगा कर बताओ !"
मेकेनेक ने नंबर को कई बार देखा- पढ़ा, शारलक होम्स कि तरह उसकी चतुर आँखे फैली और सिकुड़ी, लकिन उन मे चमक नही आई !

सब लोग समझ गए , वह इस नंबर के बारे में ज़्यादा कुछ नही जानता !

वह बोला -

"में राजदूत मोटर साइकिल बनाता हूँ ! लेंब्रेटा स्कूटर आजकल बहुत कम रह गए हैं - फिर भी में दो घंटे मे आकर आपको बताता हूँ !"

जब वह मुड़कर वापिस चला गया तो दोस्तो क़ी चौकड़ी फिर सक्रिय हुई !

प्रोफ़ेसर मित्र , जो इंग्लिश लिट्रेचर के प्रोफ़ेसर थे, ने पूछा -
कुछ अंदाज़ करो , वह कन्या तुम्हारे किस गुण से प्रभावित हुई होगी ?- जैसे कविता से, या गायन से या...,या तुम्हारे इस जीनियस रूप से ?..

मुझे अपने अपने ढेर सारे गुणों से चिढ़ होने लगी ! पता नही उसे क्या अच्च्छा लगा होगा ?
मुझ से तो अच्छे मेरे ये मित्र गण थे जिनके पास सिर्फ़ एक ही गुण था - ' लड़की को मोहित करने का गुण !'

मोहित करने के लिए प्रोफ़ेसर मित्र ने रोमांटिक नॉविलों का सहारा लिया था !
सौथ इंडियन मित्र नायर ने जोक्स का !
इंजीनियर मित्र ने सुहाने गीतों के केसेट देकर लड़की का दिल जीता था !

सभी एक ही गुण के धनी थे !

में ने कहा- " में क्या जानू वह मेरे किस गुण को चाहती है ?"

नायर कि बंगाली पत्नी भी साथ आई थी !वह बोली -
-"बाबा ! क्या तुम रोमांटिक कविता लिखते हो ?"

मेने कहा- " नही"

तो फिर रोमांटिक गाने ज़ोर ज़ोर से गाते हो ?

मेने कहा -
" नही भाभी ! मुझे जो अच्छा लगता है , उसे ही मैं गाता बजाता ,- लिखता पढ़ता हूँ ! में उसी से रोमांस करता हूँ !"

-"लड़की को लड़के कि कौन सी चीज़ अच्छी लग जाए ,ये तुम लोग नही जान सकते ! नायर ने तो मुझे एक बार अपने हाथों से खाना बना कर खिलाया , में इन पर मर मिटी ! क्या शानदार मच्हली बनाता है नायर !"
सब हंस पड़े !

मे घबराने लगा !
अब ना जाने किस बात पर रींझ कर वह कन्या मुझसे प्यार कर रही है !- यह बहुत ही भयानक बात थी !
तभी वह मेकेनेक विजेता कि तरह लौट कर वापिस आया! आते ही बोला -

-"भाई जी ! वह स्कूटर" डी एफ ओ द्विवेदी 'का है ! बहुत बिगड़ता है, बार बार राजू मेकेनेक के गेरेज़ मे जाता है !"

" हो य " -- सभी ने ज़ोर से एक हुंकार भरी !

" द्विवेदी डी.एफ.ओ. को में जानता हूँ !"- इंजीनियर मित्र ने कहा- " वो सिविल लाइन मे मेरे क्वाटर के आगे तीसरी लाइन मे रहते है!"

तीसरी लाइन ?? मेने सोचा - यह तीसरी लाइन टाकीज़ मे भी थी और अब फिर आ रही है ! अजीब संयोग है !

- " तो फिर पहला प्रयोग !!', आज मेरे घर मे संगीत सभा होगी, जिसमे द्विवेदी को सपरिवार बुलाया जाएगा ! गिटार बजेगा!

'और अगर द्विवेदी नही आए , या वह कन्या को साथ नही लाए तो ?'

प्रोफ़ेसर दोस्त ने आशंका ब्यक्त की !

-"तो फिर हम अपने क्वाटर के उपर लौडस्पीकर लगाएँगे ! उसका मुँह भाभी के घर कि तरफ करेंगे , ताकि प्यार कि धुनें सुन कर वह बाहर आए !"

" होय " - सभी ने समवेत स्वर मे फिर जोरदार हुंकार भरी1

में सोचने लगा - ये लोग क्या कर रहे है - !
तभी नायर बोला -

-"अगले दिन अगला प्रयोग होगा !में कन्या के घर के ठीक सामने इस आशिक को अपने स्कूटर से हल्की टक्कर मारूँगा !ये गिर कर बेहोश होने की एक्टिंग करे - हम इसे उठाकर लड़की के घर मे ले जाएँगे - फ़र्स्ट मेडिकल हेल्प के लिए !" वहाँ दोनो एक दूसरे को जी भर कर देख लेंगे !"

यह पूरी तरह फिल्मी सीक़वेंस थी ! मुझ मे अन्य गुण तो थे - लकिन मेने कभी एक्टिंग नही की थी !जो कुच्छ था ओरिजनल ही था !

मेने कहा - " यह मे नही कर पाउन्गा!"

प्रोफ़ेसर ने कहा - " यह बिजली का इंजीनियर है !मीटर चेक करने के लिए वहाँ जाए !वह लड़की इसे बिटहाल कर चाय पिलाएगी और ढेर सारी मीठी मीठी बाते करेगी !" "होय "- यह सबसे उँच्ची हुंकार उठी !

मेकेनेक बोला - " भाई जी ! आप अपना संदेश मुझे टेप करके देदे मे उसे दे आउग! !"

यह रिस्क थी ! टेप अगर ग़लत हाथो मे पड़ गया तो फ़ज़ीहत है !

मेने कहा - " पहला प्रयोग ठीक है ! में आज इंजीनियर मित्र के घर मे गिटार बजाउँगा !"
--'होय " - सबने फिर हर्ष मिश्रित हुंकार भरी !

डी एफ ओ ने सभा मे आने से इनकार कर दिया !!

उस रात को एक लौडस्पीकर लाया गया !, उसका मुँह कन्या के घर की तरफ किया गया ! एमपलिफायर का फूल वोल्यूम खोला गया !

मेने गीत शुरू किए ! मेरा प्रिय गीत था - ' चंदा मामा दूर के '
दोस्तों ने कहा यह ठीक नही !

मेने दूसरे पुराने गीत बजाने शुरू किए - 'ये जिंदगी उसी की है ' , 'आजारे अब मेरा दिल पुकारा ', 'जाग दर्द इश्क जाग ,'

लकिन मेरे दोस्त झल्ला उठे !- " ये क्या मर्सिया गा रहे है आप !!"
कोई लेटेस्ट रोमांटिक गीत बजाईए !"

नये गीतों की मेरी प्रेक्टिस नही थी , मरी पसंद के गीत तो पुराने मेलोडियस गीत ही थे !फिर भी दोस्तों के कहने पर नए गीत बजाने की कोशिश करने लगा !

गीतों की प्रेक्टिस न होने के कारण गिटार बेसुरा बजने लगा !

थोड़ी देर मे , बगल मे रहने वाले , घर द्वार वाले बंगाली मोश्य आ गए !
बोले - " अब बंद कीजिए यह संगीत ! 'रात '' खराब' हो रही है ! सोने दीजिए हमें !"

मेरे मित्र उनसे उलझने लगे !
' हमारा घर है '-हमारा मन है ', हम जो चाहें सो करें ', वगेरह !

तभी मुहल्ले के बहुत से और सभ्य ब्यक्ति आ गए !
युद्ध का वातावरण बनते देख मेने गिटार बंद कर दिया !
प्रयोग की वह रात निराशा भरी रही ! 
उसके बाद दो तीन दिन तक सभी मित्र अपने अपने कामों में उलझे रहे , अतः कोई किसी से नही मिला !

हाँ , में ज़रूर उस डी एफ ओ के क्वार्टर के सामने से कई बार गुज़रा लकिन मुझे वह चेहरा नही दिखा !

मुझे उस क्वार्टर के माली ने घूमते देख कर टोका -

" राह भटक गये हो क्या साहब ?"
मेने शरमा कर कहा - " कुछ ऐसा ही है !"

चौथे दिन हम सब दोस्त फिर इंजीनियर मित्र के घर एकत्रित हुए !
सभी लोग मुझे कन्या से मिलवाने के उपायों पर चर्चा करने लगे !

तभी पड़ोसी बंगाली महोदय तूफान की तरह ड्राइंग रूम मे घुसे !घुसते ही बोले -

- " क्यों सहा ! कुछ सुना तुमने ?"

मेरे मित्र ने पूछा -
" क्या हुआ ? "

बंगाली महाशय - बोले

-" वो डिप्टी कलेक्टर का बाइस साल का जवान लड़का , फाँसी लगा कर मर गया !"

" डिप्टी कलेक्टेर नारंग का लड़का ?? 'नीरज ' ?" वह दुबला सा काला क़ाला लड़का नीरज ?"

"हाँ ! वही ! पुलिस आई है ! जानते हो तलाशी लेने मे क्या मिला ??"

-"क्या मिला ?"

- "ढेर सारे प्रेम पत्र ! " - बंगाली महाशय थोड़े ब्यांगात्मक लहजे मे बोले !

-"प्रेम पत्र ?? - किसके प्रेम पत्र ?"

-" और किसके प्रेम पत्र ! ! - उसके क्वार्टेर के सामने रहने वाले डी.एफ.ओ. की लड़की के हाथ के लिखे प्रेम पत्र !"

हम सब अवाक रह गये !

मुझे तो जैसे साँप ही सूंघ गया !

हमारे चेहरे पढ़ते हुए बंगाली महाशय बोले -

"- वो लोग प्यार करता था छुप छुप कर ! उधर चार दिन पहले , फिल्म देखने भी गया था दोनों !
लड़की अपने पिता के साथ गई थी , नीरज अकेला गया था !- उस दिन मे भी गया था फिल्म देखने ! मेने उन दोनो को प्यार भरे इशारे करते भी देखा था !- लड़की का पिता भी वो इशारे भाँप गया था ! "
हम सब बंगाली महोदय का मुँह तकने लगे !

बंगाली मोशाय - मेरी ओर मूड कर बोले -
"अरे सोरभ !" तुम भी तो था उस दिन टाकीज़ मे यार ! नीरज ठीक तुम्हारे पीछे वाली सीट पर ही तो बैठा था !-बिल्कुल तुम्हारे पीछे !- वही नीरज आज मर गया !"

मेरे कान सनसनाने ! मुझे कुछ भी सुनाई देना जैसे बंद हो गया !
बंगाली मोशाय शायद आगे कह रहे थे -

" ' सिलि लोग !' ज़रा सी बात पर आज कल ये लड़के जान दे देते है !उसकी चिट्ठी शायद डी एफ ओ ने पकड़ ली थी ! दूसरे दिन ही लड़की को ननिहाल भेज दिया , और लड़के के बाप से लड़के की शिकायत कर डी ! साला लड़का इतनी सी बात पर फाँसी लगा लिया !"

इतना कह कर बंगाली मोशाय आँधी की तरह वहाँ से बाहर निकल गए !
दूसरे घरों मे यही खबर देने !

उसके जाने के बाद में सकपकाया हुआ थोड़ी देर बैठा रह गया !

में समझ गया - ' उस दिन वह कन्या लगातार मुड मुड कर मेरे पीछे बैठे नीरज को देख रही थी !दोनो के बीच नज़रों के तीर , ठीक मेरे सिर के उपर हो कर चल रहे थे !'

में तो बीच मे 'नेट 'की तरह था !
जिसे छू कर नज़रो की शटल , इस कोर्ट से उस कोर्ट मे जा रही थी !

'नेट' बीच मे बेवज़ह ही झूल गया !

बाहर कोई रेडियो बजाने लगा !
गीत था - ' मारे गए गुलफाम अजी हाँ मारे गए ....,!"

गुलफाम कौन था ..?

'में या नीरज या कोई और ?',

में यह जानने की बेकार कोशिश करने लगा !


मुझे उस समय क्या हुआ था ?

' मेने प्यार किया था या मुझे प्यार हुआ था ?'.-
यह गुत्थी में आज तक नही सुलझा सका !

इसलिए मेने प्यार के उस वाकये को फिर से कबाड़ की तरह पिटारे मे ठूंस दिया !
शायद प्यार के जानकार, प्यार के विशेश्ग्य मुझे कुछ बता सकें ! 
( यह एक कहानी है , इसे आत्म कथा समझने की भूल ना करें !)

_

--सभाजीत'सौरभ'

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

    "   प्रेम  ,,,,,,

    प्रेम   का अर्थ ,,,
  ' मांडू ' ओर '   ताजमहल   ' की     दीवारो  पर  , 
   लिख दिया  ,, इतिहासकारो  ने ,

    प्यार के जानकारो  ने ,
    पढ़ाये , हमें ,
    उच्चतम  शिखर  पर 
    कलश मे  मढे  कुछ नाम ,
   ' लैला -मजनू "  , ' शीरी -फरहाद " ,,,सलीम अनारकली ' 
     वगेरह ,,वगेरह ,,!!

      बचपन से ,
      गणित के पहाड़ो  की तरह , 
      रेट रहे यही नाम , ,
      यादो के बस्ते में ,
      ठुसे रहे यही कागज़ ,   
    ,,, प्यार के मायने ,,
       एक ,,' नर ' एक ,मादा ' ,,!!
       और टपकते रहे ,,,  फटे  बस्तों  से , 
      यहाँ -वहा , सब जगह , 
      पेन्सिल और रबर की तरह ,,!!

       निश्छल चांदनी से , नहाये 
      ब्रक्षो  के झुण्ड , 
       खिलखिलाती नदी , 
       इठलाते समुद्र , 
       गुनगुनाती  धूप   सेकते  , 
        उत्तंग शिखरों से ,,, जब हो गया प्यार मुझे , 
        तो ,,, हंस दी दुनिया ,,
        मेरी नासमझी पर ,,!!

       गणित के समीकरण ने , 
       उकसाया  मुझे , 
       प्यार के कुछ ,,,सवालो को हल करने के लिए , 
       और में ढूंढता रहा ,  कलश के नामो के बीच , 
         कुछ और बात , 

       '   भरत  ' की नंगे पैर ,,' मनुहार ' ,,
         और मूर्छित  लक्ष्मण  की छाती पर ,
         ' राम ' की अनवरत हिचकियाँ ,,,,!
           अत्तेत के धुंए में  विलीन हुए ,,
          ' सुदामा ' के दो मुट्ठी ,,चावल ,, 
           और सत्य के दीवाने , 
           चांडाल ,,' हरिश्चंद्र ' का ' मृत्यु कर ' ,, मांगता ,,
            फैला हाथ ,,!!

          योग था की ' संयोग ' ,,
           प्यार के व्यापारियों ने  भी  , 
           बेचीं    वही  बाते  , 
           बार ,,बार ,,,हर बार ,,

        कि   बन गया  , 


           प्यार   का   ' अमृत  घट  ' ,,
          ' प्रेम रोग ' ,,!!

   ,,,,,,,,,,,,,,,, सभाजीत